सूचना मांगने की सजा भुगतते वीरेंद्र महतो

Image caption महतो का दावा है कि सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने के बाद ही उनकी प्रताड़ना शुरू हुई.

सूचना के अधिकार का इस्तेमाल बिहार के वीरेंद्र महतो के लिए मुश्किल बनता जा रहा है.

उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं में धांधलियों को उजागर करने के लिए मांगी गई सूचना के कारण उन्हें और उनके परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा है.

महतो वही व्यक्ति हैं जिनसे टेलीफोन पर बात कर मुख्यंत्री नीतीश कुमार ने दो साल पहले 'जानकारी' नाम से एक सरकारी कॉल सेंटर का उद्घाटन किया. इस कॉल सेंटर का देश भर में खूब ढ़िढ़ोरा पीटा गया.

इसका मकसद टेलीफोन के जरिए लोगों का संबंधित विभागों से संपर्क करवाना और मांगी गई सूचनाएँ उपलब्ध कराना था.

करोड़ों के खर्च के बावजूद यह योजना नाकाम रही, हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दावा है कि ढाई साल में एक लाख से ज्यादा लोगों ने इस कॉल सेंटर का लाभ उठाया.

"सूचना मांगने की सजा"

राजनगर के पुलिस थाना प्रभारी सुधीर कुमार ने बीबीसी को बताया कि वीरेन्द्र महतो और उनके पुत्र पर मारपीट के अभियोग में आरोपपत्र दाखिल किया गया था और अब कार्रवाई जारी है.

महतो मानते हैं कि उनके साथ ये सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि उन्होंने सरकारी राशन दुकान से लेकर सड़क निर्माण तक में हो रही धांधली की पोल खोलने के लिए सूचनाएँ माँगी थीं.

बीबीसी से बातचीत में महतो ने कहा, ''सूचना मांगने के कारण दो-दो बार मेरा घर लूटा गया. घर में घुसकर मार-पीट की गई. बहू-बेटी को प्रताड़ित किया गया. घर से बाहर निकलने का रास्ता बंद करके आँगन में पेशाब-पैखाना कर दिया और इस तरह आज तक मेरे पूरे परिवार के साथ अभद्र व्यवहार हो रहा है. फिर भी मैं टूटा नहीं हूँ, लड़ाई जारी रखूंगा.''

वह बताते हैं कि उन पर रंगदारी मांगने के आरोप में मुकदमे भी किए गए और उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा.

सरकारी दाव पेंच

सूचना-अधिकार मंच संगठन के प्रभारी श्रीनिवास चारी कहते हैं कि भ्रष्ट लोग आरटीआई कार्यकर्ताओं पर इसी तरह के आरोपों में झूठे मुकदमे दायर करते रहते हैं.

उनके मुताबिक इस कानूनी अधिकार को कुचलने की तमाम साजिशें हो रही हैं और इसमें राज्य सूचना आयुक्त सबसे अधिक सवालों के घेरे में हैं.

बिहार जनाधिकार मंच नाम की संस्था इस राज्य में आरटीआई की दुर्दशा पर सबूतों का पुलिंदा लिए घूमती है. उसे शिकायत है कि इस मसले पर मीडिया की बेरुखी ने सरकार को बेपरवाह बना दिया है.

वैसे इसकी परवाह उस राज्य-सत्ता को भला क्यों होगी, जिस ने अपनी प्रचार-चतुराई से आरटीआई के अव्वल झंडाबरदार होने का भ्रम कायम कर रखा हो. हालांकि ये बात अब यहाँ आम चर्चा में है कि राज्य सरकार के लोक सूचना अधिकारियों से लेकर राज्य सूचना आयोग तक में अंदरूनी तौर पर एक सोची-समझी रणनीति काम किया जा रहा है.

जानकारों के मुताबिक़ वो रणनीति ये है कि सूचना पाने के अधिकार का चाहे जिस छल-बल से हनन करना पड़े, राज्य सरकार की प्रचारित छवि को बिगड़ने ना दिया जाए.

'खोखले दावे'

आरटीआई के क़ानूनी हथियार को कुंद करने में जी-जान से जुटे भ्रष्ट नौकरशाहों को अपने राजनीतिक आकाओं का पूरा- पूरा समर्थन मिलता हुआ दिख रहा है.

अजब विरोधाभास है कि बिहार में भ्रष्टाचार का ग्राफ देश के अन्य राज्यों से काफ़ी ऊंचा दर्ज होने के बावजूद राज्य सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने का दावा सबसे ज्यादा करती है.

यही वो राज्य है, जहाँ सत्ताधारी दल के कोषाध्यक्ष और सत्ता-प्रमुख के सबसे निकटस्थ व्यक्ति के ठिकानों पर हाल ही में इनकम टैक्स के छापे पड़े.

छापे में हजार-हजार रुपए की गड्डियों वाले कुल साढ़े चार करोड़ रुपए मिले, जो आंटा की बोरियों में छिपाकर रखे गए थे. इस पर सत्ता पक्ष ने गजब की चुप्पी साध ली है.

बिहार में इससे पहले आय कर विभाग के किसी छापे में इतनी बड़ी 'अवैध राशि ' नहीं पकड़ी गई थी, जो किसी नेता से जुड़ी हो.

फिर भी ये छापा मीडिया-मसाला बनकर नहीं उछला. कहाँ दबकर रह गया सूचना का अधिकार और क्यों कैद हो गई प्रेस की आजादी ?

ऐसे में यहाँ निष्पक्ष पत्रकारिता पर दबाव के संदर्भ में भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू की टिप्पणी भला कैसे गैर वाजिब लग सकती है?

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