बगावत के बीच विजय बहुगुणा बने मुख्यमंत्री

Image caption विजय बहुगुणा के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस के सारे विधायक मौजूद नहीं थे

उत्तराखंड कांग्रेस में बगावत के बीच विजय बहुगुणा ने राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है. राज्य के वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत और उनके समर्थक कांग्रेस आलाकमान के इस फैसले से नाराज हैं.

देहरादून के परेड ग्राउंड में एक सादे समारोह में राज्यपाल मार्गरेट अल्वा ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. विजय बहुगुणा ने फिलहाल अकेले ही शपथ ली है.

शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, सांसद सतपाल महाराज और समर्थक विधायक मौजूद थे. आमंत्रित नेताओं में कांग्रेस पर्यवेक्षक गुलाम नबी आजाद भी मौजूद थे.

विरोध के स्वर मुखर

हरीश रावत, उनके समर्थक विधायकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया है. इस अवसर सिर्फ 12 कांग्रेसी विधायक मौजूद थे यानी उसके 20 विधायकों ने बहिष्कार किया.

Image caption उत्तराखंड में चुनावी नतीजे आने से पहले ही हरीश रावत को मुख्यमंत्री पद का प्रबद दावेदार माना जा रहा था

कांग्रेस को समर्थन देने वाले तीन निर्दलीय और उत्तराखंड क्रांति दल का एक विधायक भी शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद था.

मंगलवार को दिन भर दिल्ली और उत्तराखंड में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज रही, लेकिन आखिर में विजय बहुगुणा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली.

विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले के विरोध में केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री हरीश रावत ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

उत्तराखंड कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेंद्र अग्रवाल हरीश रावत के काफी करीबी माने जाते हैं. उन्होंने देहरादून में कहा, ''हरीश रावत ने सोनिया गांधी को अपना इस्तीफा भेज दिया है. हरक सिंह रावत सहित 17 विधायक हरीश रावत जी के साथ हैं. अगर जरूरत पड़ी तो हम नई पार्टी बनाने पर भी विचार कर सकते हैं.''

उन्होंने आरोप लगाया, ''विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला पैसा लेकर किया गया है. ये कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भावना के साथ खिलवाड़ और उनका अपमान है.''

उन्होंने कहा, ''विजय बहुगुणा का उत्तराखंड में कांग्रेस को मजबूत करने में कोई योगदान नहीं है. पार्टी को अपना फैसला बदलना होगा. हर हाल में मुख्यमंत्री हरीश रावत को ही बनाया जाना चाहिए.''

सूत्रों के अनुसार हरीश रावत ने सोनिया गांधी को लिखे पत्र में कहा है कि वो उत्तराखंड जाकर कांग्रेस कार्यकर्त्ता की हैसियत से काम करना चाहते हैं.

दोहराया गया इतिहास

हरीश रावत के साथ एक तरह वर्ष 2002 का इतिहास ही दोहराया गया है जब मुख्यमंत्री का निवाला उनके मुंह तक आकर छिन गया था और अप्रत्याशित ढंग से आखिरी पल में नारायण दत्त तिवारी को सत्ता की बागडोर सौंप दी गई थी.

हरीश रावत के समर्थकों का मानना है कि उनके साथ धोखा किया गया है. दिलचस्प ये है कि हरक सिंह रावत, जो कल तक मुख्यमंत्री पद के मुकाबले में हरीश रावत के प्रतिद्वंदी थे, सूत्रों के अनुसार उन्होंने हरीश रावत से हाथ मिला लिया है.

उनका कहना है, ''असली कांग्रेस हम हैं, अगर सांसदों में से ही मुख्यमंत्री बनाया जाना था तो हरीश रावत मुख्यमंत्री बनते और अगर विधायकों में से मुख्यमंत्री बनता तो मुझे बनाया जाना चाहिए.''

उधर पार्टी के सांसद सतपाल महाराज और प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य सहित करीब 15 विधायक विजय बहुगुणा के साथ बताए जाते हैं.

उनके समर्थकों का कहना है कि ये सिर्फ दबाव की राजनीति है और कांग्रेस इस तरह के संकट से निकलने में सक्षम है. सरकार बनाने और चलाने में कोई दिक्कत नहीं आएगी.

'कांग्रेस के स्वामी-भक्त'

विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री चुनने में पार्टी हाई कमान ने जो भी फॉर्मूला अपनाया हो, लेकिन बड़ी संख्या में पार्टी के कार्यकर्ताओं को ये फैसला पच नहीं रहा है.

Image caption विरोधी खेमा कह रहा है कि विजय बहुगुणा ठेठ उत्तराखंडी नहीं हैं

इस कथित इकतरफा फैसले से ये संदेश गया है कि बहुगुणा को ये इनाम गांधी परिवार की स्वामी-भक्ति के कारण दिया गया है. उनका कहना है कि ये कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व का अपमान और उसके साथ छलावा है क्योंकि विजय बहुगुणा एक बाहरी नेता है.

गौरतलब है कि विजय बहुगुणा पहाड़ मूल के जरूर हैं लेकिन उनका पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा लखनऊ और दूसरे शहरो में होने के कारण उन्हें ठेठ उत्तराखंडी नहीं माना जाता जो उत्तराखंड के लिए हमेशा एक भावनात्मक मुद्दा रहता है.

उन्हें वो सम्मान भी हासिल नहीं है जो उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा को मिला हुआ था.

भाजपा की पैनी निगाह

उत्तराखंड की राजनीति में पूरी सक्रियता से वो वर्ष 2007 से ही हैं जबकि हरीश रावत वर्ष 1980 में पहली बार सांसद चुने गये थे और उत्तराखंड में कांग्रेस को खड़ा करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है.

हालांकि विजय बहुगुणा के समर्थक और नरेंद्र नगर के विधायक सुबोध उनियाल ने दावा किया है कि बहुगुणा एक बेहतर मुख्यमंत्री साबित होंगे और उनकी सरकार पूरी मजबूती से पांच साल तक चलेगी.

कांग्रेस में चल रहे इस घटनाक्रम पर सत्ताधारी भाजपा में भी गहमागहमी है. खासतौर पर पूर्व मुख्यमंत्री निशंक चौकन्नी निगाहों से राजनीति का पासा फेंकने को तैयार नजर आ रहे हैं. उनका कहना है, ''आगे-आगे देखिए, क्या होता है.''

इसके साथ ही ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि कांग्रेस की ये सरकार आखिर कैसे अपना बहुमत साबित कर पाएगी और कितनी टिकाऊ होगी.

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