यूपी चुनाव में बिहार की चर्चा क्यों?

  • 4 मार्च 2012
Image caption यूपी विधानसभा चुनाव में इस बार बड़ी संख्या में लोगों ने मतदान किया

अंतिम चरण में चुनाव की रिपोर्टिंग से पहले मुझे थोड़ा तनाव जरुर था क्योंकि मैंने पहले कभी उत्तर प्रदेश से रिपोर्टिंग नहीं की थी.

वो भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश जो दिल्ली से सटा होने के बावजूद मेरे लिए बिल्कुल नया था.

कार्यालय में इलाके के मित्रों ने आश्वस्त किया कि चिंता न करो-लोग खूब जम के बातें करते हैं चाहें किसान हों, जमींदार हों या नौकरीपेशा हो.

बात करने में बरेली, बिजनौर और बदायूं के लोगों का जवाब नहीं है.

ये बात बिल्कुल सही साबित हुई. जब भी बातचीत के लिए माइक निकाला तो किसी ने अपनी बात कहने में न तो संकोच दिखाया और न ही फोटो खिंचवाने से झिझके.

इलाक़े में सड़कें बुरी नहीं थीं, हां भीड़भाड़ और गाड़ियां बहुत अधिक-ऐसा मुझे लगा.

हो भी क्यों न. कुछ इलाके तो बेहद संपन्न माने जाते हैं. बातचीत के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि अधिकतर लोगों को बड़ी शिकायत तो नहीं है लेकिन वो कहीं न कहीं ठगा हुआ सा या फिर विकास की दौड़ में पीछे छूटा हुआ सा महसूस कर रहे हैं.

बिहार से तुलना

इस भावना को जबान पर लाने के लिए कोई सरल-सीधा वाक्य नहीं था.

कुछ यही हाल उम्मीदवारों और स्थानीय नेताओं का था. पहले तो मुझे लगा कि मैं वाक्यों के बीच में कुछ अधिक पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं फिर मैंने स्पष्ट कहा कि कोई उदाहरण दीजिए तो शायद मैं समझूं.

फिर जो बात सामने आई वो चौंकाने वाली थी और यह बात कई लोगों ने कही.

लोगों का कहना था कि वो पहले इस बात से संतोष कर लेते थे कि उनकी हालत बिहार से अच्छी है लेकिन अब बिहार में भी विकास के नाम पर राजनीति हो रही है और हम अभी भी जाति और बिरादरी के नाम पर वोट मांग रहे हैं और वोट दे रहे हैं.

बिहार का नाम सुनना सुखद आश्चर्य ...

मैंने थोड़ा और कुरेदा तो एक सज्जन बोले- भई इसमें छुपाने वाली बात क्या है. बिहार में हालात सुधरे हैं ऐसा सुनने में आया है. विकास के नाम पर दोबारा सरकार बनी है. उसी में पिछड़ी जातियों को फ़ायदा भी हुआ है मुसलमान भी वहां खुश है. हम भी चाहते हैं यूपी में विकास के नाम पर राजनीति हो. जो चुन कर आए वो विकास करे. हम पीछे छूट गए हैं. जहां पांच साल पहले थे वहीं अटक गए हैं ये हमारा सबसे बड़ा दुख है.

मतदाता तो मतदाता, इस दौरान ड्यूटी करने वाले एक पुलिसकर्मी ने जब ये पूछा कि बिहार में क्या और कितना विकास हुआ है तो मैं बताए बिना नहीं रह सका कि बिहार में कुछ तो विकास जरुर हुआ है.

पुलिसवाले का कहना था, “साहब देख लीजिए हमीं पीछे छूट रहे हैं. उलटी दिशा में जा रहे हैं हम तो.”

मैंने बिहार के बारे में कई जगहों पर हिकारत भरी बातें सुनी हैं जाति, पिछड़ेपन और न जाने किन किन कारणों से लेकिन पहली बार किसी दूसरे राज्य के लोगों से सुन कर लग रहा था कि बिहार लोगों को प्रेरित भी कर रहा है.

मैने यात्रा के दौरान जब ये बात कई बार सुनी तो लगा कि ये मेरे लिए बड़ी बात है और इसे डायरी में लिखना बेहद जरुरी है. लिखा तो सोचा आप लोगों से भी साझा कर लूं.

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