तृणमूल के मंत्री ने दिखाया यूपीए को आईना

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Image caption इन चुनाव परिणामों के बाद मनमोहन सिंह के लिए देश चला और भी मुश्किल हो गया है

केंद्रीय रेल मंत्री और ममता बनर्जी के दिल्ली में सिपहसलार दिनेश त्रिवेदी ने यूपीऐ सरकार को अपने बयान से वहां मारा, जहाँ उसे सबसे ज़्यादा दर्द हो रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस के एक ख़ास कार्यक्रम में त्रिवेदी ने ना केवल यूपीऐ सरकार को 'लेमडक' यानी असहाय कह डाला. त्रिवेदी ने पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद कहा अगर अधिकाधिक दल देश में मध्यावधि चुनाव चाहते हैं तो कॉंग्रेस को इस बारे में सोचना चाहिए.

दिनेश त्रिवेदी ने कहा, "तृणमूल भी यही चाहेगी कि दो साल बाद की जगह अभी चुनाव हो जाएँ. अगर मैं लेम डक (असहाय) हो गया हूँ तो बेहतर है कि मैं हथियार डाल दूं."

त्रिवेदी का बयान देना था कि कांग्रेस की प्रतिक्रया आ गई. कांग्रेस नेता और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने कहा, "वो जो अलग-अलग राज्यों में चुने गए हैं उन्हें केंद्र सरकार को अस्थिर करने की आशा नहीं रखना चाहिए बल्कि अपने अपने इलाकों में सुशासन पर ध्यान देना चाहिए."

खंडन

हालांकि जैसे ही इस बयान पर हंगामा खड़ा होना शुरू हुआ दिनेश त्रिवेदी ने इसे अपना निजी बयान बता डाला और कहा कि इसका तृणमूल कांग्रेस की सोच से कोई लेना देना नहीं है.

त्रिवेदी के बयान का तृणमूल की आधिकारिक सोच से कोई लेना देना हो ना हो लेकिन इससे उनकी बात का वजन खत्म नहीं होता.

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं "दिनेश त्रिवेदी अनुभवी नेता हैं और दिल्ली की सियासत से वाकिफ हैं. वो बेमकसद बातें कहने के लिए नहीं जाने जाते." रशीद के अनुसार त्रिवेदी ने हकीकत बयान की है और यूपीए के लिए आने वाले वक्त की एक झलक दी है.

पश्चिम बंगाल में ममता और कांग्रेस यूं तो सत्ता में साझीदार हैं लेकिन दोनों दलों के बीच कटुता बढ़ती ही जा रही है. हालात ऐसे हो गए हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस के उनके मंत्रीमंडलीय सहयोगी एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले रहते हैं.

महाराष्ट्र में हाल ही हुए नगरीय निकायों के चुनावों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन कांग्रेस के प्रदर्शन से कहीं बेहतर रहा था. तमिलनाडु में 2-जी घोटाले में अपने नेताओं के फंसने के बाद लगातार एक के बाद एक चुनाव हार रही डीएमके को कांग्रेस से जरा भी सहानुभूति नहीं है.

यूपीए की दुर्गति

रशीद किदवई कहते हैं, "केंद्र सरकारें साख से चला करती हैं तरकीबों से नहीं. इस यूपीए सरकार की साख खत्म हो गई है. कभी बसपा से समझौता तो कभी सपा के सहारे आप सरकार तो चला सकते हैं देश नहीं चला सकते."

किदवई आगे कहते हैं, "पहले तो यूपीए में मनमोहन और सोनिया दो शक्ति केंद्र हैं ऊपर से गठबंधन के घटक अलग से आँख दिखा रहे हैं. ऐसे में इस सरकार में किसी भी मुद्दे पर विपक्ष और जनता को अपनी तरफ लाने की ताकत नहीं रह गई है."

दूसरी तरह एनडीए के प्रमुख दल भाजपा ने भी कहा है कि वो भी मध्यावधि चुनावों के लिए तैयार है. भाजपा प्रवक्ता बलबीर पुंज ने कहा है कि उनका दल पूरी तरह से मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार है.

संघीय ढांचा होगा मुद्दा

रशीद किदवई कहते हैं आगे आने वाले समय में क्षेत्रीय नेता जैसे मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, जयललिता जैसे नेता पूरी ताकत से केंद्र सरकार के अधिकारों को कम करने की कोशिश करेगें.

किदवई कहते हैं, "याद करिए कि किस तरह से ममता बनर्जी ने भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता समझौता नहीं होने दिया जबकि अंतरराष्ट्रीय संबंध पूरी तरह से केंद्र सरकार का जिम्मा हैं."

किदवई कहते हैं चाहे जीएसटी की बात हो या रीटेल के क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की बात हो की या फिर चरमपंथ से निपटने के लिए एनसीटीसी हर चीज पर इन क्षेत्रीय नेताओं को आपत्ति है.

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