कृषि से मुह मोड़ते किसान

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Image caption नई पीढ़ी का कहना है कि अकेले कृषि क्षेत्र उन्हें एक आरामदायक जीवन नहीं दे सकता.

भारत में कृषि क्षेत्र जिस गंभीर संकट से गुजर रहा है उसका एक संकेत अगर किसानों की आत्महत्याओं से मिलता है तो वहीं दूसरा संकेत ऐसे किसानों की बढ़ती जमात से मिल रहा है जो कृषि छोड़ कर दूसरे पेशें चुन रहे हैं.

यह रूझान खास तौर पर किसान घरानों की युवा पीढ़ी में ज्यादा उभर कर सामने आ रहा है क्योंकि नई पीढ़ी का कहना है कि अकेले कृषि क्षेत्र उन्हें एक आरामदायक जीवन नहीं दे सकता.

एक मिसाल के तौर पर देखें तो आंध्र प्रदेश के महबूबनगर जिले के एक किसान वेंकट रेड्डी चार एकड़ भूमि के मालिक है लेकिन बढ़ती उम्र के कारण अब वो खुद खेत में काम नहीं कर सकते हैं. उनके चार बेटों में से भी किसी को खेती में दिलचस्पी नहीं हैं.

वेंकट रेड्डी का कहना था, "मुझे खेती बाड़ी में रूचि तो है लेकिन मेरे चारों बेटे गाँव छोड़कर शहर चले गए हैं. एक बेटे ने हैदराबाद में फोटोकॉपी की एक दुकान खोली है तो एक निर्माण मजदूर बन गया है. एक और बेटा, कडप्पा की एक सीमेंट फैक्ट्री में काम करता है.”

उन्होंने कहा, “सभी बच्चे शहर में रहकर काम करना चाहते है ताकि कम से कम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा तो दिला सके. वैसे भी अब कृषि करना बहुत मुश्किल हो गया है".

"कृषि में भविष्य नहीं दिखता"

आंध्र प्रदेश में एक और जिले कुर्नूल के सी बेल्गल गाँव के एक युवा मोहन कुमार उच्च शिक्षा के लिए गाँव छोड़ कर हैदराबाद चले आए है. गाँव में उनके पिता की 17 एकड़ जमीन है, लेकिन उन्हें भी लगता है कि कृषि क्षेत्र में कोई भविष्य नहीं है.

Image caption आंध्र प्रदेश में जहाँ एक अनुमान के मुताबिक 70 प्रतिशत लोग जीवन यापन के लिए कृषि पर निर्भर करते हैं

मोहन कुमार ने बीबीसी से कहा, “मौजूदा हालात में सिर्फ कृषि से हम अपनी न्यूनतम जरूरतों को भी पूरा नहीं कर सकते. खेती बाड़ी करना जरूरी है लेकिन नई पीढ़ी को लगता है कि जहाँ उन्हें एक अच्छा लाभदायक रोजगार मिले और वो एक आरामदायक जीवन बिता सकें उन्हें वहां चले जाना चाहिए."

ये केवल दो परिवारों की कहानी नहीं है, बल्कि आंध्र प्रदेश में जहाँ एक अनुमान के मुताबिक 70 प्रतिशत लोग जीवन यापन के लिए कृषि पर निर्भर करते हैं, वहां लाखों परिवारों में नई पीढ़ी के लोग ग्रामीण जीवन और कृषि पर शहर के जीवन और दूसरे व्यवसायों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

हालाँकि सरकार के किसी विभाग या एजेंसी के पास ऐसे ठोस आंकड़े मौजूद नहीं हैं जिससे पता चले कि कितने लोग कृषि छोड़ रहे हैं. किसान संगठनों का कहना है की यह संख्या लाखों में है.

आंध्र प्रदेश रायतु संघम के अध्यक्ष रामकृष्ण ने कहा कि ये रुझान केवल आंध्र प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में बढ़ रहा है और इससे भारत में खाद्यान्न सुरक्षा पर गंभीर असर पड सकता है.

रामकृष्ण ने कहा, "पहले देश भर में 12 करोड़ 70 लाख किसान थे लेकिन गत तीन-चार वर्षों में इसमे 60 लाख की गिरावट आई है. नेशनल सैम्पल सर्वे के अनुसार इनमें से 40 प्रतिशत किसानों का कहना है कि वो केवल इसलिए खेती बाड़ी कर रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई दूसरा अच्छा विकल्प नहीं है."

रामकृष्ण जैसे किसान नेता इस स्थिति के लिए सरकार की नीतियों को दोष देते है. उनका कहना है कि कृषि का काम महंगा हो गया है जिसकी वजह से लाभ की उम्मीद कम और नुकसान का डर बढ़ गया है.

नई पीढ़ी

हैदराबाद में सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष प्रोफेसर गौतम पिंगले ने कहा, “किसान परिवारों के खेती बाड़ी छोड़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि उनके पास भूमि कम हो रही है.”

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, “उत्तरी भारत के कई लोग लंबी यात्रा करके हैदराबाद जैसे नगरों में पेट्रोल पम्प और ऐसे ही दूसरे काम कर रहे हैं, लेकिन वो अपने गाँव में खेती का काम नहीं करना चाहते.

किसानों से जुड़े मामलों की देखरेख करने वाली एक और संस्था एलायंस फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के संयोजक किरण कुमार विस्सा मानते हैं की किसानों की नई पीढ़ी खुशी से कृषि छोड़कर दूसरे पेशों का रुख नहीं कर रही है.

संस्था का कहना है कि अनेक कारणों से कृषि का हाल इतना खराब हो गया है कि उनके पास दूसरा काम ढूँढने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह गया है.

किरण कुमार ने कहा, “खेती बाड़ी एक महंगा काम हो गया है. बीज, खाद और रसायन से लेकर हर चीज़ की कीमत बढ़ गई है. सिंचाई की सुविधा के अभाव में सिर्फ बारिश पर निर्भर होने के कारण खेती का काम जुआ खेलने के बराबर हो गया है.”

उन्होंने कहा, “किसानों को बैंकों से ऋण नहीं मिलता है. घर से पैसा लगाकर और सारे झमेले झेलने के बाद जब किसाल फसल उगा लेतें हैं तो उन्हें बाज़ार में उसकी उचित कीमत नहीं दी जाती."

किरण कुमार ने कहा, “सरकार के पास अभी भी कृषि को बचाने का समय है क्योंकि किसान और उनके परिवार खेती बाड़ी पूरी तरह से छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. अगर सरकार किसानों का साथ दे और व्यवस्था को मजबूत करे तो खेती को लाभदायक बनाया जा सकता है.”

मण्डी की अर्थ व्यवस्था

Image caption मेहनकशी से खेती करने के बाद किसान अपने उत्पाद बेचने बाजार आते है तो वहां भी उन्हें उचित मूल्यों के लिए जूझना पड़ता है.

प्रोफेसर गौतम पिंगले मानते है कि मण्डी की अर्थव्यवस्था के दबाव से आजिज किसानों की नई पीढ़ी का रवैया बदल रहा है.

किसान नेता रामकृष्ण चेतावनी देते हैं कि कृषि छोड़ने वाले किसान परिवारों की संख्या आगे चल कर और भी बढ़ेगी.

हालांकि किरण कुमार विस्सा इस स्थिति के दूसरे पहलू की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए कहते है कि अगर किसान और खेत-मजदूर शहरों का रुख करेंगे तो वहां उनका शोषण हो सकता है क्योंकि अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में इतने सारे लोगों के लिए जगह नहीं है.

उन्होंने कहा, "सरकारी आंकड़ों के अनुसार दस साल पहले संगठित क्षेत्र में 10 प्रतिशत नौकरियां थीं जो अब घटकर आठ प्रतिशत हो गई हैं. हमारे देश में 60 प्रतिशत से ज्यादा लोग कृषि पर निर्भर हैं. इनमें 20 प्रतिशत लोगों को भी दूसरे क्षेत्रों में अवसर नहीं मिल सकते."

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कृषि क्षेत्र से पलायन का नहीं रूका तो यह न केवल देश की अर्थव्यवस्था और अन्न सुरक्षा के लिए बल्कि सामाजिक स्थिरता के लिए भी खतरनाक होगा.

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