"यह जंगल है, यहाँ पेड़ लगाना मना है"

Image caption बैतूल जिले में आदिवासियों और वन विभाग के बीच चल रहे संघर्ष में नुकसान जंगलों का ही हो रहा है.

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले का चुनाहजूरी गाँव. जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर चुनाहजूरी और इसके आस पास के गाँवों में रहने वाले आदिवासियों और वन विभाग के अमले के बीच एक अजीब सा संघर्ष चल रहा है.

यह संघर्ष पेड़ लगाने को लेकर शुरू हुआ है.

यहाँ के गोंड और कुरकु आदिवासी समुदाय के लोग जंगलों में फलदार वृक्ष लगा रहे हैं.

लेकिन उनका आरोप है कि वन विभाग के लोग इन पेड़ों को न सिर्फ उखाड़ कर फेंक दे रहे हैं बल्कि पेड़ लगाने वाले आदिवासियों के खिलाफ आपराधिक मामले भी दर्ज कर रहे हैं.

संरक्षण या अतिक्रमण?

आदिवासियों का कहना है कि वे जंगल में पेड़ लगाकर उसे संरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं. मगर वन विभाग का अमला इसे अतिक्रमण की संज्ञा दे रहा है.

आदिवासियों का आरोप है कि वन विभाग की उदासीनता की वजह से ही जंगल वीरान होते चले जा रहे हैं. यही वजह है कि उन्होंने एक अभियान के तहत जंगलों में फलदार पेड़ लगाने की ठानी.

चुनाहजूरी के पूर्व मुखिया चतरू कहते हैं की वन विभाग जंगलों में ऐसे पेड़ लगा रहा है जिससे उसे ही लाभ मिलता है जबकि जंगलों पर आश्रित आदिवासियों के लिए जंगल में कुछ नहीं है.

चतरू का कहना है, "हम पेड़ लगा रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ी को फल मिलें और जंगल हरे भरे हो जाएँ, इसमें बुरा क्या है? हम जंगल के रहने वाले आदिवासी हैं. यह हमारी संस्कृति है और इसी पर हम आश्रित हैं."

चुनाहजूरी और इसके आस पास के गावों के आदिवासी जंगल में जामुन, आम, नीम, बेर आदि के पेड़ लगाने का काम कर रहे हैं. इतना ही नहीं, वे जंगलों से झाड़ियाँ और दूसरे परजीवी पौधों को साफ़ करने का काम भी कर रहे हैं.

चुनाहजूरी के ही मानाराम उईकेनेइओं ने बताया कि आदिवासियों ने एक अभियान के तहत पिछले एक साल में बीस हज़ार से ज्यादा पेड़ जंगल में लगाए. मगर इन पेड़ों को वन विभाग के अधिकारियों नें उखाड़ कर फ़ेंक दिया.

किसके जंगल?

गाँव से निकलकर मैं आदिवासियों के समूह के साथ जंगल की तरफ गया.

200 एकड़ से ज्यादा में फैले इस जंगल को देखने से लगता है कि यह कोई वीराना हो. जगह जगह सागवान के कटे हुए पेड़ और कहीं कहीं पर उखड़े हुए नए आम और जामुन के दरख्त. गाँव वाले बताते हैं कि सागवान के पेड़ की कटाई जंगल विभाग के लोग कर रहे हैं. और इसी क्रम में वे आदिवासियों द्वारा लगाए गए पेड़ भी काट कर फेंक रहे हैं.

मध्य प्रदेश के वन विभाग का मानना है कि जंगल में पेड़ लगाकर आदिवासी दरअसल अतिक्रमण कर रहे हैं.

बैतूल के चुनाहजूरी के ही वन अधिकारी केके दुबे कहते हैं कि पेड़ लगाने के बहाने आदिवासी जंगल पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं.

उनका कहना है,"पहले वह पेड़ लगाएंगे, फिर उसका फल तोड़ेंगे. यह एक तरह से अतिक्रमण करने की उनकी चाल है."

मगर पूछे जाने पर कि क्या आदिवासियों का जंगल पर कोई अधिकार नहीं है, दुबे कहते हैं, "वह पेड़ लगाएं मगर हमारे साथ मिलकर. यह जंगल किसका है? ज़ाहिर है सरकार का है. वह हमारे साथ मिलकर काम करें."

जंगलों को नुकसान

Image caption चुनाहुजूरी के पूर्व मुखिया चतरू कहते हैं की वन विभाग जंगलों में ऐसे पेड़ लगा रहा है जिससे उसे ही लाभ मिलता है जबकि आदिवासियों के लिए जंगल में कुछ नहीं है.

आदिवासियों के जल, जंगल और ज़मीन पर अधिकार को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहे किसान आदिवासी संगठन के राजेंद्र गढ़वाल का आरोप है कि वन विभाग के अमले ने बीस हज़ार से ज्यादा पेड़ों को उखाड़ कर फेंक दिया है.

अब संगठन दोषी वनकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है. गढ़वाल कहते हैं की वन विभाग द्वारा लगाए जा रहे पेड़ों से यहाँ के आदिवासियों को कोई लाभ नहीं है.

गढ़वाल का कहना है, "सागवान और जटरोफा के पेड़ न तो छाया देते हैं और ना ही फल. इन्हें वन विभाग बेचता है और पैसे कमाता है. आदिवासियों के लिए इसमें कुछ नहीं है. इसलिए वे फलों के पेड़ लगा रहे हैं "

गढ़वाल का ये भी कहना है कि वन विभाग ने इस इलाके के कई आदिवासियों पर आपराधिक मामले दर्ज किये हैं. अब उनकी मांग है कि विभाग के उन कर्मियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने आदिवासियों के फलदार पेड़ों को उखाड़ फेंका है.

आदिवासियों और वन विभाग के बीच चल रहे संघर्ष में नुकसान जंगलों का ही हो रहा है.

शायद बैतूल भारत में एक मात्र ऐसी जगह है जहाँ लोगों पर पेड़ लगाने को लेकर मामले दर्ज किए जा रहे हैं. वनों पर आदिवासियों को अधिकार देना तो दूर, विभाग के इस रवैये ने आदिवासियों को जंगलों से आहिस्ता-आहिस्ता बेदखल करना शुरू कर दिया है.

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