'सुनवाई नहीं, पर मुहर हाथी पर'

  • 26 फरवरी 2012
सुंदरी, बसपा कार्यकर्ता
Image caption सुंदरी कहती है कि मायावती तो बहुत कुछ करतीं हैं लेकिन बीच के लोग सब खा जाते हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री मायावती का गढ़ माना जाता है. वह इसी इलाक़े की रहने वाली हैं. यही उनका कर्मक्षेत्र रहा.

इसलिए यहाँ बहुत से लोग हैं जो उन्हें नज़दीक से जानते हैं.

इनमे से कई लोगों ने कई बार उन्हें अपने घर में कभी खाना खिलाया या कभी पानी पिलाया है.

ऐसे भी लोग हैं जो कहते है कि बहन जी ने उनकी साइकिल के कैरियर में बैठकर चुनाव प्रचार किए हैं.

साल 2007 में बहन जी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो ऐसे लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं.

लेकिन इस बार सत्ता में आने के बाद पूरे पांच साल वे बहन जी से मिल भी नही पाए और न ही पार्टी या सरकार के लोगों ने उन्हें तवज्जो दी.

मगर उनके दिलों में बहन जी के प्रति ऐसा लगाव है कि वे बहुजन समाज पार्टी की रैली में खिंचे चले आते हैं इस उम्मीद से कि शायद वह उन तक पहुँच जाएँ तो वे उनकी बात ज़रुर सुन लेंगी. आख़िर कृष्ण और सुदामा के क़िस्से जो उन्होंने सुन रखे हैं.

शनिवार को मेरठ में बहुजन समाज पार्टी की रैली में ऐसे कई लोग आए जिन्हें मलाल है कि वे दलित हैं फिर भी बहन जी की सरकार में उनकी सुनवाई नही हो रही.

हसनपुर कलां के किरनपाल जाटव इन्ही में से एक हैं. वे प्रेस गैलेरी के पास ही खड़े होकर पुलिस और बहुजन वालंटियर फ़ोर्स वालों से बार-बार गुज़ारिश कर रहें थे कि उन्हें बहन जी के पास तक जानें दें. उनके हाथ में दो अख़बार थे, जिनका शीर्षक था शादी मातम में बदल गई.

किरनपाल की बेटी की शादी थी. बरात दरवाज़े पर थी. तभी भूसों से भरा एक ट्रक बारातियों पर चढ़ गया. दुल्हन के भाई और ममेरे भाई की मौक़े पर ही मौत हो गई.

क़र्ज़ लेकर शादी कर रहें थे, सब कुछ बर्बाद हो गया.

किरनपाल को शिकायत है कि सरकार का कोई अफसर उनको राहत देने नही आया, न आर्थिक सहायता मिली. पार्टी के लोगों ने भी कोई मदद नही करवाई.

किरनपाल रो रोकर कह रहे थे, ''मेरे पर क़र्ज़ इतना ज़्यादा हो गया है कि मै आत्महत्या कर लूंगा.''

Image caption बसपा समर्थक ये बुज़ुर्ग कहते हैं कि शराब पीकर ग़रीब लोग बर्बाद हो रहें हैं.

बहुजन वालंटियर फ़ोर्स के लोग किरनपाल से हमदर्दी तो जता रहें थे, लेकिन इतनी कड़ी सुरक्षा थी की कुछ हो नहीं सका.

बहन जी मंच के पीछे बने हेलिपैड पर आईं और भाषण के तुरंत बाद उड़ गईं.

झोपड़ी में सोने का दर्द

बग़ल में ही खड़े अधेड़ उम्र के एक और आदमी ज़ोर ज़ोर से बोल रहे थे, ''मै बहन जी के पास पहुँच गया तो अकेले सबकी पोल खोल दूंगा.''

जाटव समाज से आने वाले अधेड़ उम्र के चरण सिंह का कहना है कि बहन जी कभी उनके गाँव आई थीं तो उन्होंने अपने हाथ से उन्हें पानी पिलाया था. उनके मुताबिक़ फोटो उनके पास घर पर रखी है और कभी उन्होंने बहिन जी को अपने रिक्शे पर भी बैठाया था.

लेकिन चरण सिंह के अनुसार पांच साल की सरकार में उन्हें कुछ नही मिला.

उनका कहना है, “न पहचान पत्र बना, न राशन कार्ड बना, न मकान बना, और ना ज़मीन मिली. मैं झोपड़ी में सो रहा हूँ.”

चरण सिंह का कहना है कि उनकी घर वाली मर चुकी है. तीन बच्चों के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी है उनके ऊपर. मगर न सरकार मदद कर रही है. न पार्टी वाले.

लेकिन गोद में बच्चा लिए जायदपुर गाँव की महिला सुन्दरी का कहना था कि बहन जी तो बहुत कर रही हैं, पर बीच के कर्मचारी सब खा जाते हैं.

सुन्दरी का कहना है कि उन्होंने ग़रीब आर्थिक मदद योजना का फार्म भरा था पर कुछ नही हुआ, फार्म की जाँच तक नही आई.

सुन्दरी का कहना है कि अफसर लोग आते हैं तो गाँव के बड़े लोग कह देते हैं कि यहाँ कोई ग़रीब आदमी नही है.

सुन्दरी के साथ उनके गाँव की बुजुर्ग महिला सोनी ने भी यही शिकायत की.

तभी एक बुजुर्ग पुलिस अफसरों से ज़िद करने लगे कि उन्हें मायावती को देखना है. आगे कई लोग खड़े थे, इसलिए वह उन्हें देख नहीं पा रहे थे.

आगे नहीं जा पाए तो वह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगे कि यह जो घर-घर दारू की दुकान खुलवा रखी है इससे ग़रीब बर्बाद हो रहें हैं और लोग दारु पीकर बहू बेटी छेड़ते हैं.

इस बुजुर्ग की बात सुनकर बहुजन फ़ोर्स वाले ने उन्हें ज़ोर से फटकार लगाई और मुझ पर भी नाराज़गी जताते हुए कहा कि मीडिया वाले रैली ख़राब कर रहें हैं.

बहरहाल बताते चलें कि रैली में आए दूसरे लोगों की तरह इन बुज़ुर्ग का भी यही कहना था कि मोहर हाथी पर ही लगेगी.

मगर ऐसे असंतुष्ट लोग क्या दूसरों को भी प्रेरित करेंगे इसमें संदेह है.

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