मुलायम की सभा में कल्याण का हेलिकॉप्टर

helicopter
Image caption आजकल चुनाव प्रचार में हेलीकॉप्टर का प्रयोग आम हो गया है.

हम गुरूवार को सुबह फर्रुखाबाद से चलकर छिबरामऊ पहुँचते हैं. गाड़ी खड़ी करके चाय पीने की सोचते हैं, तभी आसमान में लाल रंग का एक हेलिकोप्टर उड़ता हुआ दिखता है.

बगल में मुलायम सिंह यादव की सभा होनी थी तो सोचा वही आये होंगे, लेकिन यह हेलिकॉप्टर तो उतरा ही नही.

सभा स्थल पहुंचे तो मालूम हुआ कि यह हेलिकॉप्टर कल्याण सिंह का था.

पायलट यहाँ ज्यादा भीड़ देखकर हेलिकोप्टर उतारने लगा था, लेकिन जमींन पर आने से थोडा पहले वहाँ मुलायम की साइकिल और लाल हरे झंडे देखकर उसे गलती का एहसास हुआ और फिर वह वापस आसमान में ऊपर उठ गया, बगल में दूसरी जगह के लिए जहाँ कल्याण सिंह की सभा थी.

कल्याण सिंह ने पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा का नेतृत्व किया था, जब उसे मात्र 51 सीटें मिलीं थीं.

2009 लोक सभा चुनाव में वह मुलायम सिंह के साथ हो लिए थे. मगर मुलायम ने जल्दी ही पल्ला छुडा लिया.

इस बार के विधान सभा चुनाव में वह बेटे राजू भैया की जन क्रांति पार्टी को मजबूत करने में लगे हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने उनके विकल्प के तौर पर उमा भारती को उतारा है.

लेकिन हम लोध किसानों के गाँवों में जहां- जहां गए, सबने कहा यहाँ उमा भारती से भाजपा को कोई फायदा नही.

चोर्सई गाँव के फूलसिंह के शब्दों में, “यहाँ उमा भारती का कुछ नही है, हमारे नेता कल्याण सिंह ही हैं.”

कुसुम राय भले साथ छोड़ दें, बिरादरी कल्याण के साथ है.

चौहान ढाबा में सियासत का तडका

छिबरामऊ में काम खतम करके आगे कन्नौज की तरफ बढे. चौहान ढाबा दिखा, खाने के लिए रुक गए.

ढाबा मालिक और दूसरे लोग इसी चर्चा मे मशगूल थे, कि कैसे कल्याण का हेलिकॉप्टर गलती से मुलायम के सभा स्थल पर पहुँच गया था.

यह कि कल्याण की सभा फ्लाप थी और मुलायम की जोरदार.

फिर धीरे से बात चुनाव नतीजों की ओर मुड़ी. ढाबा मालिक था तो बसपा कार्यकर्ता, मगर उसका कहना था, “मायावती का खेल खतम. मायावती का जमाना चला गया. सरकार सपा की ही बनेगी.”

दूसरे ने जवाब दिया, “कोई जरूरी नही.”

तीसरे ने कहा, “कांग्रेस समर्थन देगी. ममता से फुर्सत पाने के लिए. अखिलेश दिल्ली में मंत्री बनेंगे.”

चर्चा और आगे तक जाती है. टीवी की लाइव डिबेट से ज्यादा गंभीरता है यहाँ की चर्चा मे.

एक ने कहा 2014 में फिर विधान सभा चुनाव होगा. जो अभी समर्थन देगा और लेगा, दोनों साफ़ हो जाएगा. भाजपा ने दो बार बसपा को समर्थन दिया साफ़ हो गयी.

Image caption फूल सिंह, स्थानीय किसान

थोड़ा और गहराई में जाकर दूसरे ने कहा, “भाजपा इस बार न समर्थन लेगी , न देगी. दो बार भुगत लिया. अब अपनी जगह ही सही है.”

तो फिर क्या हो सकता है?

तीसरे ने कहा, “राष्ट्रपति शासन.”

आदत से मजबूर मेरा मन किया टेप रिकॉर्डर निकालकर यह चर्चा रेडियो के लिए रिकार्ड कर लूँ.

मगर लगा कि ये सब बिदक न जाएँ , इसलिये बस डायरी में नोट करता रहा.

बसपा समर्थक बोला. मायावती ने माहामाया पेंशन दी, कालोनी दी, तो क्या लोग वोट नही देंगे.

जवाब आया, “मगर खुद तो पूरे यूपी को लूट रही है.”

चर्चा को समाप्ति की ओर ले जाते हुए एक ने कहा सबसे बड़ी पार्टी सपा या बसपा ही बनेगी. कांग्रेस और बीजेपी भी कुछ उभरेंगी.

व्यापारी की दूरदृष्टि

कानपुर पहुँचता हूँ. होटल में खाना खाते हुए देखता हूँ कि व्यापारीनुमा एक साहब रेस्टोरेंट के मैनेजर और कर्मचारियों से चुनाव चर्चा में मशगूल हैं.

कहते हैं, “अबकी सरकार में बदलाव पक्का है. सपा कम से कम डेढ़ सौ सीटें जरुर पायेगी.”

इस व्यापारी को पक्का यकीन है कि सरकार सपा बनाएगी. वह होटल मैनेजर से कहते हैं, “मेरा तो अखिलेश से बढ़िया संपर्क है.”

होटल मैनेजर व्यापारी को लिफ्ट तक छोड़ने आता है. जाते-जाते चुनाव की ही चर्चा.

व्यापारी कहता है, “बस देखना है कि चुनाव बाद एक तिहाई बसपा फिर से टूटती है या नही.”

मेरा कान उधर ही देख दोनों मेरी तरफ देखते हैं. जानबूझकर मै अपना परिचय नही देता.

लिफ्ट आती है.वह नीचे उतर कर शहर चले जाते हैं, और मै अपने कमरे में.

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