महाराष्ट्र की राजनीति में 'भ्रष्टाचार का भूचाल'

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Image caption विलास राव देशमुख ने कहा है कि विधानसभा में रिपोर्ट आने के बाद वे जवाब देंगे

महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस की सरकार एक बार फिर विवाद में घिर गई है.

ऑडिटर जनरल की लीक हुई रिपोर्ट अगर सही है तो भूतपूर्व मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख ने वर्ष 2005 में सस्ते दामो में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) को सरकारी जमीन बेच दी.

इस एनजीओ की स्थापना खुद उन्होंने की थी. यह कानून का उल्लंघन माना जाता है.

विलास राव देखमुख केंद्र में विज्ञान और तकनीक मामलों के मंत्री हैं. उन्होंने कहा है कि वे इस आरोप का जवाब 16 अप्रैल को देंगे, जब रिपोर्ट विधान सभा में पेश की जाएगी. दूसरी विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने उनके इस्तीफे की मांग की है.

विलास राव देशमुख केंद्र में मंत्री बनने से पहले महाराष्ट्र के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें इस बात के लिए फटकार लगाई थी कि उन्होंने फिल्मकार सुभाष घई को सस्ते दाम में सरकारी जमीन क्यों बेची.

आरोप

लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप के दायरे में वे अकेले नहीं फँसे हैं. खबरों के अनुसार सीएजी की रिपोर्ट में महाराष्ट्र के 10 नेताओं के खिलाफ आरोप हैं कि उन्होंने अहम सरकारी जमीने अपने परिवारवालों या दोस्तों को कूड़े के भाव बेच दिए.

इस तरह से सरकार को उन्होंने करोड़ो रुपए का नुकसान कराया और खुद का फायदा. इस रिपोर्ट में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और मंत्री छगन भुजबल का नाम भी शामिल है.

भाजपा ने एक विपक्षी पार्टी के नाते विलास राव देशमुख के इस्तीफे की मांग ज़रूर की. लेकिन भ्रष्टाचार के इल्जाम से कोई भी पार्टी अपना दामन साफ नहीं रख पाई है.

भाजपा और शिवसेना की जब मिली-जुली सरकार थी, उस समय भी इन दोनों पार्टियों के नेताओं के खिलाफ भी ऐसे ही इल्जाम लगाए गए थे.

उस जमाने में बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में राज ठाकरे के एक दोस्त को एक बहुमूल्य जमीन सस्ते दाम में खैराती ट्रस्ट के नाम पर बेची गई थी. आज उस जमीन पर एक बड़ी इमारत कड़ी है और वहां बड़ी-बड़ी कंपनियों के दफ्तर हैं.

यहाँ के राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भ्रष्टाचार के इस हमाम में सभी नंगे हैं. नेता भ्रष्ट हैं तो बाबू भी कम नहीं.

जमीन की कमी

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Image caption भाजपा-शिवसेना पर भी ऐसे आरोप लगे हैं

विशेषज्ञों के अनुसार महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार बड़े स्तर पर होने का एक महत्वपूर्ण कारण है मुंबई, पुणे, नासिक और नागपुर जैसे शहरों में जमीन की कमी और इसलिए इसके आसामन छूते दाम.

दूसरा कारण यह बताया जाता है कि मुंबई जैसे शहर में सरकार को बड़े-बड़े विकास के प्रोजेक्ट्स बनाने पड़ते हैं इन प्रोजेक्ट्स के टेंडर में काफी घपले हैं.

सरकारी दफ्तरों के बाहर दलालों की भीड़ लगी रहती है. अगर आपको नया पासपोर्ट बनवाना हो या फिर नई गाड़ी के लिए रजिस्ट्रेशन नंबर हासिल करना हो तो आपको इन दलालों को पैसे खिलाने पड़ेंगे.

आपके सारे दस्तावेज सही हों, तब भी. ये दलाल फिर बाबू और मंत्रियों को पैसे खिलाते हैं. एक स्थानीय पत्रकार ने मुझे बताया कि उनके विचार में महाराष्ट्र भ्रष्टाचार में भारत में अव्वल नंबर है.

अगर आम जनता को इसका पता है, तो नेताओं को भी इसका अहसास है. पिछले साल एनसीपी के नेता डीपी त्रिपाठी ने यह स्वीकार किया था कि महाराष्ट्र सरकार में भ्रष्टाचार है. इसके सियासी हल्के में भ्रष्टाचार मौजूद है.

उन्होंने यह बात एक सम्मलेन में कही थी. उन्होंने यह भी कहा था कि महाराष्ट्र में रिश्वत के कारण काम या प्रोजेक्ट्स पर इसका असर नहीं होने दिया जाता है जबकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पैसे भी खाए जाते हैं और काम या विकास भी नहीं होता.

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