अज्ञेय को नए सिरे से समझना जरूरी

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Image caption अज्ञेय का व्यक्तित्व बहुआयामी और विराट था

लोकप्रिय कवि, कहानीकार, और निबंधकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को मौजूदा दौर में नए सिरे से समझने की जरूरत है और उनका लेखन गुरु रविंद्रनाथ टैगौर से प्रभावित है और उससे मिलता-जुलता भी है.

अज्ञेय के जन्मशती पर कोलकाता में आयोजित एक समारोह में ये बातें सामने आई हैं. अज्ञेय का व्यक्तित्व बहुआयामी और विराट था और ऐसे में उनको किसी एक सांचे में बांध कर देखना सही नहीं है.

साहित्य अकादमी और रज़ा फाउंडेशन के सहयोग से प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से कोलकाता में आयोजित तीन दिवसीय अज्ञेय जन्मशती समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखकों, कवियों और विचारकों ने यह बात कही.

समारोह में कहा गया कि अज्ञेय का लेखन कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर से प्रभावित है और दोनों के लेखन में काफी समानताएं हैं. इस मौके पर कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) स्थित अज्ञेय की जन्मस्थली का उद्धार कर वहां स्मारक बनवाने की भी मांग उठी.

बांग्लाभाषी लेखकों, कवियों और संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भागीदारी की वजह से यह समारोह हिंदी और बांग्ला भाषा के बीच एक सेतु के तौर पर भी अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहा.

Image caption समारोह का उद्घाटन उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने किया

समारोह का औपचारिक उद्घाटन उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने किया. उन्होंने भी कहा कि जन्मशती समारोह ने अज्ञेय की रचनाओं के अर्थ और विभिन्न पहलुओं की नए सिरे से जांच-पड़ताल का एक मौका दिया है. अंसारी ने इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की संपादित पुस्तक 'अपने-अपने अज्ञेय' का विमोचन भी किया.

अज्ञेय को समझने में गलती

समारोह में आए वामपंथी लेखकों और विचारकों ने माना कि अज्ञेय को समझने में गलती हुई है और मौजूदा दौर में उनको नए सिरे से समझने की जरूरत है.

लेखक और पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा, 'अज्ञेय को समझने में गलती हुई है. इसकी वजह यह थी कि उनको संदर्भ से काट कर देखा गया.' उनका कहना था कि जिस तरह अब गांधी को नए सिरे से देखा-समझा जा रहा है, कुछ वैसा ही अज्ञेय के साथ भी होना चाहिए. जोशी ने कहा कि अज्ञेय का व्यक्तित्व विराट था. उन जैसे व्यक्तित्व को किसी एक सांचे में बांधना ठीक नहीं है.

पत्रकार और लेखक मधुकर उपाध्याय ने कहा कि अज्ञेय निरंतर यात्राओं के बीच रचना करते रहे. अज्ञेय को किसी एक तरफ देखना हमारी अपनी मजबूरी है, अज्ञेय की नहीं.

वरिष्ठ कथाकार मृदुला गर्ग ने कहा कि कोई भी बाह्य यात्रा बिना आंतरिक यात्रा के संभव नहीं होती. उन्होंने कहा कि अज्ञेय किसी भी विचार को लेकर बैठे नहीं, न किसी धर्म और किसी एक विधा को लेकर ही बैठे.

वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि अज्ञेय छायावादियों के बाद हमारे समय के प्रकृति के सबसे बड़े कवि हैं. अज्ञेय को प्रकृति की जैसी बारीक जानकारी थी, वह हिंदी में किसी को नहीं है. सिंह ने कहा कि अज्ञेय को व्यक्तिवादी समझना बिल्कुल गलत है. उनका साहित्य किसी भी अर्थ में व्यक्तिवाद की प्रतिष्ठा नहीं करता.

वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ ने कहा, 'हमने एक दौर में अज्ञेय को गलत समझा. हम उनके विरोध में थे, शायद इसलिए हमने उन्हें समझा नहीं. अब वक्त आ गया है कि उन्हें ठीक से समझा जाए. अज्ञेय की यायावरी उनकी उदारता का सबूत है.'

वरिष्ठ कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि एक बड़े लेखक से हम उम्मीद करते हैं कि वह अपने समय और समाज को पहचाने और उसे हमसे परिचित कराने में सहायक हो. अज्ञेय ने यह किया. अज्ञेय ऐसे लेखक थे जिसने अनेक लेखकों को आगे बढ़ाने में मदद की. ऐसा लेखक हिंदी में ही नहीं, भारतीय भाषाओं में भी कम मिलेगा.

टैगोर का असर

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Image caption 'अज्ञेय के लेखन में टैगौर का प्रभाव था'

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा, 'अज्ञेय मानते थे कि राजनीति और साहित्य के बीच गहरा संबंध है. उनकी यह सोच आज भी प्रासंगिक है. अज्ञेय ने पत्रकारिता को गरीबों और दबे-कुचले लोगों की आवाज उठाने के लिए इस्तेमाल किया.'

उपराष्ट्रपति ने अज्ञेय को बहुमुखी प्रतिभावाला रचनाकार बताया और कहा कि उन्होंने अपने को विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के पदचिन्हों पर चलने वाली साहित्यिक शख्सियत के रूप में स्थापित किया.

अज्ञेय कोलकाता में ही टैगोर के संपर्क में आए थे. उनके लेखन पर टैगोर का काफी प्रभाव नजर आता है.

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय का कहना था कि अज्ञेय की रचनाओं में पूरे बंगाल की संस्कृति की झलक मिलती है. उनके मन पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की गहरी छाप थी. उनकी रचनाओं में टैगोर की झलक मिलती है.

प्रोफेसर केदारनाथ सिंह ने कहा कि अज्ञेय का कोलकाता और शांति निकेतन से गहरा नाता था. वे शांति निकेतन में गुरुदेव के संपर्क में आए थे. अज्ञेय के साहित्य में अछूतों और दलितों का जो जिक्र है, उसका संस्कार उनको कोलकाता में ही मिला था. उन्होंने गुरुदेव की रचना गोरा का हिंदी में अनुवाद किया था. अज्ञेय का साहित्य पूरी तरह टैगोरमय है.

जन्मस्थली के उद्धार की मांग

साथ ही समारोह में आए साहित्यकारों ने कुशीनगर स्थित अज्ञेय की जन्मस्थली के उद्धार की भी मांग उठाई. वह जगह पुरातत्व विभाग के अधीन है, जो उसे बुद्ध का निर्वाण स्थल बताता है. लेकिन बुद्ध का निर्वाण स्थल वहां से एक किलोमीटर दूर है. इस मुद्दे पर उपराष्ट्रपति को एक पत्र भेजने का भी फैसला किया गया.

समारोह में सरकार उस स्थान पर अज्ञेय का स्मारक बनवाने के प्रयासों में सहयोग की अपील की गई.

उपन्यासकार गिरिराज किशोर ने अज्ञेय के जन्मस्थल को मुक्त करवाने की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि इसके लिए सभी साहित्यकारों को मिलकर प्रयास करने चाहिए. इससे हम अपनी एक विरासत को संरक्षित कर सकेंगे.

किशोर ने कहा कि निराला से जुड़ी कई बहुमूल्य चीजें पर्याप्त संरक्षण नहीं मिल पाने की वजह से नष्ट हो गईं. कहीं ऐसा न हो कि अज्ञेय भी निराला की तरह एक मिथक हो जाएं.

बांग्ला और हिंदी का सेतु

Image caption सौमित्र सेन ने अज्ञेय की कविता का बांग्ला अनुवाद पढ़ा

बांग्ला लेखकों, अभिनताओं और साहित्य प्रेमियों ने गहरी रूचि दिखाई और इस अवसर पर अज्ञेय की कुछ कविताओं के बांग्ला और अंग्रेजी अनुवाद का पाठ बांग्ला फिल्मों के चर्चित अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने किया.

समारोह में बांग्ला फिल्मों के वरिष्ठ अभिनेता सौमित्र सेन ने अज्ञेय की चर्चित कविता ''नदी के द्वीप'' का बांग्ला अनुवाद पढ़ा.

अभिनेत्री अर्पिता चटर्जी ने उनकी कविता ''मैंने धूप से कहा'' के बांग्ला अनुवाद का पाठ किया. बांग्ला फिल्मों की चर्चित युवा अभिनेत्री ऋतुपर्णा सेनगुप्ता ने अज्ञेय की कविता ''नदी की बांक पर छाया'' का ''शैडो एट द बैंड आफ रिवर'' शीर्षक से अंग्रेजी अनुवाद का पाठ किया.

समारोह में अभिनेत्री देवश्री राय ने बांग्ला में स्वागत गीत गाया. बांग्ला लेखकों, कवियों और संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भागीदारी को ध्यान में रखते हुए ही आयोजक प्रभा खेतान फाउंडेशन के ट्रस्टी संदीप भूतोड़िया ने कहा कि महानगर में यह पहला मौका है जब किसी हिंदी लेखक के नाम पर आयोजित समारोह में बांग्ला भाषा के इतनी जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की हो. यह इस आयोजन की कामयाबी है. समारोह ने दोनों भाषाओं को करीब लाने में एक सेतु की भूमिका निभाई है.

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