खाक हो चुके घर से परिजनों की हड्डियाँ मिलीं....

  • 12 अप्रैल 2012
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Image caption गुजरात दंगों के दौरान बड़ी संख्या में मुसलमान मारे गए थे

मेरा नाम मजीद मियां मुराद मियां मलिक है. मैं ओड गांव के पीरावली भागोल का रहना वाला हूं.

एक मार्च 2002 को हुए दंगे में मेरे पड़ोसी के घर में 23 लोगों को जिंदा जला दिया जिसमें मेरे अब्बा, अम्मी, बहन समेत खानदान के 16 लोग थे.

दंगा नमाज के समय हुआ, तब मैं अपने खेत पर था. खेत से मैंने धुआँ देखा और जब मैं वापस आया तो मुझे मोहल्ले वालों ने अपने घर नहीं जाने दिया. उनका कहना था कि अगर मैं वहां गया तो मैं भी दंगे में फंस जाऊँगा.

लेकिन मैंने कहा कि मुझे वहां जाने दो. रास्ते में मेरे बड़े अब्बा का घर है जहां से मेरा घर दिखाई पड़ता. मैंने देखा मेरा मकान जल रहा था.

फिर शाम सात-सवा सात बजे अपने मकान पर गया और अपने घरवालों को पुकार लगाई जिसे सुनकर मेरी बीवी-बच्चे, मेरे चाचा का लड़का और कुछ लोग आकर मुझसे लिपट गए और बताया कि पड़ोस के घर में बचने के लिए गए और वहां सब मारे गए.

घर हुआ खाक

मुझे बताया कि मेरे चाचा और बड़े अब्बा के घरवाले मेरे घर जान बचाने के लिए आए. मेरा दो मंजिला मकान है.

सब लोग ऊपर गए और वहां से पड़ोसी के घर चले गए. लेकिन मेरी बीवी को लगा यहां तो जल रहा है तो मेरी बीवी, बच्चे और बड़े अब्बा का लड़का मेरे घर वापस आ गए. लेकिन जो लोग, मेरे अब्बा, अम्मी और बहन पड़ोसी के घर में ही रह गए.

अपने बीवी-बच्चों को बचाकर मैं कैंप में चला गया. तीन-चार दिन बाद जब पुलिस आई तो मैंने रिपोर्ट लिखाई. फिर आठ तारीख को मैं वापस गया और मैंने वहां से दो-तीन किलो हड्डियां निकाली. मुझे तीस्ता सीतलवाड़ और मेरे वकीलों ने बहुत सहारा दिया और न्याय पाने में मेरी मदद की.

अब मैं ओड से 20 किलोमीटर दूर एक गांव में रहता हूं. अब भी मैं अपने गांव वापस नहीं जाता क्योंकि मुझे डर है. लेकिन जब भी (गांव में) कुछ अच्छा-बुरा या ब्याह-शादी होती है तो डर-डर कर जाते हैं.

वैसे गुजरात सरकार ने तो कुछ नहीं किया लेकिन केंद्र सरकार ने कुछ किया है. अब दंगाइयों को सजा हो गई है. हमें सुकून है कि अब हमें थोड़ा बहुत तो न्याय मिला. अब उन्हें क्या सजा मिलेगी, ये कानून पर छोड़ देते हैं हम.

ऐसा होना चाहिए कि हर जगह चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, जिसकी गलती हो अगर उसे सजा मिलेगी, तो हिंदुस्तान में शांति ही शांति होगी.

(मजीद मियाँ से बात की बीबीसी संवाददाता अनुभा रोहतगी ने)