फिर 'भेदभाव' की भेंट चढ़ी एम्स की एक प्रतिभा

  • 5 मार्च 2012

अनिल कुमार मीणा मात्र 22 साल के थे.... देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान में एमबीबीएस के पहले साल के छात्र

बुलंद हौसले और आँखों में हजारों सपने लेकर अनिल राजस्थान में अपने गाँव से एम्स में पढ़ाई करने आए थे. लेकिन दो दिन पहले उनके सपनों ने दम तोड़ दिया जब अनिल ने हॉस्टल के कमरे में फाँसी लगा ली. करीब दो साल पहले फ़ाइनल ईयर के एमबीबीएस छात्र बालमुकुंद ने भी एम्स में आत्महत्या कर ली थी.

दोनों में एक समानता थी..ये मेधावी तो थे पर दलित, पिछड़े और ग्रामीण इलाक़ों से थे. 22 वर्षीय अनिल कुमार मीणा ऑल इंडिया मेडिकल ऐन्ट्रेंस में जनजाति वर्ग में दूसरे टॉपर थे और 12वें में 75 फ़ीसदी अंक थे.

फिर दिल्ली आकर ऐसा क्या हुआ कि ये मेधावी छात्र पहले साल की एमबीबीएस की परिक्षा में सफल नहीं हो पाया. उनके दोस्त बताते हैं, "अनिल लंबे समय से तनाव में था. वे ग्रामीण इलाके से आया था. अंग्रेज़ी ठीक से समझ नहीं पाता था. पढ़ाई में उसे दिक्कत होने लगी. संस्थान में कुछ लोग ऐसे हैं जो जाति के नाम पर भेदभाव करते हैं. धीरे-धीरे अनिल अवसाद में चला गया."

जाति पर प्रहार?

आँकड़ों के मुताबिक 2007 के बाद से भारत में पिछड़ी जाति के 19 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं.

तो यहाँ बड़ा सवाल ये है कि क्या भारत के उच्च शैक्षिक संस्थानों में छात्र जातिगत भेदभाव के शिकार हैं? क्या अंग्रेजी कम जानने वाले ग्रामीण अंचलों के छात्रों को नीची नजर से देखा जाता है?

एम्स में अनिल की साथी उनके फोटो लगाकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. हमने एम्स जाकर एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के एक छात्र की आपबीती जानने की कोशिश की जो पिछड़ी जाति के हैं.

नाम न बताने की शर्त पर वे बताते हैं, "मैं कोई सुबूत तो नहीं दे सकता कि जाति के नाम पर भेदभाव होता है. लेकिन ऐसी कई घटनाओं हुई हैं जो मुझे सोचने पर मजबूर करती हैं कि कहीं मेरी जाति की वजह से तो मुझसे ऐसा बर्ताव नहीं हो रहा. जैसे आमतौर पर जो छात्र परीक्षा में फेल होते हैं वो ज्यादातर रिजर्व कोटे के होते हैं. कई प्रोफेसर तो परीक्षा के दौरान ही ऐसा करते हैं. मिसाल के तौर पर अगर आप मीणा समुदाय के हैं तो वाइवा के दौरान कुछ प्रोफेसर आपको बुलाएँगे- आइए मीणा साहब. 'मीणा साहब' कहने का अंदाज ऐसा होता है कि बेचारा पहले वर्ष का छात्र यूँ ही सहम जाता है. उसका हौसला पहले ही गिर जाता है. आप कैसे परीक्षा में अच्छा करोगे. यही सब एम्स में हो रहा है."

बात सिर्फ दलित या पिछड़े वर्ग के छात्रों की नहीं है. बहुत से लोग ग्रामीण इलाक़ों से होते हैं जो अंग्रेजी में बहुत अच्छे नहीं होते. महेंद्र एम्स में अंतिम वर्ष पूरा करने के बाद इन्टरनशिप कर रहे हैं. वे बताते हैं, "कई छात्र ग्रामीण इलाक़ों से आते हैं. ये अंग्रेजी समझ तो सकते हैं लेकिन जब प्रोफेसर बोलते हैं तो इनकी बात समझ में नहीं आती. अगर छात्र क्लास में ये बात बोलता है तो वो खुद को अपमानित महसूस करता है."

लेकिन छात्रों का आरोप है कि प्रशासन इसके प्रति संवेदनशील नहीं है. उनका कहना है कि ऐसे छात्रों के लिए न तो पर्याप्त अंग्रेजी की क्लास होती है, कई तरह के तनाव झेल रहे छात्रों के लिए न काउंसलिंग और न ही शिकायतों के निपटारे के लिए कोई प्रणाली जिस कारण तनाव में घिरे छात्र पूरी तरह से अवसाद में चले जाते हैं.

अंग्रेजी नहीं आना क्या कमजोर होना है?

उधर अनिल की आत्महत्या के बाद एम्स प्रशासन ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उसकी मौत पर अफसोस जताया है. छात्रों ने एम्स के निदेशक के इस्तीफ़े के विरोध में प्रदर्शन शुरु किया हुआ है.

एम्स परिसर पहुँचे अनूप कुमार दिल्ली में दलित छात्र संस्था चलाते हैं और वे मानते हैं कि जातिगत भेदभाव की समस्या शैक्षणिक संस्थाओं में अंदर तक रची बसी है.

इसके निदान के लिए उनका कहना है, "निदान के लिए सबसे पहले तो पूरे तंत्र को ये स्वीकार करना होगा कि जातिगत भेदभाव होता है. यहां तो आप ये मानना ही नहीं चाहते कि जाति कोई मुद्दा है. अगर किसी ने स्कूल तक हिंदी या तमिल में पढ़ाई की है और उसे अंग्रेजी ठीक से नहीं आती तो ये उसकी कमजोरी नहीं है. सरकार को ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए कि ऐसे छात्रों के लिए स्कूलों में अंग्रेजी सिखाने का प्रावधान हो या फिर कॉलेजों में प्रोफेसर इतने प्रशिक्षित हों कि वे हिंदी अंग्रेजी में पढ़ा सकें."

इसी बातचीत के दौरान पता चला कि अनिल कुमार मीणा के माँ-बाप अपने बेटे का शव लेकर जा रहे हैं....उनके लिए अब केवल अनिल की यादें बची हैं....बेहद कड़वी यादें.

कोई कहता है कि अनिल के साथ कथित तौर पर जातिगत भेदभाव हुआ, कोई कहता है कि अंग्रेजी न जानने के कारण उन पर सामाजिक दवाब था, कोई कहता है उसे दोस्तों और संस्थान से वो समर्थन नहीं मिला.जवाब कई सारे हैं पर सवाल अब भी बरकरार है....आख़िर क्यों एक युवा मेधावी जिंदादिल छात्र को मौत का रास्ता चुनना पडा.

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