उत्तर प्रदेश चुनाव का 'वार रूम' और संगीत का तालमेल...

मालिनी अवस्थी
Image caption मालिनी अवस्थी चुनाव आयोग से जुड़ने का श्रेय उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा को देती हैं

वार रूम और संगीत का क्या तालमेल हो सकता है? हो सकता है अगर वार रूम भारत के चुनाव आयोग का हो और संगीत एक लोक गायिका का हो.

देश की मशहूर लोक गायिका मालिनी अवस्थी उत्तर प्रदेश में पिछले चरण के मतदान के दिन यानि रविवार 19 फरवरी को लखनऊ के जनपथ सचिवालय में अपने पति और बच्चों को चुनाव आयोग का वार रूम या कंट्रोल रूम दिखाने लायीं थीं.

चारों की उँगलियों पर मतदान की नीली स्याही अभी ताजी लगी थी

वहाँ एक बड़े स्क्रीन पर सुदूर गाँव के मतदान केन्द्रों से सीधे लाइव तस्वीरों में लंबी-लंबी कतारें देखकर उनके चेहरे पर उपलब्धि और संतोष के भाव फूट रहें थे.

वह इस विधान सभा चुनाव में उदासीन मतदाताओं को जागृत करने के लिए ब्रांड अम्बेसडर हैं और उन्होंने प्रदेश के कोने कोने में अब- तक करीब चालीस जगह अपनी मधुर किन्तु बुलंद आवाज से मंचीय प्रस्तुति देकर धूम मचा दी है.

चुनाव आयोग से जुड़ने का श्रेय वह उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा को देती हैं.

वह कहती हैं कि, ''मतदाता जागरूकता अभियान के लिए चुनाव आयोग का ब्रांड एम्बेसेडर बनने का प्रस्ताव आया तो मुझे बहुत गर्व हुआ. लगा कि यदि मेरा लोक गायन देश के लोकतंत्र के कम आये तो बहुत बड़ी बात होगी.''

मालिनी से मैने पूछा, सामान्य लोकसंगीत और चुनाव में मतदान के लिए प्रेरणा गीत गाने में क्या फर्क है?

वह कहती हैं, ''दोनों में लोक संगीत है फर्क सिर्फ शब्दों और सन्देश का है. लोक संगीत का मतलब ही है कि लोक से जुड़े और यह काम तो इस अभियान में भी हो ही रहा है.''

गायन में रूचि और राजनीति में शिक्षा

मालिनी लखनऊ की मूल निवासी हैं, अवध की संकृति में पाली बढ़ी हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय से हिन्दी, संस्कृत और राजनीति शास्त्र में

स्नातक करने के बाद मशहूर भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय से संगीत में एम ए किया.

पढ़ाई पूरी भी नहीं हो पायी थी कि शादी हो गयी. मूलतः कानपुर निवासी पति अवनीश अवस्थी आई एस अफसर हैं इसलिए पूरा प्रदेश घूमने और देखने का अवसर मिला. पति की नौकरी के चलते उन्होंने चुनाव की प्रक्रिया, उसकी बारीकियों को अच्छी तरह समझा है, इसलिए उन्होंने मतदाता जागरूकता अभियान के लिए जो गीत लिखे या जो धुन बनायी वह सटीक बैठी.

मगर मेरी जिज्ञासा यह थी कि संगीत से जुडाव कैसे हुआ. मालिनी कहती हैं, ''मै पूर्व जन्म में विशवास करती हूँ और शायद पिछले जन्म में कुछ काम अधूरे रह गए होंगे जिन्हें मै इस जन्म में पूरा कर रही हूँ.''

वह बचपन में गुनगुनाती थीं, गीत गाती थीं. पिता डाक्टर पी एन अवस्थी ने उनके अंदर छिपी प्रतिभा को पहचाना और संगीत की शास्त्रीय शिक्षा लेने में मदद की. माँ ( स्व.) निर्मला उन्हें घर में होने वाली हर गवनई में साथ बैठा लेती थीं.

ताई ने अपने पास बैठाकर सोहर, बन्ना और नकटा गवाया.

सबसे बड़ी बात कि वह बनारस घराने की मशहूर गायिका गिरिजा देवी की शिष्या हैं.

पर वह उस मल्लाह को नही भूलतीं जिसने जौनपुर में सई नदी और गोमती के संगम में अपनी नाव में निर्गुन सुनाया था.

मालिनी का कहना है कि लोक कलाएं संस्कृति की अभिव्यक्ति हैं कभी वह चित्रों में आकार पाती है और कभी गीत संगीत में मुखर होती हैं.

गीतों के बोल

अपने गीतों के बोल के बारे में उन्होंने कहा, ''यह सब अनाम पुरखों के गीत हैं जो उन्होंने खेत जोतते, धन की बाई करते, जानत में आटा पीसते, शादी और विरह के क्षणों में लिखे और समाज को सौंप दिए.''

उत्तर प्रदेश की विभिन्न बोलियों – अवधी, भोजपुरी, ब्रज और बुन्देली बुन्देली आदि में बिखरे पड़े गीतों को संजोकर नई पीढ़ी को देने के लिए मालिनी ने सोन चिरैया नाम की एक संस्था बनायी है.

मालिनी कहती हैं कि इस मतदाता जागरूकता अभियान में उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि जिस क्षेत्र में प्रस्तुति है अपने गीत के बोल को वहाँ की स्थानीय बोली और लोक संगीत की शैली में ढाल लूँ.

बातचीत करते करते वह सहज ही गाकर सुनाने लगती हैं.

अरे जागो रे जागो देश के मतदाता.......

इलेक्शन की बेरिया, जागो दीदी अम्मा, भैया.

उदासीन मतदाताओं को जगाने के लिए,

घर मा बैठे तू काहे अलसात हौ, वोट काहे नही डाले जात हो.

Image caption मालिनी अवस्थी बनारस घराने की मशहूर गायिका गिरिजा देवी की शिष्या हैं

मतदाता होने पर गर्व का एहसास कराने के लिए उन्होंने कई नारे गढे हैं और छोटी – छोटी नाटिकाएं भी की.

इसी बातचीत के बीच उमेश सिन्हा भी आ जाते हैं.

इन गीतों का मतदाताओं पर क्या असर पड़ा है? इस सवाल पर उमेश सिन्हा कहते हैं, ''लोगों तक वोट डालने के महत्त्व का सन्देश पहुंचाने में मालिनी ने करिश्मा कर दिखाया है. इनसे बेहतर कोई और नही कर सकता था.''

मालिनी से वापस मुखातिब होकर मैने पूछा, आप इन सबके बीच रियाज कब करतीं हैं?

उन्होंने जवाब में कहा, ''वैसे तो रोज मगर इस अभियान की भाग दौड में सब छूटा हुआ है. मंच पर ही हो जाती है रियाज.''

परिवार से सहयोग

मालिनी के लोक संगीत में जितनी मिठास है. उतना ही समृद्ध उनका सौंदर्य बोध है जो घर की पहली मंजिल में उनके अध्ययन और संगीत कक्ष की साज सज्जा में दिखता है.

दीवारों पर चटख रंग और रोशनी के बीच कभी तानपुरा, कभी हारमोनियम और कभी तबले पर उंगलियाँ चलाते हुए वो गायन की प्रैक्टिस करती हैं.

मालिनी इसलिए और खुशनसीब हैं कि उनका पूरा परिवार उन्हें सहयोग करता है. पेशे से डाक्टर बेटी तो मंच पर प्रस्तुति में भी साथ देती है.

मैने उनसे वहीं सवाल पूछ लिया जो हर आम और खास के जुबान पर आजकल है, इस बार हवा किधर बह रही है?

उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ''परिणाम अप्रत्याशित हो सकता है.''

जवाब सुनकर मुझे विश्वास हो गया कि एक लोक गायिका को इतनी कूटनीति तो आती ही है कि एक पत्रकार की गुगली को झेल ले.

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