उत्तराखंड: समीकरणों में उलझी है सत्ता की चाबी

उत्तराखंड में सरकार बनाने के लिए पहला दावा कांग्रेस कर रही है. राजनीतिक परंपरा के अनुसार राज्यपाल की तरफ से पहला न्यौता भी उसे ही मिलेगा क्योंकि एक सीट के फर्क से ही सही लेकिन विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी वही है.

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी फिलहाल देखो और इंतजार करने की नीति अपना रही है.मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और नई सरकार के गठन तक वो कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहेंगे.

ऐसा लगता है कि भाजपा ‘फिलहाल ‘ विपक्ष में बैठने का मन बना रही है.उसका अगला कदम कांग्रेस के दावे और विधानसभा में उसके बहुमत परीक्षण पर ही निर्भर करेगा.

हांलाकि उसने भी सरकार बनाने का विकल्प अभी छोड़ा नहीं है और सभी संभावनाएं खुली रखी हैं.

बताया जाता है कि पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद के एक से अधिक दावेदारों और भितरघात के आरोप-प्रत्यारोप के कारण पार्टी हाईकमान को माथापच्ची करनी पड़ रही है. विधायक दल का नेता चुनना भी पार्टी के लिए आसान साबित नहीं हो रहा.

किसका पलड़ा भारी

जहां तक कांग्रेस की बात है संभव है कि इस हफ्ते के अंत तक कांग्रेस सरकार बनाने का औपचारिक दावा पेश करे.

वैसे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य राज्यपाल से मिलकर अनौपचारिक दावा पेश कर चुके हैं.

पार्टी के विधायकमंडल की बैठक में नेता चुनने के लिए सोनिया गांधी को अधिकृत कर दिया गया है .मुख्यमंत्री कौन बनेगा ये तीन समीकरणों पर निर्भर होगा और पार्टी हाईकमान इसी गुणा-भाग में जुटा है.

पहला क्षेत्रीय समीकरण –कांग्रेस को गढ़वाल से 19 और कुमांऊ से 13 सीटों हासिल हुई हैं .लिहाजा गढ़वाल का पलड़ा भारी है.इस लिहाज से हरक सिंह रावत अपना दावा ठोंक रहे हैं.

दूसरा है जातीय समीकरण. उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पद के लिए ब्राह्मण नेताओं का वर्चस्व रहा है.लिहाजा टिहरी से सांसद और हेमवती नन्दन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा का दावा भारी है.

लेकिन अगर कांग्रेस कोई नया दांव खेलना चाहे तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य उत्तराखंड के पहले दलित मुख्यमंत्री बन सकते हैं.

तीसरा और सबसे महत्त्पूर्ण है कद, स्वीकार्यता और प्रबंधकीय कौशल, जो किसी गठबंधन सरकार को चलाने के लिये आवश्यक है.

इस लिहाज से केंद्रीय संसदीय कार्य राज्यमंत्री हरीश रावत सबसे प्रभावशाली स्थिति में हैं. केंद्र में मंत्री रहते हुए भी उत्तराखंड की राजनीति में वो बेहद सक्रिय रहते हैं .

पिछली बार जब 2002 में कांग्रेस जीती थी तो एक तरह से उनके मुंह तक आकर निवाला छिन गया था जब अप्रत्याशित ढंग से नारायण दत्त तिवारी को सत्ता की बागडोर सौंप दी गई थी. इस बार वो मुख्यमंत्री बनने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे .

कांग्रेस ने समर्थन जुटा लिया है –ये बयान भी हरीश रावत के हवाले से ही आया है.

किंगमेकर हैं निर्दलीय और बीएसपी

सूत्रों के अनुसार कांग्रेस को संभावित समर्थन देने वाले निर्दलीय विधायकों ने भी मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पसंद और शर्तें रखी हैं.

खंडूरी को हराने वाले विधायक सुरेंद्र सिंह नेगी ने भी विधायक दल की बैठक में जोरदार ढंग से मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की है .

बीएसपी के तीन विधायकों के साथ भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता लगातार संपर्क में हैं. वहीं उत्तराखंड क्रांति दल के एक विधायक को भी समर्थन देने के लिए मनाया जा रहा है.

उत्तराखंड में सरकार का मुखिया कौन होगा ये बहुत कुछ गठबंधन के स्वरूप और चरित्र पर निर्भर करेगा.

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