माया से मोह टूटा?

Image caption इस हार में दलित वोटों का बचा रहना मायावती के लिए सुखद आभास होगा लेकिन आगे चुनौती बड़ी होगी.

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम दलित राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं जो दलितों, मायावती और अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी कई संदेश देते हैं.

मायावती पहली दलित महिला नेता है जो दलितों के वोटों के कारण सत्ता में पहुंची लेकिन परिणामों से साफ है कि वो दलितों और आम लोगों की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाईं.

वैसे भारत में दलित राजनीति का इतिहास महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों में रहा ज़रुर है लेकिन दलितों को सत्ता पहली बार यूपी में ही मिली.

चर्चित पुस्तक ‘द मेकिंग ऑफ दलित रिपब्लिक’ के लेखक और राजनीतिक विश्लेषक बदरी नारायण कहते हैं कि ये एक मौका है मायावती के लिए और दलितों के लिए अपनी राजनीति को पुनर्परिभाषित करने का.

वो कहते हैं, ‘‘ मायावती को जो मौका मिला उसका सही उपयोग नहीं किया गया. लेकिन सत्ता रहे न रहे दलितों में एक सामाजिक चेतना ज़रुर आई है और इसी चेतना का परिणाम था कि मायावती सत्ता में आई और यही चेतना दलितों को नई राजनीति के लिए प्रेरित भी करेगी.’’

बहुजन-सर्वजन मॉडल

बदरी कहते हैं कि पूरे भारत में बहुजन मॉडल की राजनीति से लोग प्रेरित हो रहे थे और इस मॉडल को अपनाने की कोशिश हो रही थी जिसे यूपी के परिणामों ने झटका दिया है.

लेकिन इसकी क्या वजह रही, दलित नेता उदित राज कहते हैं, ‘‘ तानाशाही का रवैय्या तो रहा है मायावती जी का. हां उनके समय में दलितों का थोड़ा विकास तो हुआ है. इस जीत हार को दलित राजनीति से जोड़ने की बजाय जाति की राजनीति से जोड़ कर देखा जाना चाहिए. वैसे भी सपा और बसपा के वोट प्रतिशत में बहुत अंतर नहीं है.’’

उदित राज कहते हैं कि मायावती से अति पिछड़ा और सवर्ण गुट अलग हो गए.

मायावती पर पुस्तक लिख चुके अजय बोस कहते हैं कि मायावती को खारिज़ करना ही ग़लत होगा.

वो कहते हैं, ‘‘ ये झटका तो है मायावती के लिए इसमें शक नहीं लेकिन आप ये देखिए कि मायावती का दलित वोट बैंक बचा हुआ है. अगर दलित वोट नहीं देते तो मायावती की सीटें 30-35 तक चली जातीं. गवर्नेंस खराब था. सत्ता विरोधी लहर भी थी लेकिन कम से कम यूपी में सपा-बसपा की लड़ाई तो रही. मायावती पहले भी तानाशाह थी. अब उनको सोचना पड़ेगा आगे क्या करना है.’’

मायावती को इन चुनावों में करीब 80 सीटें मिली हैं और जाहिर है कि उनका सर्वजन कार्ड चल नहीं पाया है लेकिन इसके बावजूद विश्लेषक मानते हैं कि मायावती को खारिज कर देना सही नहीं होगा.

Image caption यूपी के दलितों में एक नई सामाजिक चेतना ज़रुर आई है

ऐसा इसलिए भी क्योंकि मायावती के दलित वोट में सेंध नहीं लगी है.

दलित वोट बरकरार

अजय बोस कहते हैं कि कहीं न कहीं मायावती का राजनीतिक प्लान फेल हो गया है, ‘‘ मायावती का सर्वजन कार्ड फेल हो गया. 2007 में ये सफल रहा लेकिन इस बार उनकी योजना फेल हो गई. उनकी तानाशाही, एक ही नेता होना ये सब तो पहले भी था.’’

वो कहते हैं कि समस्या राजनीतिक योजना की है मायावती की निजी नहीं. अजय के अनुसार दलितों को नुकसान हुआ है लेकिन ये फायदे की बात है कि वो राजनीति में स्टेकहोल्डर हो गया है वो सिर्फ वोट देने वाला नहीं बल्कि बसपा का स्टेकहोल्डर हो गया है.

बदरी कहते हैं कि ये एक कठिन समय है मायावती के लिए लेकिन उनके साथ एक अच्छी बात है.

वो कहते हैं, ‘‘मायावती के पास एक वोट बैंक है जाटवों का. ये वोट रहेगा. सपा को देखा जाए जीतते ही गोलियां चलीं हैं. उस पार्टी में असामाजिक तत्व हैं. जिसका फायदा मायावती को होना चाहिए.’’

लेकिन क्या दलितों के लिए मायावती के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

उदित राज कहते हैं, ‘‘ समस्या कई स्तर पर है. मैंने काम करना शुरु किया लेकिन पैसे नहीं थे हमारे पास पार्टी खड़ा करने के लिए. ऐसे में दलितों के लिए नेता उभरना मुश्किल है. लेकिन हां नया नेतृत्व उभरने की संभावना ज़रुर है. दलित चेतना के उभार का यह लाभ ज़रुर होगा. लेकिन अभी समय ज़रुर लगेगा.’’

बदरी नारायण की राय थोड़ी अलग है वो कहते हैं कि मायावती से जो अति पिछड़ा तबका दूर हुआ है वहां न केवल नए नेताओं की बल्कि राजनीतिक दलों के लिए गुंजाइश बनती है.

वो कहते हैं, ‘‘ अगर आप देखेंगे ध्यान से तो पाएंगे कि मायावती हमेशा कांग्रेस पर वार करती रही हैं क्योंकि उन्हें पता है दलित दूर होगा बसपा से तो कांग्रेस के पास जाएगा. ऐसे में कांग्रेस को और काम करना होगा अपना आधार मज़बूत करने के लिए.’’

यानी कि यूपी में सपा-बसपा के अलावा और दलों के लिए राजनीतिक ज़मीन बची हुई है देखने वाली बात ये होगी आने वाले समय में राजनीतिक दल, दलित और मायावती इस मौके का क्या फायदा उठाती है.

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