कैंसर की सस्ती दवा जल्द ही भारतीय बाजार में

  • 13 मार्च 2012
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Image caption इससे उन लोगों को काफी राहत मिलेगी जो इतनी महंगी दवा नहीं खरीद पाते

कैंसर से उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा जो बाजार में 2.84 लाख रुपए से अधिक में मिलती है अब भारत में केवल 8,880 रुपए में मिल सकेगी.

'नेक्सावर' नाम के 120 गोलियां के पैकेट की फिलहाल बाजार में कीमत 2.84 लाख रुपए है. मूल दवा की तुलना में भारत में इस दवा की कीमत काफी कम होगी. इतनी गोलियां एक महीने की खुराक होती हैं.

यह संभव हो पाया है क्योंकि भारत ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पेटेंट अधिनियम के तहत अनिवार्य लाइसेंसिंग (सीएल) के प्रावधानों को लागू किया है. इन प्रावधानों के तहत हैदराबाद की नैटको फार्मा को जर्मनी की कंपनी बेयर की पेटेंट संरक्षित कैंसर की दवा 'नेक्सावर' के जेनरिक वर्जन को भारत में बेचने के लिए मंजूरी दे दी है.

आवेदन किया था

बौद्धिक संपदाओं की निगरानी करने वाली संस्था भारत संपदा विभाग ने नैटको के आवेदन को मंजूरी दी.

नैटको ने आवेदन किया था कि उसे गुर्दे और लिवर के कैसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा की जेनरिक दवा बेचने की इजाजत दी जाए.

इससे उन लोगों को काफी राहत मिलेगी जो इतनी महंगी दवा नहीं खरीद पाते. इस फैसले से जिंदगी बचाने वाली कुछ और बीमारियों की दवाओं के सस्ते होने के रास्ते भी खुल सकते हैं.

भारत के फैसले पर मीरा शिवा से बातचीत

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जहां देश की दवा बनाने वाली कंपनियों को इससे काफी फायदा होगा वहीं ऐसा माना जाता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इस फैसले से एतराज हो सकता है.

'सही फैसला'

फैसले का स्वागत करते हुए मैडिकल जर्नल 'मिम्स' के संपादक चंद्र मोहन गुलाटी का कहना है कि इससे आम लोगों को काफी फायदा होगा.

उन्होंने कहा, ''बहुत सारी जरूरी या जिंदगी बचाने वाली दवाइयां हैं जिनका कंपनियों ने पेटेंट करवाया होता है. उन्हें कानून के मुताबिक इन्हें भारत में लाना चाहिए. कंपनियां इनका निर्यात करती हैं लेकिन इन्हें बनाती नहीं हैं.''

उन्होंने कहा, ''दूसरी बात यह है कि कंपनियां इन दवाइयों को भारत में उसी कीमत पर बेचती हैं जिस पर वह ब्रिटेन और बाकी देशों में बेचती हैं. अब भारत में मरीज इतना पैसा नहीं दे पाते.''

मुफ्त देनी होगी

कंट्रोलर ऑफ पेटेंटस पीएच कुरियन के फैसले में कहा गया है कि इस दवा की कीमत 8,880 रुपए से अधिक नहीं हो सकेगी.

उनके 62 पन्नों के फैसले में कहा गया है कि इस कंपनी को हर साल 600 जरुरतमंद लोगों को मुफ्त दवा भी देनी होगी. इन मरीजों के विवरण कंट्रोलर ऑफ पेटेंट्स के दफ्तर में देना होगा.

इसमें उनका इलाज कर रहे डॉक्टर के बारे में भी विवरण होना होगा. यह रिपोर्ट 31 जनवरी तक देनी अनिवार्य होगी.

कंपनी को कुल बिक्री का छह प्रतिशत बतौर 'रॉयल्टी' भी देने को कहा गया है.

क्या करती है दवा

यह दवा रक्त कोशिकाओं के विकास को रोकती है और विकास करने वाले कई महत्वपूर्ण कारणों को निशाना बनाती है. इस दवा को लिवर यानी जिगर और गुर्दे के कैंसर के विकसित चरण में लेना होता है.

इस दवा से गुर्दे के कैंसर के मरीज की जिंदगी लगभग चार से पांच साल बढ़ सकती है जबकि जिगर के कैंसर के मरीज की जिंदगी में इससे छह से आठ महीने का इजाफा हो सकता है.

मरीज को इस दवा को जिंदगी भर लेना होता है और 2.8 लाख रुपए महीने के हिसाब से इस पर सालाना खर्च 33 लाख रुपए से अधिक पढ़ता है.

इस फैसले के बाद अब इस दवा पर सालाना खर्च एक लाख रुपए से कुछ अधिक होगा.

अपील की संभावना

फैसले से नाखुश बेयर की इस फैसले के खिलाफ अपील करने की संभावना है. उधर नैटको का कहना है कि वे आगे की लड़ाई के लिए तैयार है.

नैटको के कंपनी सचिव आदि नारायण ने कहा, ''यह लंबी लड़ाई हो सकती है और अगर बेयर इस फैसले को चुनौती देता है तो हम पूरी ताकत से जवाब देंगे.''

उन्होंने कहा कि कुछ ही दिनों में कंपनी इस दवा को बनाने लगेगी और बाजार में बिक्री शुरू करेगी.

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