मायावती की अकड़

  • 7 मार्च 2012
फाइल फोटो
Image caption उत्तरप्रदेश विधानसभा में मायावती की बहुजन समाज पार्टी 80 सीटों पर सिमटकर रह गई है

यह तो सब को मालूम था कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी लेकिन यह कल्पना किसी ने भी नहीं की थी कि वह सिर्फ़ अपने ही बूते पर प्रदेश में सरकार बना लेगी.

यह सही है कि मायावती आजादी के बाद उत्त्तर प्रदेश में अपना कार्यकाल पूरा करने वाली पहली मुख्यमंत्री हैं. लेकिन उनका सत्ता का ग़ुरूर इस बार उन्हें ले डूबा.

बुनियादी सरोकारों से मुंह फेरकर करोड़ों रुपयों की नोटों की माला पहनना और सार्वजनिक स्थलों पर अपनी स्वयं की मूर्तियों का निर्माण उन्हें जनता से कहीं दूर ले गया.

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उन्होंने भले ही इस पूरे प्रकरण को कुचले हुए लोगों के सशक्तीकरण की संज्ञा दी, लेकिन आम लोगों ने इसे एक भ्रमित प्राथमिकता माना और इसी का खामियाज़ा उन्हे चुनाव में भुगतना पड़ा.

'आयरन हैंड'

मायावती बाहुबलियों के विरुद्ध भले ही सख़्त रही हों, लेकिन अधिकतर लोग मानेंगे कि उनका पूरा कार्यकाल भ्रष्टाचार के आरोपों से ग्रसित रहा.

उन्होंने 16 मंत्रियों को बर्ख़ास्त कर यह आभास देने की कोशिश की कि वह साफ़ प्रशासन देने की हिमायती हैं, लेकिन लोगों ने इसे मात्र एक राजनीतिक स्टंट माना. मायावती के ख़िलाफ़ इस निराशा और हताशा का पूरा फ़ायदा समाजवादी पार्टी ने उठाया.

Image caption बसपा की हालत अब वर्ष 1996 जैसी हो गई है जब उसके पास राज्य विधानसभा में 67 सीटें थीं

वर्ष 2007 में ट्रंप कार्ड के रूप में काम करने वाला उनका सर्वजन सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला थोड़े दिनों बाद ही राजनीतिक अवसरवाद का उदाहरण लगने लगा और धीरे-धीरे उनके साथ आए लोग उनका साथ छोड़ते चले गए.

और तो और उनके दलित वोट बैंक में भी अच्छी ख़ासी सेंध लगती दिखाई दी. मायावती ने अपने चारों तरफ़ इस तरह की दीवार बना ली जिसके अंदर आम आदमियों और यहां तक कि उनके ख़ैरख़्वाहों तक के लिए भी कोई जगह नहीं थी.

मायावती ने 18 मंत्रियों और 110 विधायकों के टिकट काटकर सत्ता में रहने के नुकसान से बचने की कोशिश ज़रूर की, लेकिन इसे भी मात्र एक राजनीतिक पैंतरेबाज़ी ही माना गया.

दलित आंदोलन

मायावती इस बात की जवाबदेह हैं कि उनके कार्यकाल में दलित आंदोलन परवान चढ़ने की बजाए सत्ता से उपजी बीमारियों की वजह से रसातल में कैसे पहुँच गया.

बसपा आंदोलन की उपज बाबू सिंह कुशवाहा और नसीमउद्दीन सिद्दीकी जैसे लोग घोटालों के पर्यायवाची के रूप में क्यों देखे जाने लगे.

अभी तक 'आयरन हैंड' से पार्टी को चलाने वाली मायावती के ख़िलाफ उनके ही दल में सवाल उठने स्वाभाविक हैं. मायावती को इस तरह के परिदृश्य को झेलने की आदत नहीं है.

यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्ता के बाहर रहकर मायावती किस हद तक अपने समर्थकों को अपने पास रखने में सफल होती हैं.

वैसे उनका पुराना ट्रैक रिकॉर्ड कहता है कि हारने के बाद वह विपक्ष में बैठने की बजाए, दिल्ली में अपने लिए नई भूमिका की तलाश में जुटेंगीं.

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