उत्तर प्रदेश चुनाव 2012: मायावती-मुलायम के फेर में सर्वण

  • 16 फरवरी 2012
रमा देवी
Image caption रमा देवी को उम्मीद है कि एक दिन उनका भी उद्धार होगा

उत्तर प्रदेश चुनावों में सभी का ध्यान दलित और मुस्लिम मतदाताओं की ओर काफी गया है. लेकिन कुछ ऐसे सवर्ण भी हैं, जो लाचारी की ज़िंदगी व्यतीत कर रहे हैं.

इन्हीं में से एक हैं शंभू पांडे और उनकी पत्नी रमा देवी. अपने को उच्च श्रेणी का ब्राह्मण बताने वाले शंभू वाराणसी से क़रीब 40 किलोमीटर दूर गुरई गाँव के निवासी हैं और यहाँ पिछले 35 वर्षों से रह रहे हैं.

एक लंबी सी, न ख़त्म होने वाली सी मेढ़ पर से चला कर अपने साथ अपनी झोपड़ी में ले गए, तो मैं दंग रह गया.

अंदर पुराने ज़माने का एक बड़ा सा पलंग था और एक ख़स्ताहाल ड्रेसिंग टेबल भी पड़ा हुआ था. लेकिन ज़मीन पर कई सारे बिस्तर बिछे देख कर मैं पूछ ही बैठा, कि आख़िर ये किसके हैं?

शंभू पांडे का जवाब मिला, "साहब हमारे सात बच्चे हैं. अब एक झोपड़े में न तो सात पलंग आ सकते हैं और न ही हमारी उन्हें खरीदने की हैसियत है."

इनके परिवार की दाल-रोटी उस थोड़े से अनाज पर चल रही है, जो इनके मुठ्ठी भर खेत में हो पाता है.

बच्चे मुफ्त में पढ़ते हैं और घर के राशन पानी के लिए ये कभी दूसरे के खेत में काम करते हैं तो कभी अपने खेत की सब्जी लेकर बेचने का प्रयास करते हैं.

शिकायत

शंभू पांडे को हर किसी से एक ही शिकायत है. उन्हें लगता है कि पिछले 20 वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश का आम मतदाता जात-पात के चक्कर में फँस गया और इससे एक नहीं दो नुक़सान हुए हैं.

वे कहते हैं, "मंडल-कमंडल के चक्कर में गाँव में रहने वालों का सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है. हम तो मुलायम-मायावती के फेर में फँस गए. पहला रहता है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का और दूसरी रहती है तो लखनऊ और अंबेडकर नगर का ही विकास होता है."

शंभू पांडे की पत्नी रमा देवी रोज़ सुबह चार बजे उठती हैं. बच्चों और पति का खाना बनाने के बाद वे करीब 300 मीटर दूर जाकर हैंड पम्प से पानी भर कर लाती हैं, इसके बाद सात में से पांच बच्चों के स्कूल जाने का समय हो जाता है.

रमा देवी कहती हैं, "हम लोग पंडित हैं इसलिए आज तक किसी ने नहीं पूछा कि आपका भला कैसे किया जाए. लेकिन हमने भी उम्मीद नहीं छोड़ी है, अपनी लड़कियों तक को सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे हैं."

शंभू पंडे को एक मलाल ज़रूर है. उन्हें लगता है कि अपने चचेरे भाइयों की तरह उन्हें भी दस-पंद्रह साल पहले मुंबई जाकर पैसा कमाना चाहिए था.

उन्हें लगता है कि उनके भाई उनसे बहुत आगे निकल गए हैं. यहाँ तक कि दो-तीन साल में जब वो गाँव आते हैं तो उन लोगों के लिए तोहफे तक ले कर आते हैं. लेकिन शंभू पांडे बदले में कुछ नहीं कर पाते.

हालांकि शंभू की पत्नी को इस बात का कोई मलाल नहीं और उन्हें लगता है कि कभी तो प्रदेश में कोई ऐसी भी सरकार आएगी, जो सवर्णों की भी व्यथा सुनेगी.

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