फीके रह गए प्रधानमंत्री के डिनर के पकवान

बजट सत्र के लिए जाते प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption सहयोगी दलों की अनुपस्थिति से बजट सत्र में सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं

विपक्षी पार्टियों के साथ ही ख़ुद सहयोगी दलों के निशाने पर आ रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के सहयोगी दलों को रात्रिभोज पर आमंत्रित किया मगर उनमें से कई प्रमुख नेताओं की ग़ैर मौजूदगी से पकवान कुछ फीके ही रह गए.

सबसे ज़्यादा चर्चा यूपीए के बड़े सहयोगी तृणमूल कांग्रेस को लेकर है जिसने यूपीए का विरोध करने वाली पार्टियों को कई मुद्दों पर सहयोग दे रखा है और उसने डिनर में भी अपने शीर्ष मंत्रियों को नहीं भेजा.

उनकी जगह पार्टी ने प्रधानमंत्री के रात्रिभोज में हुगली की सांसद रत्ना डे नाग को भेजा जो काफ़ी जूनियर सांसद हैं.

इतना ही नहीं कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के नए सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल के अजित सिंह भी भोज में नहीं गए और उन्होंने बेटे जयंत चौधरी वहाँ भेजा.

उम्मीद राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव के पहुँचने की भी थी और माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश में जीत का झंडा लहराने वाली समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव भी डिनर में पहुँच सकते हैं मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

संशोधन प्रस्ताव

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की इस दावत में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और गृह मंत्री पी चिदंबरम् जैसे कांग्रेसी नेता ही पहुँचे और शायद उनकी निगाहें देर तक रास्ते पर ही लगी होंगी पर अंत में मिली मायूसी.

इससे पहले मंगलवार दिन में तृणमूल कांग्रेस ने सरकार के लिए शर्मिंदगी के हालात पैदा करते हुए राष्ट्रपति के अभिभाषण में संशोधन प्रस्ताव पेश कर दिए.

आम तौर पर ऐसे प्रस्ताव विपक्षी दल लाते हैं. इसे देखते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सहयोगी दलों से अपील की है कि वे सरकार के लिए परेशानी खड़ी करने वाले प्रस्ताव न लाएँ और सहयोगी दलों से इस तरह के बर्ताव की अपेक्षा नहीं है.

दरअसल सरकार को भ्रष्टाचार और एनसीटीसी जैसे मुद्दों पर विपक्ष घेरने की कोशिश कर रहा है. इसी प्रक्रिया में मुख्य विपक्षी दल भाजपा के अलावा बीजू जनता दल, अन्ना द्रमुक, द्रमुक, विपक्षी दलों, तेलुगूदेसम, शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना जैसे दलों ने संशोधन प्रस्ताव पेश किए हैं.

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