'बहनजी हमारे स्वाभिमान का प्रतीक'

मायावती इमेज कॉपीरइट AP
Image caption बिजनौर के दलितों का कहना है कि उनका वोट तो मायावती को ही जाएगा

उत्तर प्रदेश के बिजनौर में रविदासनगर खोजने में परेशानी होती है, क्योंकि लोग इस इलाक़े को अभी भी चमरपाड़ा के नाम से बुलाते हैं. साफ सुथरी चौड़ी सड़कें, ताश खेलते लोग. लगता है फुर्सत में हों. बीच-बीच में बातचीत वोट किसको देना है.

मेरे हाथ में माइक देखते ही लोग हंसने लगे. बातचीत शुरू होते ही स्पष्ट हो गया कि मैं मायावती के गढ़ में खड़ा हूं. मैंने पूछा कि मायावती को ही क्यों तो जवाब आया, अरे आपको नहीं पता मायावती यहीं से पहली बार चुनाव लड़ कर जीती थीं.

हालांकि अब मायावती यहां से चुनाव नहीं लड़ती लेकिन रविदासनगर में उनके समर्थकों की कमी नहीं है. अमर सिंह सब्ज़ी बेचते हैं और मायावती के पक्के समर्थक. मैंने पूछा इस बार किस उम्मीदवार को वोट देंगे.

वो बोले, "हम उम्मीदवार को थोड़े ही वोट देते हैं. हम तो बहनजी को वोट देते हैं. इन्हीं गलियों में उठना बैठना रहा है उनका. इस मंदिर में कितनी बार वो सो जाती थीं पहले प्रचार के दौरान. सर्वजन के लिए काम किया है उन्होंने. क़ानून व्यवस्था ठीक की है."

लेकिन आप तो सब्ज़ी बेचते हैं, आपकी हालत में सुधार नहीं हुआ. अमर सिंह तपाक से कहते हैं, "अपना पेट पाल रहे हैं इज्जत से. कोई दिक्कत नहीं है. घर बना दिया बहनजी ने हमारा."

स्वाभिमान

बात समझ में नहीं आई. घर तो सरकार बनाती ही गरीबों का. पीछे बैठे एडवोकेट चंद्रशेखर ने मुझे इशारे से बुलाया और समझाने के अंदाज़ में बोले, "आप स्वाभिमान समझते हैं. स्वाभिमान दिया है बहनजी ने. चाहे जो हो जाए. हमारा वोट उन्हीं को जाएगा."

मायावती ने बिजनौर में बहुत अधिक प्रचार नहीं किया, लेकिन एक दिन पहले उनकी रैली में भारी भीड़ जुटी थी जो दलितों में उनके दबदबे का प्रमाण थी.

मैंने फिर पूछा, मायावती जी सिर्फ दलितों के लिए काम करती हैं, जवाब तैयार था अमर सिंह, जसवंत सिंह और आसपास खड़े सभी लोगों का- ऐसा नहीं है. उन्हें पिछली बार ब्राह्मणों ने वोट दिया था. इस बार भी उन्हें टिकट मिले हैं. वो बहुजन की नहीं सर्वजन की नेता हैं. यूपी में पांच साल शांति रही है.

लेकिन मूर्ति बनाना कितना जायज़ है. पूरी बातचीत में चुपचाप बैठे एक शिक्षक ने कहा, "आप एक बात बताइए. किस नेता ने मूर्तियां नहीं बनाईं. हम जब कांशीराम की मायावती जी की मूर्तियां देखते हैं तो गर्व महसूस करते हैं. बहनजी सत्ता से चली गईं तो भी ये मूर्तियां तो रहेंगी जो हमारे स्वाभिमान का प्रतीक हैं."

विकल्प

Image caption फूल सिंह के मुताबिक़ मायावती का कोई विकल्प नहीं

यहीं नहीं जब मैं फूल सिंह से मिला तो साफ हो गया कि दलितों में मायावती का कोई विकल्प नहीं. फूल सिंह पेशे से मोची हैं और जब हम उनसे मिले तो उनके चारों तरफ समाजवादी पार्टी के समर्थक बैठे थे.

लेकिन बिना किसी डर के फूल सिंह ने कहा, "यहां सब साइकिल वाले हैं लेकिन हाथी रौंदेगा देख लेना. उ हमरी बिरादरी की है. हम उ ही को वोट देंगे."

लेकिन आपकी हालत तो नहीं बदली. आप जूते ही बना रहे हैं अभी भी, फूल सिंह बोले, "आपको मालूम नहीं है. हमरा बेटा पुलिस की परीक्षा में दुई नंबर से फेल हो गया. बहनजी चाहती तो करवा देती लेकिन हमरा बेटा फेल ही रहा. लेकिन इससे क्या होता है. हम वोट मायावती को ही देंगे."

ये बात सुनकर मुझे बिहार की याद आई जहां लालू प्रसाद को भी दलित जनता ने इसी कारण दो बार जिताया था. मायावती भी शायद दलितों को स्वाभिमान का हवाला देकर इन चुनावों में एकमुश्त वोट लेने की कोशिश में हैं और लगता है कि उनका तीर निशाने पर बैठा है.

संबंधित समाचार