बादलपुर और सैफई, माहौल-मूड अलग-अलग

  • 2 मार्च 2012
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Image caption मायावती के गांव बादलपुर के लोग मायावती से ज्यादा खुश नहीं हैं

बादलपुर और सैफई दोनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाने-माने गाँव हैं.

दोनों ने उत्तर प्रदेश को ऐसे नेता दिए हैं, जो पिछले करीब दो दशक से अधिक समय से न केवल राज्य बल्कि देश की राजनीति के केंद्र में हैं.

दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा या गौतम बुद्धनगर का बादलपुर वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती का गाँव है जबकि इटावा का सैफई पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का.

मगर दोनों का अपने गाँव वालों से बिल्कुल अलग किस्म का रिश्ता है और इसलिए इस चुनाव में दोनों का माहौल और मूड बिलकुल अलग-अलग है.

दलित टोले की ऊषा अपनी बुआ मायावती की पांच साल की सरकार से संतुष्ट दिखीं. वो खुशी- खुशी मुझे मायावती के पिता प्रभुदयाल का पुराना मकान दिखाने ले गयीं. पच्चीस-तीस वर्ग गज में बने इस छोटे से मकान के बाहर अब प्रभु दयाल के नाम की तख्ती नहीं लगी है.

उन्होंने इसे अपने परिवार के ही किसी और को बेंच दिया है. मायावती के चाचा–ताऊ गाँव में रहते हैं. लेकिन उनका सगा परिवार अब दिल्ली में रहता है.

ऊषा कहती हैं, ''मायावती ने गाँव काफी बदल दिया है. बहुत अच्छी सुविधा कर दी है. लड़कियों के लिए इंटर कॉलेज, बी.एड. पढाई की व्यवस्था कर दी. बहुत अच्छा कर दिया. पार्क वगैरह सब कर दिया.''

पड़ोस के युवक विशेन्द्र नागर की नजर में मायावती विकास की पार्टी हैं, इसलिए उन्हीं को समर्थन है.

मायामहल से नाराजगी

मगर दलित टोले से बाहर आते ही जैसे हर कोई मायावती से नाराज दिखा.

किसान मामराज सिंह ऊषा की बात का खंडन करते हुए कहते हैं, ''पिछले पांच साल में मायावती ने केवल अपना महल और दो पार्क बनवाए, बाकी ये जो स्कूल-अस्पताल हैं, ये दसियों साल पहले मुलायम सिंह के टाइम के या उससे पहले के हैं.''

गाँव की पुरानी आबादी से बाहर आते ही एक बड़े गुम्बद और ऊँची चहारदीवारी वाला आलीशान महल दिखाई देता है. करीब सवा सौ बीघे का यह महल कई साल से बन रहा है. उसके एक तरफ कंटीले तार से घिरा हेलीपैड है और महल के चारों ओर नए बने पार्क, जिनमें हरी घास लगाकर पौधे रोपे गए हैं.

गाँव वालों का कहना है कि ये सब नहर के किनारे के उपजाऊ खेत हैं जिन्हें ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने महल की शोभा बढाने के लिए पार्कों में तब्दील कर दिया है.

महल के मुख्य द्वार के ठीक सामने दो छोटे-छोटे मकान और कुछ दुकानें अभी तक अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रही हैं क्योंकि इनका मालिक फ़ौजी है.

Image caption जेवरा कहते हैं कि मायावती ने वो जमीन भी छीन ली जो दलितों को पट्टे पर मिली थी

हाथ में लाठी लिए बुजुर्ग जेवरा ने बताया कि मायावती ने ये सब जमीनें जबरदस्ती छीनी हैं और वो जमीन भी नही छोडी जो कभी दलितों को पट्टे में मिली थीं.

जेवरा कहते हैं, ''लखनऊ गए लोग मगर उसने किसी की सुनवाई नही की. मिली भी नही किसी से. सबने कोर्ट में केस डाल दिए हैं.''

विरोध में गाँव वालों ने धरना दिया. लाठी खाई, जेल गए, कोर्ट गए. मगर हाईकोर्ट से भी हार गए. अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

मुकदमा करने वालों में खडक सिंह, योगेश, मामराज सिंह, जगदीश नम्बरदार और दूसरे बहुत से लोग हैं.

मामराज सिंह कहते हैं कि मुझे तीन बीघे जमीन का जितना मुआवजा मिला, उससे मैं नोएडा में तीन सौ गज जमीन भी नही खरीद सकता.

मामराज कहते हैं, ''मायावती दलालों से घिरी हैं जो उन्हें गुमराह करते हैं. आदमी जब रोता है, तब कुछ तो रहम आता है, लेकिन हमें तो मायावती के सामने रोने का भी मौका नही मिला.''

'सबकी बने इसकी न बने'

Image caption मायावती के गांव बादलपुर के लोग अपनी बात खुलकर कह रहे हैं

गाँव से निकलकर मैं मतदान केंद्र की तरफ आया जहाँ बड़ी तादाद में लोग बैठे थे. इन सबको छह मार्च को वोटों की गिनती का इंतजार है.

जगदीश नम्बरदार और उनके तमाम साथी एक स्वर से कहते हैं, ''किसी की बने पर इसकी न बने. देख लिया पांच साल. जो आगे बन गई, तो बर्बाद कर देगी. मारेगी और डंडे लगवाएगी. अबकी बार नही छोड़ेगी. कहेगी तुम गए मेरे खिलाफ कोर्ट में. ऐसा है कि इसका बस टू प्वाइंट प्रोग्राम है- लूट और झूठ.''

चुनाव के सिलसिले में केन्द्रीय सुरक्षा बल और मजिस्ट्रेट गाँव में तैनात थे, शायद इसलिए भयमुक्त वातावरण में ये लोग अपनी बात खुलकर कह सकते थे.

इसमें कोई शक नही कि बादलपुर का बहुजन अपनी बेटी के राज से मुक्ति चाहता है.

अब बात सैफई की

सैफई का माहौल इससे उलट था. वहाँ गाँव के सारे लोग नेता जी की सरकार वापस चाहते हैं.

लखनऊ जैसा पीजीआई अस्पताल बन जाने से गाँव का हुलिया ही बदल गया है. सुदूर आजमगढ़ तक के लोग यहाँ इलाज के लिए आते हैं. इसलिए गाँव में चौबीस घंटे चहल-पहल रहती है.

Image caption सैफई स्थित मुलायम सिंह के इस घर के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं

मेडिकल कॉलेज के आलावा सैफई में एक बड़ा स्टेडियम, डिग्री कॉलेज, तहसील, विकास खंड कार्यालय, ऑडिटोरियम, गेस्ट हाउस वगैरह कई इमारतें बन गई हैं. इनसे यहाँ का नक्शा ही बदल गया है.

सैफई से बारह किलोमीटर दूर बनी हवाई पट्टी पर बड़े विमान उतरते हैं. इसके निर्माण को लेकर मुलायम सिंह की कड़ी आलोचना हुई. इस चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस हवाई पट्टी का इस्तेमाल किया.

चाय और किराना दुकानदार राम शंकर गुप्ता बताते हैं कि मुलायम सिंह सरकार ने सैफई और उसके आसपास के तेरह गाँवों को पूरा बदल दिया. उनके हटने से सारे काम अधूरे पड़े हैं.

वहीं चाय पीते-पीते राम मोहन दुबे आ गए. राम मोहन दुबे ने बताया कि उनके चार भाइयों की करीब पौने चार सौ बीघे जमीन विकास के लिए गई, मुआवजा भी ठीक मिला और परिवार के लोगों को नौकरी भी.

राम मोहन दुबे के मुताबिक़, ''यहाँ पहले कुछ नही था. सुनसान सड़क पर लोग लुट जाते थे. अब आधी रात को भी कोई डर नही. हम ब्राह्मण हैं पर कोई तकलीफ नही.''

'मुलायम की सरकार बनेगी'

Image caption मंशा राम कहते हैं कि मुलायम सरकार में दलितों के भी काम हुए, लेकिन मायावती सरकार में केवल जाटव को नौकरी मिली

दूसरे छोर पर मोहन लाल मार्केट में मंशा राम धोबी और उनके साथ खड़े लोगों का कहना था, ''नेता जी अक्सर गाँव आते हैं. होली-दीवाली या किसी के घर में गमी हो जाए तो सबसे घर वालों की तरह मिलते हैं. कोई बच्चा भी उनसे मिल सकता है.''

मंशा राम कहते हैं कि नेता जी की सरकार में दलित लोगों के भी काम हुए और नौकरी मिली. लेकिन मायावती सरकार में केवल जाटव को नौकरी मिली, धोबी, कुम्हार और दूसरे लोगों को कुछ नही मिला.

यहीं से थोड़ी दूर आगे चलकर मुलायम सिंह की कोठी है, जिस पर समाजवादी पार्टी का झंडा लगा है. उसके बगल में ही एक अहाते में ढेर सारी गाय और भैंसे हैं. मुलायम सिंह के एक भाई खेती-किसानी और जानवरों की देखभाल करते हैं.

पहले जो कच्चा मकान था, उसकी जगह अब पक्का मकान बन गया है.

मुलायम सिंह के घर का दरवाजा खुला है. कोई भी जा सकता है. सामने मुलायम सिंह के चचेरे भाई राम दास और अतर सिंह रहते हैं.

'अबकी नहीं कर पेहें गलती'

राम दास कहते हैं कि आजादी के बाद सन 77 तक यहाँ कोई विकास नही हुआ. कांग्रेस के हटने पर ही यहाँ विकास हुआ जब चौधरी चरण सिंह गृह मंत्री बने.

मुलायम सिंह वर्ष 1967 में विधायक बन गए थे, लेकिन विकास तभी शुरू हुआ जब 1977 में वो जनता पार्टी सरकार में मंत्री बने. इसीलिए बुजुर्ग लोग उन्हें मुख्यमंत्री बनने के बाद भी मंत्री कहते हैं.

Image caption मुलायम सिंह के चचेरे भाई अतर सिंह कहते हैं कि पूरे प्रदेश में मुलायम सिंह के नाम पर वोट मिल रहे हैं

इस गाँव से मुलायम सिंह के अलावा बेटे अखिलेश यादव, चचेरे भाई राम गोपाल यादव, भतीजे धर्मेन्द्र यादव सांसद हैं. सगे भाई विधानसभा में विरोधी दल के नेता हैं.

अतर सिंह कहते हैं कि पूरे प्रदेश में मुलायम सिंह के नाम पर वोट मिल रहा है और उनकी सरकार बनेगी.

मैंने कहा कि मगर लोग शिकायत करते हैं कि सरकार बनती है तो समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता लोगों को परेशान करते हैं.

राम दास कहते हैं, ''कार्यकर्ता कुछ गलती कर तो जाते हैं. अबकी नहीं कर पेहें गलती. नेता जी भी मने हैं कि कार्यकर्ता गलती कर जाते हैं. नेता जी को पूछत नही.''

किस तरह की गलती, मैंने पूछा. राम दास बताते हैं कि जैसे ठेकदार लोग काम पूरा नहीं करते और पेमेंट ले लेते हैं जो मंत्री जी को पता नही चलता.

अतर सिंह यादव कहते हैं, ''अबकी ऐसा नही होगा. अखिलेश ने कह दिया है कि ऐसा होने नही देंगे.''

किसी को शक न रहें कि अब सैफई राज घराने की बागडोर अखिलेश के हाथ में आ गई है.

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