‘जीतने के बाद तो दिखे नही अजहरुद्दीन मियां’

  • 1 मार्च 2012
हाजी मोहम्मद कलीम
Image caption हाजी मोहम्मद कलीम के मुताबिक़ सरकार ने केवल बड़े उद्योगपतियों का हित सोचा है.

उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव के अंतिम चरण में मुरादाबाद भी शामिल हैं. पीतल उद्योग के लिए चर्चित मुरादाबाद में लोगों की शिकायत सरकार से लेकर सांसद तक से है, आरोप है कि इनका भला किसी ने नहीं सोचा.

'पीतल की विदेशों में तो पूछ है लेकिन हमारी पूछ कहीं नहीं हैं' - ये दर्द है मुरादाबाद में पीतल के छोटे कारोबारियों का.

हाज़ी मोहम्मद कलीम शहर के पीरजादा इलाक़े में अपनी छोटी सी फैक्ट्री चलाते हैं.

उनका रोना बिजली की तंगी को लेकर तो है ही, वो आरोप लगाते हैं कि सरकार बड़े उद्योगपतियों को हर तरह की सुविधा देती है लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए कोई सहूलियत नहीं है.

पीरजादा का इलाक़ा बेहद गंदा और संकरी गलियों वाला है. छोटे-छोटे कमरों में पीतल की पॉलिशिंग और फर्निंशिंग का काम होता है.

मोहम्मद कलीम की फैक्ट्री में दो-चार मज़ूदर काम करते हैं.

कलीम कहते हैं, ''पीतल के काम में बिजली की सबसे अधिक ज़रुरत है लेकिन आप देखिए अभी भी बिजली नहीं है. जेनरेटर चलाते हैं तो धुआं होता है. बाल बच्चे बीमार पड़ते हैं.''

उनसे सवाल पूछने पर कि क्या माल निर्यात होता है तो अच्छे पैसे नहीं मिलते, कलीम कहते हैं, ''आप जितना समझ रहे हैं उतना पैसा नहीं मिलता है. हमें काम मिलता है 500 पीस का या 1000 पीस का. हमारा काम है माल तैयार कर के निर्यातकों को दे देना. वो फिर उसमें लाभ कमाते हैं. बाहर का खरीदार हमारे कारखाने में क्यों आएगा. यहां तक तो गाड़ी भी नहीं आती है.''

रोजगार की मुश्किल

कलीम के कुछ मज़दूर काम भी छोड़ गए हैं.

कलीम कहते हैं, ''कई मज़ूदर तो रिक्शा चला कर भरण पोषण कर रहे हैं. कुछ दिल्ली में जींस फैक्ट्रियों में लग गए. हम मेहनताना तक नहीं दे पा रहे हैं. तीन महीने काम होता है, जब कोई मेला लगता है तो आर्डर आते हैं.’’

लेकिन फिर पीतल निर्यात कैसे होता है और इस व्यवसाय में पैसा क्या बिल्कुल नहीं है. कलीम कहते हैं कि पूरा खेल बड़े व्यापारियों तक सीमित होता जा रहा है.

वो बताते हैं, ''आप समझ नहीं रहे हैं. होता ये था कि हम छोटे स्तर पर फैक्ट्री में माल तैयार कर के निर्यातकों को देते थे. वो उसे विदेश में बेचते थे. अब निर्यातकों ने अपनी बड़ी बड़ी फैक्ट्री बना ली है. इन बड़ी फैक्ट्रियों को उद्योग के नाम पर चौबीस घंटे बिजली मिलती है. बताइए हमको घाटा नहीं होगा तो क्या होगा. बड़ी फैक्ट्री को बड़ा आर्डर. छोटा आदमी तो मारा गया न.’’

Image caption पीतल व्यापारी इस बात से भी परेशान हैं कि कारखाने में काम के लिए मजदूर नहीं मिलते.

कलीम अकेले पीतल कारोबारी नहीं हैं जो परेशानी के दिन देख रहे हैं. उनके साथ खड़े नईम और आलम की भी यही कहानी है.

बिजली की किल्लत

मुरादाबाद में पचास प्रतिशत लोग पीतल के कारोबार से जुड़े हैं तो क्या वो बिजली के लिए राजनीतिक दबाव नहीं बना पाते.

आलम कहते हैं कि सभी राजनीतिक दल वादे करते हैं कि बिजली की कमी पूरी की जाएगी लेकिन कोई वादा पूरा नहीं करता है.

वो कहते हैं, ''हमें कांग्रेस पार्टी से उम्मीद थी लेकिन उसकी सरकार ही नहीं है यहां. वर्तमान सरकार ने हमारा कुछ भी भला नहीं किया. सब फायदा बड़े उद्योगपतियों को मिला है.''

पीरजादा की गंदी गलियों से निकलते हुए याद आया कि यहां के सांसद अज़हरुद्दीन हैं और राबर्ट वाड्रा का संबंध भी इसी शहर से हैं.

मैंने साथ चल रहे कलीम से पूछा कि आपने अज़हरुद्दीन को जिताया था तो क्या हुआ.

कलीम बोले, ''जीतने के बाद तो कभी इस गली में दिखाई नही दिए अज़हुरुद्दीन मियां. और राबर्ट साहब तो बस नाम के ही हैं मुरादाबाद के. वो तो दिल्ली के हो लिए.''

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