मध्य प्रदेश में 'जबरन' नसबंदी

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मध्य प्रदेश की सरकार ने वर्ष 2012 को परिवार नियोजन वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है. इसके तहत प्रदेश की कुल 7.5 करोड़ की आबादी के 10 प्रतिशत लोगों को परिवार नियोजन के तहत लाने का लक्ष्य रखा गया है.

इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सरकार के लगभग हर महकमे के सामने लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें पूरा करने की होड़ मची हुई है.

इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए कहीं किसी गर्भवती महिला का ऑपरेशन कर दिया गया या तो कहीं किसी कुंवारे का या फिर मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति का.

राज्य के बैतूल जिले में सरकारी अधिकारियों नें विलुप्ति की कगार पर पहुँच चुकी आदिम जनजाति कोरकू के सदस्यों की भी नसबंदी कर डाली. इसको लेकर विरोध के स्वर उठने लगे हैं.

बैतूल जिले का आदिवासी बहुल भीमपुर प्रखंड गोंड और कोरकू जनजाति के लोगों का इलाका है. दोनों जनजातियों में शिशु मृत्यु दर काफी ज्यादा है जिसको लेकर इन जनजातियों के संरक्षण की बात कही जा रही है.

सवाल

लेकिन मध्य प्रदेश की सरकार के ताजे फैसले ने इन जनजातियों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है.

परिवार नियोजन वर्ष के तहत भीमपुर प्रखंड में तैनात सरकारी अमले को भी इस इलाके की कुल आबादी के 10 प्रतिशत लोगों की नसबंदी करने का लक्ष्य दिया गया है.

अधिकारियों ने यह लक्ष्य तीन महीनों में ही पूरा कर डाला. ऐसे आरोप लग रहे हैं कि अधिकारियों ने कहीं-कहीं पर प्रलोभन का सहारा लिया तो कहीं लोगों को डराने धमकाने का काम किया. लेकिन सरकारी अधिकारी इन सबसे इनकार करते हैं.

बैतूल प्रखंड के मुख्य चिकित्सा अधिकारी रजनीश शर्मा यह तो स्वीकार करते हैं कि आदिम जनजाति के लोगों के बीच भी परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाया गया है. लेकिन वह इस बात से इनकार करते हैं कि किसी को डराया धमकाया गया हो या उनकी जबरन नसबंदी कराई गई हो.

वे कहते हैं, "यह बात सच है कि आदिम जनजातियों के बीच भी यह अभियान चलाया गया है. लेकिन हमने सिर्फ लोगों को प्रोत्साहित करने का काम किया है. जिसके दो बच्चे थे उन्हें प्रोत्साहित उनके परिवार के नियोजन का काम किया गया है. इस दौरान किसी से जबरदस्ती नहीं की गई है."

पोल खुली

लेकिन डॉक्टर साहब के दावों की तब पोल खुल गई, जब भीमपुर के माकडा में 19 वर्षीय कोरकू जनजाति की युवती सुमरती ने आरोप लगाया कि उसकी सिर्फ एक तीन साल की बेटी है, इसके बावजूद अधिकारियों ने उसकी नसबंदी कर दी.

सुमरती का कहना है कि उसे सरपंच और पटवारी ने धमकाया भी कि अगर वह नसबंदी नहीं करवाती है तो उसके परिवार का राशन कार्ड निरस्त हो जाएगा.

सुमरती का कहना है, "मैंने पटवारी और सरपंच के दबाव में आकर नसबंदी करवाई. वह कह रहे थे कि कि अगर मैं नसबंदी नहीं कराऊँगी तो मेरे परिवार का रोजगार कार्ड भी निरस्त कर दिया जाएगा."

सुमरती कहती है कि नसबंदी करवाने के बावजूद उन्हें सरकार से कोई सहयोग राशि नहीं मिली. गाँव वालों को शक है कि इस राशि का बंदरबांट सरकारी कर्मचारियों ने कर लिया होगा.

सिर्फ सरपंच और पटवारी ही नहीं, बल्कि इस लक्ष्य को पूरा करने केर लिए आंगनवाड़ी सेविकाओं को भी लगाया गया है.

भीमपुर के गुराडिया में काम करने वाली आंगनवाड़ी सेविका उर्मिला शेदुकर का कहना है कि उन्हें अधिकारियों की तरफ से कहा जाता है कि वह लोगों को कहें कि अगर वह नसबंदी नहीं करवाएंगे तो उनके राशन कार्ड निरस्त हो जाएँगे.

शेदुकर ने कहा, "अब राशन कार्ड सच में निरस्त होते हैं या नहीं यह तो पता नहीं. लेकिन हमें तो यही बोलने को कहा गया है."

पुरस्कार

भीमपुर प्रखंड ने अपने लक्ष्य से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर राज्य सरकार से पुरस्कार हासिल किया है. डॉक्टर रजनीश शर्मा का तर्क है कि उन्होंने लक्ष्य का 120 प्रतिशत ज्यादा हासिल किया जिसकी वजह से लोग उनसे जलने लगे हैं.

उन्होंने कहा, "सिर्फ भीमपुर प्रखंड की बात करें तो यहाँ की कुल आबादी का 87 प्रतिशत गोंड और कोरकू है. दुख मुझे इस बात का है कि जब तक सौ प्रर्तिशत काम नहीं होता किसी की आवाज़ नहीं उठती. परिवार नियोजन के मामले में हमने लक्ष्य से ज्यादा हासिल किया, पुरस्कार मिला और नाम सुर्खियों में आया तो लोगों की आलोचना शुरू हो गई. कोर्कुओं की अगर लोगों को इतनी ही चिंता है तो लोग भीमपुर आकर उनकी वास्तविक स्थिति देखें."

भीमपुर के ही जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एसएन सिंह चौहान कहते हैं कि राज्य सरकार से उन्हें आदिम जनजाति के लोगों की नसबंदी नहीं करने का कोई आदेश नहीं मिला है. वैसे वह ज्यादतियों की जांच कराने की बात कहते हैं.

चौहान कहते हैं, "सरकार की तरफ से जो आदेश हमें मिला है उसमे कहीं भी यह उल्लेख नहीं किया गया है कि आदिम जनजातियों के बीच परिवार नियोजन कार्यक्रम नहीं चलाया जाए. अगर सरकार से हमें इस बारे में निर्देश मिलते तो कभी हम यह कार्यक्रम उनके बीच नहीं चलाते. जहाँ तक ज्यादतियों और धमकियों की बात है, हम इसकी जांच कराएँगे."

नसबंदी को लेकर विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा है. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेता अजय सिंह ने विधान सभा में अपनी पार्टी का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार को इस तरह की जबरन नसबंदी से गुरेज़ करना चाहिए.

उनका कहना था कि 1975 में संजय गाँधी के नेतृत्व में जबरन नसबदी का खामियाजा कांग्रेस पार्टी को 1977 में भुगतना पड़ा जब वह सत्ता से साफ हो गए.

आलोचना

Image caption आरएसएस ने भी राज्य सरकार की आलोचना की है

वहीँ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी जबरन नसबंदी के मामले में मध्य प्रदेश की सरकार की आलोचना की है.

आदिवासियों के बीच काम कर रहे संघ के ही एक घटक वनवासी कल्यान परिषद के दुर्गा प्रसाद उईके कहते हैं कि जिस समुदाय में शिशु मृत्यु दर सबसे अधिक हो, ऐसे में इस तरह का अभियान उनके बीच चलाना एक अमानवीय कृत्य है. उनके संगठन ने इस मुद्दे को लेकर राज्यव्यापी संघर्ष करने की चेतावनी दी है.

बहरहाल सरकारी अमले के अतिउत्साह और जबरन नसबंदी किए जाने के समाचर के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी मामलों की जांच के आदेश दिए हैं.

उन्होंने बैठक बुलाकर सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वह परिवार नियोजन के मामले में जबरदस्ती ना करें. लेकिन मुख्यमंत्री का आदेश जिलों और प्रखंडों में लक्ष्य प्राप्ति के लिए रात दिन भिड़े अमले तक कब तक पहुँच पाता है. यह एक अहम सवाल है.

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