बेटियों का ब्याह और कर्ज़े में सरकार

मुख्यमंत्री कन्यादान योजना

बेटियों के ब्याह में पिता के कर्ज़दार हो जाने का क़िस्सा तो आम है लेकिन अगर सरकार भी ऐसी हो जाए तो ? छत्तीसगढ़ में ऐसा ही हुआ है.

'मुख्यमंत्री कन्यादान योजना' के तहत राज्य सरकार ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवार की लड़कियों की शादी करवाती रही है. लेकिन राज्य के कई ज़िलों में सरकार द्वारा शादी के लिये जिन दुकानदारों से सामान ख़रीदा गया, उनका उधार अब तक नहीं चुकाया गया है.

लाखों के उधार के भुगतान के लिए दुकानदार चक्कर काट रहे हैं और सरकारी विभाग उन्हें आश्वासन दे रहा है. आशंका है कि इस साल लड़कियों के हाथ पीले करने में सरकार को मुश्किल आएगी क्योंकि दुकानदारों ने चेता दिया है कि पैसा नहीं चुकाया तो इस बार सामान नहीं मिलेगा.

दुकानदारों की इस चेतावनी के बाद राज्य का महिला और बाल विकास विभाग हरकत में आया है. विभाग का दावा है कि कन्यादान योजना के तहत जिन दुकानदारों का भुगतान बचा हुआ है, उनका ‘कर्ज़ा’ जल्दी ही चुका दिया जायेगा.

कन्यादान योजना

Image caption इस योजना के तहत सरकार ने दुकानदारों से उधार लिया था. कुछ दुकानदारों को अपने पैसों का अबतक इंतज़ार है.

दरअसल राज्य सरकार ने ग़रीब लड़कियों की शादी में आने वाली आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने के उद्देश्य से साल 2005 में कन्यादान योजना शुरु की है.

इस योजना में ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार की लड़कियों की शादी के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है. जिसके तहत महिला और बाल विकास विभाग ग़रीब लड़कियों के लिये सामूहिक विवाह समारोह का आयोजन करता है.

इस विवाह समारोह में राज्य सरकार प्रत्येक जोड़े पर कुल 10 हज़ार रुपए खर्च करती है. हरेक जोड़े को साढ़े सात हज़ार रुपए की क़ीमत का गृहस्थी का सामान और पांच सौ रुपये दिया जाता है.

शेष बची हुई दो हज़ार रुपये की रकम सामूहिक विवाह समारोह की व्यवस्था में ख़र्च की जाती है.

सरकार का दावा है कि पिछले कुछ सालों में इस योजना के तहत 33 हज़ार लड़कियों की शादियां कराई गई हैं.

कर्ज़े में सरकार

राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री लता उसेंडी कहती हैं, “सरकार चाहती है कि ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोग भी अपनी बेटियों के हाथ आसानी से पीले कर सकें. इस योजना से फिजूल ख़र्ची भी रुकी है और गरीबों में आत्मसम्मान भी आया है. इसके अलावा लोग शादी-ब्याह के लिये कर्ज़ लेने से भी मुक्ति पा रहे हैं.”

लेकिन सरकारी ख़र्चे पर होने वाली शादी के लिए सरकार को भी जरुरी सामान उधारी में ही लेना पड़ा है. राज्य के अलग-अलग ज़िलों में जो शादियां हुई हैं, उसके लिये बैंडबाजा से लेकर दरी और कनात के लिये भी सरकार ने उधार से काम चलाया.

अब जैसे बिलासपुर ज़िले में ही पिछले साल 738 शादियां महिला एवं बाल विकास विभाग ने करवाईं. पहले साढ़े तीन सौ शादियों की योजना थी. लेकिन जब पंजीकरण करवाने वालों की संख्या बढ़ी तो ज़ाहिर तौर पर ख़र्चे भी बढ़ गए.

सरकारी अधिकारियों की मानें तो सरकार की ओर से इन शादियों के लिये 45 लाख रुपये का बजट आवंटित था. लेकिन प्रति जोड़ा 10 हज़ार रुपये के हिसाब से ये रक़म 73 लाख 80 हज़ार रुपए तक जा पहुंची.

बिलासपुर ज़िले के महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी सुरेश सिंह कहते हैं, “आम तौर पर जो लक्ष्य रखा गया था, उससे कहीं अधिक जोड़ों की शादियां करवाई गईं. इस कारण ही हमें उधार ले कर काम चलाना पड़ा.”

भुगतान का इंतज़ार

किराए पर विवाह समारोह के लिये जरुरी साजो-सामान उपलब्ध कराने वाले तरुण कुमार अग्रवाल का कहना है कि दो साल पहले हुई इस ‘सरकारी शादी’ के लिए सरकार ने उनसे किराये पर सामान लिया था, लेकिन उसका भुगतान लंबित पड़ा रहा.

तरुण कुमार अग्रवाल कहते हैं, “इस बार अगर मुझे पैसे नहीं मिले तो किसी भी हालत में मैं सरकार को उधार नहीं दूंगा. भले ही ये बेटियों के ब्याह का ही मामला क्यों न हो.”

शादी के लिए सरकार को उधार में सामान देने वाले तरुण अकेले नहीं हैं. सरकारी बजट के कारण हालत तो ये हुई है कि पिछले साल जिन लोगों का शादियां हुईं, उन्हें उपहार में मिलने वाली 500 रुपये की रक़म आज तक नहीं मिली.

शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय गुरुकुल के ब्रजेंद्र शुक्ला कहते हैं, “सरकार की इस तरह की योजनायें भी सरकारी ढर्रे का शिकार हो रही हैं. अगर योजनाएं हैं तो उसके अनुसार बजट का भी प्रावधान होना चाहिये. अन्यथा ऐसी महत्वपूर्ण योजना भी महज़ काग़ज़ों में सिमट कर रह जाएगी.”

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