'रेलवे लाइनों पर हर दिन होती हैं 40 मौतें'

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Image caption रेलवे लाइनों पर होने वाली दुर्घटनाओं में हर साल हजारों मौतें होती हैं.

रेलवे मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर साल पंद्रह हजार लोग रेल की पटरियां पार करते हुए रेलगाड़ी से कटकर मर जाते हैं. इनमें से क़रीब आधी मौतें मुंबई के उपनगरीय इलाकों में होती हैं.

मशहूर वैज्ञानिक डा. अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में तैयार की गई इस रिपोर्ट को पिछले दिनों रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को सौंपा गया.

बीबीसी के साथ बातचीत में डा. अनिल काकोदकर ने कहा कि रेलवे के आधारभूत ढांचे पर बोझ बहुत बढ़ गया है जिसकी वजह से ट्रैफिक के नियंत्रण के लिए पैसा और समय दोनों नहीं मिल पाता है.

उन्होंने कहा कि ट्रैफिक के नियंत्रण के लिए एक अलग निकाय की जरूरत है ताकि रेलवे सुरक्षा के बारे में विस्तृत रूप से सोचा जा सके.

काकोदकर ने बताया, “अभी तक रेलवे सुरक्षा की जिम्मेदारी सुरक्षा आयुक्त पर होती है. लेकिन उसकी शक्तियां बहुत ही सीमित हैं. इसलिए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि एक रेलवे सुरक्षा प्राधिकरण का गठन हो और सुरक्षा आयुक्त को भी उसी के अंतर्गत लाया जाए.”

उन्होंने कहा कि रेलवे सुरक्षा के बारे में शोध और विकास के लिए अलग से कोष बनाया जाना चाहिए.

सुझाव

समिति ने सुझाव दिया है कि पांच साल के भीतर सभी रेलवे क्रॉसिंग को खत्म करके पुलों का निर्माण किया जाए. समिति के मुताबिक इस पर करीब 50 हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा लेकिन सुरक्षा के लिए ये कदम उठाना तत्काल जरूरी है.

दरअसल, रेल दुर्घटनाओं में मारे जाने वाले लोगों की तुलना में ट्रैक पर अथवा रेलवे लाइन पार करते समय होने वाली दुर्घटना में ज्यादा मौतें होती हैं.

जबकि रेलवे के पास केवल उन्हीं यात्रियों की मौत का आंकड़ा होता है जो रेल दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं और ये संख्या बहुत कम होती है.

अनिल काकोदकर का कहना है कि रेलवे लाइनों पर मरम्मत के दौरान रेलवे कर्मचारियों की भी बड़ी मात्रा में मौतें होती हैं.

रोजाना लगभग दो करोड़ यात्रियों को ढोने वाली भारतीय रेल की इस रिपोर्ट में सुरक्षा के लिहाज से बेहद डरावनी तस्वीर पेश की गई है.

भयावह स्थिति

इसे देखकर ये सवाल बड़ा अहम हो जाता है कि कैसे खराब ट्रैक, असुरक्षित डिब्बे और बरसों पुराने बने रेलवे पुलों के साथ रेलवे सुरक्षित यात्रा का दावा कर रहा है.

डेढ़ सौ से भी ज्यादा पेज की यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि जल्दी कुछ नहीं किया गया तो रेल यात्रा और खतरनाक होती जाएगी.

समिति का गठन पिछले साल कालका मेल हादसे के बाद मचे हंगामे के मद्देनजर तीन महीने पहले किया गया था.

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Image caption रेल दुर्घटना से ज्यादा गलत तरीके से लाइन पार करने से मौतें होती हैं

समिति के अनुसार राजधानी और शताब्दी ट्रेनों को छोड़कर बाकी ट्रेनों में ऐसे डिब्बे इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जो पचास किमी प्रति घंटा की रफ्तार के लिए बने हैं.

यही नहीं, रेल पटरी के लिए जो स्टील इस्तेमाल किया जा रहा है उसकी भी गुणवत्ता पर समिति ने सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रैकों की देखभाल करने वाले गैंगमैन, गेट बंद करने वाले गेटमैन और ड्राइवरों सहित एक लाख 24 हजार पद खाली हैं.

रिपोर्ट के बारे में जानकारों का भी कहना है कि सुरक्षा को प्राथमिकता के रास्ते में रेलवे की आर्थिक समस्या और रेलवे के फंड पर उसका नियंत्रण न होना एक बड़ी वजह है.

रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन आईआईएमएस राना ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा, ”रेलवे की सुरक्षा, आधारभूत मजबूती और आधुनिकीकरण के लिए ये बहुत जरूरी है कि रेलवे की फंड कंट्रोलिंग एक स्वायत्त निकाय के पास होनी चाहिए. इस पर राजनीतिक नियंत्रण नहीं होना चाहिए.”

राना के मुताबिक इस स्वायत्त निकाय में रेलवे के बाहर के लोगों और विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए.

हाल ही में सूचना का अधिकार के तहत आई एक जानकारी में भी बताया गया था कि साल 2002 से 2011 के बीच इस तरह करीब चालीस हजार लोग जान गंवा चुके हैं.

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