अस्सी साल बाद मिलीं क्रांतिकारियों को डिग्रियां

  • 22 मार्च 2012
कोलकाता इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption पश्चिम बंगाल आजादी की लड़ाई का एक प्रमुख केंद्र था.

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियार उठाने वाली दो बंगाली छात्राओं को कोलकाता विश्वविद्यालय ने 80 साल बाद स्नातक के प्रमाणपत्र दिए हैं.

कोलकाता विश्वविद्यालय के वार्षिक समारोह में प्रीतिलता वाडेदार और बीना दास को स्नातक की डिग्रियां दी गईं.

प्रीतिलता वाडेदार ने साल 1932 में ब्रिटिश सेना के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में हिस्सा लिया था और गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.

जबकि बीना दास को उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया था जब उन्होंने दीक्षांत समारोह में ब्रिटिश चांसलर की हत्या करने की कोशिश की.

दीक्षांत समारोह में ही बीना दास को भी डिग्री मिलने वाली थी.

कोलकाता विश्वविद्यालय के मौजूदा उप कुलपति सुरंजन दास ने इस मौके पर कहा, “क्रांतिकारी राष्ट्रवादी राजनीति में शामिल होने की वजह से इन दोनों को अपनी स्नातक डिग्रियों से वंचित होना पडा़. विश्वविद्यालय ने उनके रिकॉर्ड्स की खोज की और इस तरह अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी का निर्वहन किया.”

सूर्यसेन

प्रीतिलता वाडेदार मास्टर दा के नाम से मशहूर क्रांतिकारी सूर्यसेन के क्रांतिकारी समूह में शामिल हुईं जिन्होंने चटगांव क्षेत्र को आजाद कराने की योजना बनाई थी.

अठारह अप्रैल 1930 को सुबह 10 बजे इस समूह ने पुलिस शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया. क्रातिकारियों ने टेलीफोन लाइनें काट दीं और ट्रेनों के परिचालन को भी रोक दिया. हालांकि बाद में सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया.

इस दौरान करीब 80 ब्रिटिश सैनिक और 12 क्रांतिकारी मारे गए थे. प्रीतिलता वाडेदार और मास्टर सूर्यसेन भाग गए.

इतिहासकार अमलेंदु डे का कहना है, “हालांकि यह काम काफी विलंब से हुआ, फिर भी बहुत अच्छा हुआ.”

लेकिन इस सम्मान समारोह में न तो प्रीतिलता और न ही बीना दास के परिवार से कोई शामिल हुआ.

विश्वविद्यालय सूत्रों के अनुसार उन्हें इन क्रांतिकारियों का कोई रिश्तेदार नहीं मिल पाया.

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