क्या सचमुच 'वोट-बैंक' हैं मुसलमान

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Image caption उत्तरप्रदेश में हालिया विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में नजर आए

बरेली में रविवार की एक सुबह, गर्म चाय की प्यालियों, और मद्धिम आवाज़ में बजते संगीत के बीच, माजिद और उनकी पत्नी शीबा में चंद दिनों में होनेवाले मतदान पर चर्चा जारी थी. बात घूम फिरकर वहीं आती कि मैदान में मौजूद प्रत्याशियों में सबसे बेहतर कौन है.

लगभग दूसरे मतदाताओं की तरह माजिद और शीबा भी अपना वोट एक सक्षम, ईमानदार और जनता के लिए काम करने वाले उम्मीदवार को डालने के पक्षधर हैं.

कॉल सेंटर में काम करनेवाली बदायूं निवासी हिना खान तो सीधे कहती हैं, “क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं इसलिए आप ये सवाल पूछ रहे हैं? वो व्यंग्य वाले अंदाज़ में कहती हैं, “नहीं हम भेड़ चाल नहीं चलते, सारे मुसलमान एक मन बनाके, एक तरफा वोट नहीं देते हैं.”

सवाल

अगर माजिद, डाक्टर शीबा और हिना ख़ान के लिए चुनावी उम्मीदवार की गुणवत्ता ही वोट देने की प्रमुख कसौटी है तो फिर आखिर मुस्लिमों को बार-बार क्यों एक वोट बैंक बताया जाता है?

क्यों समझा जाता है कि वो एकमत तैयार कर, बड़ी तादाद में पॉलिंग बूथ पर पहुंचते हैं, और एकतरफ़ा वोट डालते हैं? या, फिर किसी मौलाना या मुस्लिम धार्मिक नेता को मंच पर बिठा लें, उनके घर हो आएं, या उनसे अपने पक्ष में कुछ कहलवा लें और मुसलमान वोट पक्का!

जाने माने चुनाव विद योगेंद्र यादव ने लिखा है कि इस बात का कोई सबूत नहीं कि मुसलमान बहुसंख्यक हिंदुओं की तुलना में अधिक संख्या में मतदान करते हैं.

Image caption बदायूं की हिना खान कहती हैं कि मतदान के मामले में मुसलमान भेड़ चाल नहीं चलते

योगेंद्र यादव कहते हैं, “ये धारणा नगरीय क्षेत्रों के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में मतदान केंद्रों के सामने समुदाय से ताल्लुक रखने वालों की लंबी कतारें, ख़ासतौर पर ग़रीब वर्ग से संबंध रखने वाले ऐसे वोटरों और महिलाओं को देखकर तैयार हुई हैं. जो दूर से ही दूसरों से अलग दिखते हैं.”

उनका कहना है कि राजनीतिक शोध में ये बात सामने आई है कि 1996 के बाद हुए अधिकांश चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या हिंदू वोटरों से कम रही है.

मौलाना-इमाम

भारतीय जनता पार्टी हमेशा अन्य दलों, खासतौर पर कांग्रेस पार्टी और बाद में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह पर मुस्लिम धार्मिक नेताओं की शरण में जाकर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है.

लेकिन 2004 संसदीय चुनावों से पहले बीजेपी ने ख़ुद दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी और मौलाना वहीदुद्दीन खान और दूसरे इमामों और मौलवियों को अपने पक्ष में लाकर ‘अटल बिहारी वाजपेयी हिमायत समिति’ नाम का संगठन तैयार करवाया.

समिति ने हिमायत कारवां नाम से यात्रा निकाली और मुस्लिमों से बीजेपी को समर्थन की अपील की लेकिन 2004 संसदीय चुनावों में बीजेपी की हार हुई.

भारत में बरेलवी मुस्लिम पंथ के सबसे बड़े धर्म गुरू मौलाना अहमद रज़ा ख़ान की दरगाह के प्रवक्ता मौलाना शहाबुद्दीन बरेलवी कहते हैं, “अगर किसी फ़िक़ (पंथ) के रहनूमा किसी उम्मीदवार के हक में एलान करें तो शायद इसका सही असर देखने में आए ... लेकिन ऐसे रहनूमा इस तरह की कारगुज़ारियों से परहेज़ करते रहे हैं.”

बुखारी

इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली राजनीतिक पत्रिका ‘माया’ के एक लेख में कहा गया था कि इमाम अब्दुल्लाह बुखारी (अहमद बुखारी के पिता) जैसे कथित मुस्लिम नेता हवा का रूख भांपकर उसी राजनीतिक दल के समर्थन की बात करते हैं जो जीतने वाली हो.

कहा गया था कि शायद इसलिए इंदिरा गांधी के ‘इमरजेंसी’ से दूसरे भारतीय वोटरों की तरह नाराज़ मुस्लिम समुदाय के जनता पार्टी को दिए गए समर्थन को, या फिर 1980 में जनता पार्टी के आपसी कलह के बाद फिर से कांग्रेस पार्टी के पक्ष में गए मुसलमानों के वोट को इमाम बुखारी जैसे लोगों की अपील से जोड़ दिया गया.

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Image caption बाबरी मस्जिद मूवमेंट से जुड़े मुस्लिम रहनूमा ज़फरयाब जिलानी मानते हैं कि मुसलमान आज़ादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहे.

पत्रिका ने आंकड़ों की मदद से तैयार विस्तृत लेख में साफ कहा था कि अधिकांश समय अल्पसंख्यकों ने देश के बकिया वोटरों के पैटर्न पर ही मतदान किया है. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 में हुए संसदीय चुनावों में मुसलमान भी बकिया मतदाताओं की तरह राजीव गांधी के पक्ष में थे.

इस बीच 1986 में, जब केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें थीं, विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया गया, फिर तीन सालों बाद वहां शिलान्यास हुआ, जिसे लेकर मुसलमान बुरी तरह से आहत और कांग्रेस से नाराज़ थे.

विश्लेषक इसे वर्तमान के दशकों में मुस्लिम वोटिंग ट्रेंड में आए बदलाव के तौर पर देखते हैं जिसके बाद मुसलमान अभी भी पूरी तरह से कांग्रेस के साथ नहीं हुए.

मजबूरी

बाबरी मस्जिद मूवमेंट से जुड़े मुस्लिम रहनूमा ज़फरयाब जिलानी मानते हैं कि मुसलमान आज़ादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहे. लेकिन वो इसकी वजह मुसलमानों को “बंटवारे के लिए सीधे-सीधे ज़िम्मेदार ठहराए जाने के मनोवैज्ञानिक दबाव और राजनीतिक मजबूरी” को मानते है.

ज़फरयाब जिलानी कहते हैं, “उस समय कांग्रेस के अलावा सेक्युलर विचारधारा वाला कोई और राजनीतिक दल था ही नहीं, और जाहिर है मुसलमान जनसंघ को तो वोट नहीं दे सकते थे. लेकिन 1967 में जब उत्तर प्रदेश में दंगे हुए और अलीगढ़ के अल्पसंख्यक किरदार का मामला उठा तो मुसलमानों ने कांग्रेस से दूरी बना ली थी.”

राजनीतिक विश्लेषक भारत भूषण कहते हैं कि जब सांप्रदायिक दंगों का मामला आता है, मुसलमानों को अस्तित्व का ख़तरा नज़र आता है. जब उनकी पहचान पर सवाल उठाए जाने लगते हैं तो वो एक समुदाय की तरह वोट करते हैं. जैसे उन्होंने भागलपुर दंगों के बाद बिहार में लालू प्रसाद या फिर बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान मुलायम सिंह यादव के लिए किया.

वो कहते हैं, “दूसरे मतदाताओं से अलग मुसलमानों की अपनी समस्याएं हैं- सुरक्षा की, पिछड़ेपन की, राजनीतिक हिस्सेदारी की; जो पार्टी ये हिस्सेदारी देती है या कहती है कि वो इसे देने के लिए तैयार हैं मुसलमान उसके साथ जाते हैं.”

वादा

मुस्लिम राजनीति में पिछले दिनों में ये बदलाव देखा जा रहा है कि मुसलमान अब धार्मिक दंगों से सुरक्षा से आगे बढ़कर ठोस कार्यक्रमों की मांग कर रहा है.

क्या इसलिए कि गुजरात के बाद मुसलमानों को किसी बड़े धार्मिक दंगे से दो-चार नहीं होना पड़ा है और बाबरी-रामजन्म भूमि का मामला बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद भी गरमा नहीं रहा?

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने पिछड़ों को मिलने वाले 27 फ़ीसद आरक्षण में से साढ़े चार प्रतिशत अल्पसंख्यकों को देने का वादा किया है.

समाजवादी पार्टी ने तो 18 फ़ीसदी आरक्षण की मांग की है.

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उदय ने मुसलमानों को कांग्रेस के अलावा नए राजनीतिक विकल्प प्रदान किए हैं. इन दलों ने चुनाव के दौरान अधिक टिकटें देकर समुदाय को बेहतर राजनीतिक हिस्सेदारी भी दी है.

साल 2009 के संसदीय चुनावों के समय बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के कुल टिकटों में मुसलमानों की हिस्सेदारी 13.5 से लेकर 19 फ़ीसद तक थी.

हाल के दिनों में उत्तर और उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों में वैसे दल तैयार होकर राजनीतिक मैदान में आए हैं जो सिर्फ़ मुस्लिम हितों की बात करती हैं या फिर मुस्लिम-दलित गठबंधन को आगे बढ़ाना चाहते हैं.

लेकिन अभी तक सिवाए असम के असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के, किसी को ठोस कामयाबी हासिल नहीं हुई है.

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