सिगरेट, शराब चढ़ाई जाती है इस मजार पर

कप्तान बाबा
Image caption कप्तान बाबा की मजार पर लगे पत्थर से पता चलता है कि यह कब्र 21 मार्च 1858 की लड़ाई में मारे गए कैप्टेन एफ वेल्स की है.

लखनऊ में मूसाबाग के निकट है कप्तान बाबा की दरगाह. कप्तान बाबा के नाम से विख्यात हिंदू और मुसलमानों की आस्था से जुड़ी यह मजार एक ईसाई अंग्रेज सैनिक की कब्रगाह है.

दो परस्पर भिन्न मान्यताओं वाले मजहब के लोगों का एक तीसरे मजहब के व्यक्ति को संत मानकर पूजना तो अनूठा है ही इससे भी अजब है यहां पर चढऩे वाला चढ़ावा. इस मजार पर पूजा करने आने वाले लोग पूजा सामग्री के साथ चढ़ावे के लिए सिगरेट और शराब लाना नहीं भूलते.

लखनऊ से हरदोई रोड के रास्ते में मूसा बाग आसिफुद्दौला के लिए मोसियो मार्टिन ने बनवाया था. सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में यह हवेली अंग्रेजों और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के बीच हुई गोलीबारी में तहस नहस हो गयी.

कप्तान बाबा की मजार पर लगे पत्थर से पता चलता है कि यह कब्र 21 मार्च 1858 की लड़ाई में मारे गए कैप्टेन एफ वेल्स की है. हालांकि अब उस पत्थर की सफेद रंग से पुताई कर दी गयी है और उसे बड़ी मुश्किल से पढ़ा जा सकता है जिस पर ये भी लिखा है कैप्टेन एफवेल्स इस युद्ध में एक सच्चे ईसाई सैनिक की तरह मरे.

क्या है मान्यता

वर्ष 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक हादसे में मारे गए अंग्रेज सेना के अधिकारी कैप्टन एफ वेल्स की मजार पर सिगरेट चढ़ाने के लिए हर गुरुवार श्रद्धालुओं का तांता लगता है. सालों से चली आ रही इस रीति के पीछे मान्यता है कि कप्तान बाबा की मजार पर सिगरेट चढ़ाने से लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

कैप्टन की मजार के निकट ही सैय्यद इमाम अली शाह की दरगाह भी है. वैसे ये मजार कब से है इसका अंदाजा किसी को नहीं है लेकिन किवदंतियों के अनुसार अवध के नबाब आसिफुद्दौला ने वर्ष 1775 में फैजाबाद से लखनऊ आकर एकांत क्षणों को रूमानी बनाने के लिए जब मूसाबाग का निर्माण कराया था तब उसने रास्ते में पड़ रही इस मजार के लिए कुछ स्थान छोड़ दिया था.

इसी मजार के पीछे एक खेत में कैप्टन बाबा की दरगाह है. माना जाता है कि कैप्टन वेल्स सिगरेट और शराब का बहुत शौकीन था इसलिए उसकी मजार पर सिगरेट चढाई जाती है. हालांकि इस बारे में कोई भी नहीं जानता कि एक अंग्रेज की कब्र पर पूजा कब और कैसे शुरु हो गई.

इतिहास का जीवंत नमूना

टिम केरिन जो कैलीफोर्निया स्टेट युनिवर्सिटी लोंग बीच, अमेरिका में इतिहास के प्रोफेसर हैं, पिछले पांच सालों से लगातार लखनऊ आ रहे हैं और अपने लखनऊ प्रवास के दौरान वो मूसाबाग जाना नहीं भूलते. टिम कहते हैं कि दुनिया में अब बहुत कम जगह ऐसी बची हैं जहां आप इतिहास को अपने उसी रूप में जी सकते हैं. मूसाबाग और ये दरगाह उन्हें एक ऐसा ही अनुभव देते हैं.

अवधविद एवं साहित्यकार योगेश प्रवीन इसे आधुनिकता की ऐतिहासिकता से जोड़ते हुए कहते हैं यह एक ब्रिटिश सैनिक की कब्र मात्र है जिसे बाद में संत का दर्जा दे दिया गया. तथ्य कुछ भी हो पर आस्था पर तर्क नहीं चलता.

बारी कला गाँव के निवासी सैलाब यादव कहते हैं, ''कुछ तो बात होई तभी तो लोग आवत हैं.''

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