विजय बहुगुणा होंगे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री

विजय बहुगुणा
Image caption विजय बहुगुणा के सामने सरकार की स्थिरता से जुड़ी बड़ी चुनौती होगी

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद के लिये चल रही खींचतान में आखिरकार टिहरी से कॉंग्रेस के सांसद विजय बहुगुणा विजयी हुए हैं.

कॉंग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद ने दिल्ली में विजय बहुगुणा के कॉंग्रेस विधायक दल का नेता बनाए जाने की घोषणा की.

यूं तो मुख्यमंत्री पद के लिये हरीश रावत और हरक सिंह रावत का नाम जोर-शोर से चल रहा था और पार्टी के भीतर इसके लिये जबर्दस्त घमासान की स्थिति थी. लेकिन समीकरणों के गुणा-भाग में अंतत: विजय बहुगुणा का पलड़ा भारी रहा. मूल रूप से इसके चार कारण समझे जा रहे हैं.

पहला सोनिया गांधी से विजय बहुगुणा की नजदीकी और गांधी परिवार के प्रति विश्वासभक्ति.

दूसरा गढ़वाल और कुमांऊ के मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में गढ़वाल का पलड़ा भारी रहा क्योंकि गढ़वाल से 19 और कुमांऊ से 13 विधायक जीतकर आए हैं.गढ़वाल के ही एक और नाम हरक सिंह रावत पर पार्टी के अधिकांश लोगों में सहमति नहीं बन पा रही थी.

तीसरा विजय बहुगुणा की गैर-विवादास्पद और ईमानदार छवि रही है. उन्हें प्रदेश में जानकार और अपेक्षाकृत सम्मानित निगाह से देखा जाता है.अन्य दूसरे दावेदारों से परे विजय बहुगुणा का कमोबेश लो प्रोफाइल रहना भी उनके पक्ष में गया.

लेकिन कॉंग्रेस सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री पद के लिये आखिरी मुकाबले में हरीश रावत और हरक सिंह रावत एक दूसरे के खिलाफ लगभग बगावत पर उतारू हो आए और अंतत: विजय बहुगुणा के नाम पर सहमति बनाई गई. इस तरह दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा हो गया.

कौन हैं विजय बहुगुणा

विजय बहुगुणा कॉंग्रेस के दिग्गज नेता रहे स्वर्गीय हेमवती नन्दन बहुगुणा के बेटे हैं और उत्तर प्रदेश कॉंग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा के भाई है.

चौंसठ वर्षीय विजय बहुगुणा पेशे से वकील हैं और इलाहाबाद और मुंबई हाईकोर्ट के जज भी रहे हैं.

वह पहली बार 2007 में लोकसभा के उपचुनाव में टिहरी से सांसद बने थे और 2009 में दोबारा सांसद चुने गए.

विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनाए जाने से कॉंग्रेस को दो उपचुनावों का सामना करना पड़ेगा. पहला उन्हें विधायक बनाने के लिए किसी नवनियुक्त विधायक को अपनी सीट खाली करनी पड़ेगी. दूसरा टिहरी संसदीय सीट पर भी दोबारा चुनाव होंगे.

कठिनाइयों का ताज

विजय बहुगुणा के सिर पर गठबंधन सरकार को चलाने की चुनौतियों के साथ-साथ खुद अपनी ही पार्टी में भितरघात से निबटने की बड़ी समस्या होगी. अगर इसे कांटों का ताज कहा जाए तो ये अति नहीं होगी.

फिलहाल देहरादून स्थित कॉंग्रेस के मुख्यालय में बम पटाखों का शोर जरूर है लेकिन मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदारों के समर्थकों का विरोध भी इस शोर में शामिल है जिनके बीच पार्टी हाईकमान के इस निर्णय से काफी खलबली है.

कोई आश्चर्य नहीं कि कॉंग्रेस की इस गठबंधन सरकार को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिये उसी खींचतान से जूझना पड़े जो बीजेपी की सरकार में निशंक,खंडूरी और कोश्यारी के बीच पूरे पांच साल तक जारी रहा.

विजय बहुगुणा उत्तराखंड की उलझी हुई चुनावी राजनीति में कोई परिपक्व खिलाड़ी भी नहीं समझे जाते हैं. इसकी पहली परीक्षा उन्हें खुद विधानसभा में चुनकर जाने में होगी.

उत्तराखंड की राजनीति पर गहरी पकड़ रखनेवाले वामपंथी नेता बच्चीराम कौंसवाल कहते हैं, "विजय बहुगुणा की सरकार की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाकी चारों सांसद उनके साथ सहयोग करते हैं या उनकी घेराबंदी करके कमजोर करते हैं."

इस तरह सरकार की मजबूती पर हमेशा खतरे की तलवार लटकी रहेगी.

इसके अलावा निर्दलीयों और क्षेत्रीय दल का दबाव अलग होगा क्योंकि कॉग्रेस अपने दम पर बहुमत में नहीं है. हालांकि बीएसपी ने भी कॉंग्रेस को बिना शर्त्त समर्थन देने की घोषणा कर दी है. मगर इसे मायावती पर चल रहे मामलों से जोड़कर देखा जा रहा है.

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