'भारत में नहीं हैं अमरीकी विशेष बल के दस्ते'

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Image caption विलर्ड के अनुसार अमरीकी सैन्य दल मुंबई की आतंक निरोधी दस्ते के साथ मिलकर ट्रेनिंग आयोजित कर रही है. (फ़ाईल फ़ोटो)

भारत ने पेंटागन की उस ख़बर का खंडन किया है जिसमें कहा गया था कि अमरीका सेना के विशेष बल का दस्ता भारत में मौजूद है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि 'किसी भी रूप में अमरीकी सरकार ने ना तो कभी विशेष बल की तैनाती का आग्रह किया है और ना ही कभी भारत ने इसकी अनुमति दी है'.

विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "दोनों देश आतंकवाद रोधी सहयोग और क्षमता निर्माण के लिए कभी-कभी विशेष बलों का अल्प कालीन अभ्यास करते हैं."

इससे पहले पेंटागन के एक वरिष्ठ कमांडर ने कहा है कि अमरीकी सेना के विशेष बल के सहायता दस्ते भारत समेत पांच दक्षिण एशियाई देशों में मौजूद हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने अमरीकी कमांडर के हवाले से कहा है कि ये दस्ते देशों की सेनाओं के साथ मिलकर चरमपंथ से लड़ने में सहयोग कर रहे है.

अमरीकी कमांडर एडमिरल रोबर्ट विलर्ड ने कहा है कि इन विशेष सैन्य दलों को अमरीकी पैसिफिक कमांड ने चरमपंथ विरोधी गतिविधियों खासतौर पर समुद्री सुरक्षा के लिए तैनात किया है.

भारत के साथ चरमपंथ विरोधी गतिविधियों में सहयोग के मामले पर विलर्ड ने अमरीकी सांसदों से कहा, “हमारे पास विशेष सहायता दस्ते हैं, जिसे हमने पैसिफिक सहायता दल का नाम दिया है. ये नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और भारत में तैनात हैं.”

उन्होंने कहा, “हम भारत के चरमपंथ विरोधी प्रयासों में उनके साथ एकजुट होकर काम कर रहें हैं, खास तौर पर समुद्री सुरक्षा पर. हम उनकी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहें है जिसमे सिर्फ रक्षा मंत्रालय ही नहीं बल्कि दूसरी सुरक्षा एजेंसियां भी शामिल हैं.

हालाकि नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास के एक प्रवक्ता ने इसका खंडन करते हुए कहा है कि भारत में अमरीकी सेना का कोई भी विशेष सैन्य दस्ता मौजूद नहीं है.

"लश्कर बेहद खतरनाक"

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Image caption एडमिरल रॉबर्ट विलर्ड ने कहा कि पाकिस्तान में स्थित लश्कर-ए-तैबा बेहद खतरनाक संगठन है

विलर्ड ने कहा कि पाकिस्तान में स्थित लश्कर-ए-तैबा बेहद ख़तरनाक संगठन है. उनके पास ना सिर्फ़ सुरक्षित ठिकाने हैं बल्कि उनके मंसूबों के अनुरूप उनके पास अंतरराष्ट्रीय योजनाएं मौजूद है. इसलिए हम उसी इलाक़े के देशों के साथ मिलकर काम कर रहें है ताकि इस ख़तरे पर नियंत्रण पाया जा सके.

कमांडर विलर्ड अमरीकी कांग्रेस के सांसद जो विल्सन के उस सवाल का जवाब दे रहे थे, जिसमे उन्होंने पूछा था कि लश्कर-ए-तैबा के ख़तरे से निबटने के लिए अमरीकी सेना क्या कर रहीं है.

विलर्ड ने कहा, “भारत में मुंबई हमलों के अलावा कई हमलों के लिए ज़िम्मेदार लश्कर-ए-तैबा पाकिस्तान में स्थित है. ये अफ़गानिस्तान में भी चरमपंथी गतिविधियों को सहयोग देता है और चाहता है कि उसका दायरा एशिया, यूरोप और उत्तरी अमरीका तक बढ़ जाए.”

उन्होंने कहा कि पैसिफिक कमांड की भारत के साथ मिलकर काम करने की पहल में अमरीकी दल मुंबई की आतंक निरोधी दस्ते के साथ मिलकर ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित करती रही है.

नेटो में सहभागिता

पेंटागन के एक अन्य वरिष्ठ कमांडर ने अमरीकी सांसदों से कहा है कि नेटो में सहभागिता निभाने के लिए भारत और ब्राज़ील की सदस्यता पर विचार किया जाना चाहिए.

नेटो के यूरोपीय मामलों के सुप्रीम संयुक्त कमांडर एडमिरल जेम्स स्टेवरेडिस ने कहा, “अपने काम को और आगे बढ़ाने के लिए मुझे लगता है कि हमें भारत और ब्रज़ील को अपना सहयोगी बनाने पर विचार करना चाहिए.”

नेटो और भारत के बीच सहभागिता के मामले पर शायद ये पहली बार है जब पेंटागन के किसी वरिष्ठ अधिकारी ने ऐसा बयान दिया हो.

अधिकारी ने सांसदों से ये भी कहा कि उनके इस विचार को अमली जामा पहनाना शायद उतना आसान ना हो.

विवाद

अमरीका की भारत में मौजूदगी को लेकर पहले कई विवाद हो चुके हैं.

साल 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान प्रशांत महासागर क्षेत्र से भारत के रास्ते खाड़ी देशों में जाने वाली अमरीकी लड़ाकू विमानों में मुंबई के अतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ईधन भरने की अनुमति देने के फैसले पर राजनीतिक संकट गहरा गया था.

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्र शेखर को किसी और राजनीतिक दल के मुकाबले इराक के खिलाफ ज्यादा सख्त रवैया रखने का आरोप लगाया गया. उन पर अमरीका को संतुष्ट करने के लिए नीतियां बनाने के भी आरोप लगे.

एक अन्य मामले में एफबीआई को भारत में दफ्तर खोलने की अनुमति देने पर भी हंगामा मचा था.

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