माओवादियों की खीर और बंधक की भावुकता

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Image caption उड़ीसा में माओवादियों ने पिछले दिनों दो इतालवी नागरिकों को बंधक बना लिया था

माओवादी नेता सब्यसाची पंडा से इंटरव्यू करने का मेरे लिए यह पहला मौका नहीं था. लेकिन इस बार नया कुछ था तो वह यह कि केवल एक इंटरव्यू के अलावा इस बार कुछ और भी लेकर आने की सम्भावना थी- और वह भी एक ऐसे इंसान को जो भारत और इटली दोनों के लिए गंभीर चिंता का कारण बना हुआ हो.

21 मार्च को भुवनेश्वर से निकलते समय मन में काफी उत्साह के साथ साथ थोड़ी आशंकाएं भी थीं.

दारिंगबाड़ी पहुँचने के बाद अगर किसी कारण पंडा का फोन या दूत नहीं पहुंचा तो? अगर किसी कारण अंतिम समय पर पंडा ने अपना फैसला बदल दिया और कोलान्जेलो को छोड़ने से इनकार कर दिया तो? लेकिन जब चार बजे तक न फ़ोन आया न दूत, तो ये आशंकाएं और बढ़ गईं.

आखिरकार दोपहर चार बजे के आसपास उनके एक साथी का फ़ोन आया, जिसने कहा कि उस छोटे से शहर में ख़ुफ़िया बिभाग के लोग गश्त लगा रहे हैं और इस लिए हो सकता है कि प्रस्तावित साक्षात्कार को रद्द करना पड़े.

हमने उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की कि उनकी सूचना सही नहीं है और भुवनेश्वर छोड़ने से पहले हमने पुलिस महानिरीक्षक से स्पष्ट आश्वासन लिया है की माओवादी कैंप की ओर जाते हुए या वहां से वापस आते समय कोई पुलिस या अर्धसैनिक बल के कार्यकर्ता हमारा पीछा नहीं करेंगे.

उस साथी को इससे तसल्ली हुई या नहीं, यह पता नहीं चला. लेकिन उन्होंने हमारा आश्वासन अपने नेता तक पहुँचाने का वादा ज़रूर किया.

पत्रकारों से परेशान

तब तक हमारी पूरी टीम को पता चल चुका था कि खुफिया एजेंटों से हमारे लिए और भी बड़ा खतरा था राष्ट्रीय और स्थानीय टेलीविज़न चैनलों के रिपोर्टरों का एक झुंड, जो हमें एक पल के लिए अकेला नहीं छोड़ रहा था.

हम लोग नाश्ता भी करने निकलते तो हमारे पीछे गाड़ियों और ओवी वैनों की एक लम्बी कतार लग जाती.

ज़ाहिर है उन्हें पता चल गया था कि बंधक बनाए गए एक इतालवी पर्यटक को हमारे ही हाथों सौंपा जायेगा. आनन फानन में हम में से एक ने इन्हें एक नाम भी दे डाला - हाकारज्जी.

लेकिन अगले दिन दोपहर करीब डेढ़ बजे आखिरकार जब वह फ़ोन आया जिसका हमें बेचैनी से इंतज़ार था, तो हमें लगा क़ि मैदान साफ़ है.

दारिंगबाड़ी शहर छोड़ कर हम जब अब अपने निर्धारित रास्ते पर लगभग दस किलोमीटर निकल गए, तो हमें यकीन हो गया क़ि हमने हाकारज्जी को चकमा दे दिया.

लेकिन हम गलत थे. 12-15 किलोमीटर जाने के बाद हमने देखा क़ि दूसरी ओर से मोटर साइकिल पर दो स्थानीय पत्रकार आ रहे हैं.

ड्राइवर ने हमें बताया क़ि उन्होंने पीछे मुड़कर हमारा पीछा करना शुरू कर दिया. उनकी मंशा के बारे में तसल्ली करने के लिए हम लोग एक छोटे से बाज़ार में रूक कर लोगों से हल्दी के भाव के बारे में बातचीत शुरू की तो देखा क़ि दोनों बगल के दूकान पर बड़े खा रहे हैं.

देखते ही देखते वहां कम से कम पांच ओवी वैनों सहित एक दर्जन गाड़ियों का जमघट लग गया.

अब तक हमारी टीम सभी से काफी तमीज से पेशा आ रही थी, लेकिन अब हमारे टीम लीडर अपना गुस्सा रोक नहीं पाए. उनके रवैये के लिए उन्हें खरी खोटी सुनाने के बाद हम तत्काल दारिंगबाड़ी वापस आ गए.

उस समय हम अपने पत्रकार मित्रों से नाराज़ ज़रूर थे. लेकिन बाद में हमने उन्हें मन ही मन धन्यबाद दिया, क्योंकि दारिंगबाड़ी लौटने के कारण हमने खाना खा लिया. हमें क्या पता था क़ि अगला खाना पूरे नौ घंटे बाद मिलेगा!

निर्धारित स्थान पर गाड़ी से उतर कर हमने इधर-उधर नज़र दौड़ाया और उस आदमी को ढूँढने क़ि कोशिश की, जो हमें जंगल के अन्दर ले जाने वाला था.

गाइड की कूट भाषा

Image caption माओवादियों ने पत्रकारों के सामने एक नागरिक को रिहा कर दिया था

मेरी निगाह एक फुल पैंट, रंग उड़े हुए लाल बनियान और हवाई चप्पल पहने और कंधे पर एक तौलिया डाले मेरी ओर आ रहे एक नौजवान के ऊपर पड़ी और मैं तत्काल समझ गया कि यही हमारा गाइड है. बाद में पता चला कि उसकी दोहरी उम्र वाला एक दूसरा गाइड भी था.

पगडण्डी छोड़ कर जंगल में घुसने के बाद लाल बनियान वाले ने एक टहनी निकाली, उसे तोडा और उसमें से कुछ निकल कर हमारे टीम लीडर को दिया.

पास जाकर देखा तो पता चला कि वह हमरे नाम पंडा का सन्देश था, जिसे पढ़े जाने के बाद नौजवान गाइड फाड़ कर निगल गया.

पूछने से पता चला कि यह अजीब हरकत माओवादियों की इस कोशिश का हिस्सा है कि कहीं कोई प्रमाण छूट न जाए.

हमने यह सोचा था कि पिछली बार की तरह इस बार भी दो-तीन घंटे चलने के बाद हम अपनी मंजिल पर पहुँच जायेंगे. निश्चित होने के लिए हमने जितनी बार अपने मार्गदर्शकों से पूछा, जवाब मिला "बस, अब थोड़ी ही दूर है".

बाद में जवाब या तो एक हल्की मुस्कान से मिला या फिर पूरी चुप्पी से.

जंगल की टेढ़ी-मेढ़ी, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते, फिसलते और फिर चलते हुए चार घंटे हो चुके थे. लेकिन मंजिल दूर दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रही थी.

खाना ही नहीं, सारा पानी भी ख़त्म हो चूका था. पाँवों में जलन हो रही थी और होठों में सूजन. लेकिन हमारा गाइड था कि हमें वही पुरानी धुन सुनाये जा रहा था.

जब हमने अपना फैसला सुना दिया कि अब हम चल नहीं पाएंगे, तो लाल बनियान वाले ने कहा कि हम रात उसके गाँव में गुजारेंगे.

Image caption माओवादियों ने पत्रकारों को जंगल में लाने के लिए गाइड भेजा था

गाँव पहुँचते पहुँचते रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे. हलक में थोड़ा पानी गया तो सभी एक बरामदे पर ही ढेर हो गए. रात के लगभग एक बजे लाल टी शर्ट वाले ने हमें जगाया और गरम गरम चावल और कांदुल डाल परोसा. थोड़ी ही देर में सभी खर्राटे ले रहे थे.

कुछ ही घंटों में ठीक पांच बजे शुरू हुई दूसरे दिन की यात्रा. इस बार लाल टी शर्ट वाले के साथ एक सफ़ेद शर्ट वाला भी था. हमने इस नए बन्दे से पूछा कि अब कितनी दूर है, तो उसने कहा तीन घंटे. लेकिन पांच घंटे चलने के बाद भी हम मंजिल से फिर भी दूर थे. तब तक हम में से दो कि हालत ख़राब हो चुकी थी.

चिलचिलाती धूप में हम लोग जब तक हाँफते, रेंगते हुए माओवादी अड्डे पर पहुंचते तब तक दिन के तीन बज चुके थे. सब्यसाची पंडा ने एके 47 पकडे अपने साथियों के साथ हमारा स्वागत किया.

माओवादियों की मेहमाननवाजी

फौरन भोजन का इंतज़ाम किया गया. तब तक पेट की ज्वाला इतनी बढ़ चुकी थी कि सादा और फीका वह खाना ज़िन्दगी का सबसे स्वादिष्ट खाना लगा.

भोजन के बाद शुरू हुआ साक्षात्कार का दौर, जिसके दौरान सब्यसाची ने वह घोषणा की जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार था - क्लुँडियो कोलाजेलो को वे हमारे हाथों में सौंप देंगे.

लेकिन चूँकि अब गाड़ी बुलाने की कोई गुंजाईश नहीं थी इस लिए हम अगले दिन सुबह ही रवाना होंगे. इतालवी पर्यटकों से हमारी अभी मुलाकात नहीं हुई थी.

शाम के समय चाय की जगह खीर पेश किया गया और फिर शुरू हुआ सब्यसाची के साथ अनौपचारिक बातचीत का एक लम्बा दौर जो रात के 10 बजे ही ख़त्म हुआ.

आदिवासी इलाकों में पर्यटन को बढ़ावा देने के दुष्परिणाम से लेकर माओवादी पार्टी में अंतर्विरोध तक कई मुद्दों पर बहस हुई. स्पष्ट था की सभी प्रसंगों का सब्यसाची ने काफी गहराई से अध्ययन किया है.

शायद दिन की कमी पूरी करने के लिए सब्यसाची ने डिनर पर देशी मुर्गा और मछली दोनों को इंतज़ाम किया था.

हमारे साथ गए एनडीटीवी के कैमरापरसन बिश्वजीत को बुखार आया तो माओवादियों के बारे में एक और बात पता चली: उनके पास मलेरिया से लेकर सर्पघात तक हर मर्ज़ की दावा है.

विश्वजीत का तत्काल मलेरिया टेस्ट किया गया. टेस्ट नेगटिव रहा लेकिन फिर भी सब्यसाची ने उसे दवाइयां दी. अगले सुबह तक वह पूरा स्वस्थ हो चुका था.

अगली सुबह 9 बजे आखिरकार वह घड़ी आई जिसके लिए हम लोग एड़ी-चोटी एक कर इतनी दूर आए थे. एके 47 पकड़े दो बन्दूकधारियों से घिरे कंधे पर एकाएक पैर लटकाए कोलान्जेलो नीचे आते हुए नज़र आए.

11 बजे दिन के बाद मुक्ति की ओर कदम बढ़ा रहे कोलान्जेलो से बातचीत के दौरान वे काफी भावुक हो रहे थे, जो स्वभाविक था.

जब हम में से एक ने उनसे पूछा कि यहाँ से निकलने के बाद सबसे पहले किस से बात करना चाहेंगे, तो उनकी आँखों में आँसू आ गए. उनका छोटा सा उत्तर था "मेरी पत्नी."

मुझे अपनी पत्नी की याद आई जिसके साथ पिछले तीन दिन से मेरा कोई संपर्क नहीं हो पाया था और जो बेशक कोलान्जेलो की पत्नी की तरह परेशान हो रही होगी.

अनजाने में मैं भी जरा भावुक हो उठा. मुझे लगा कोलान्जेलो की तरह मैं भी परिस्थितियों द्वारा बंधक बना लिया गया था और आज उनके साथ मुझे भी रिहाई मिल रही है.

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