भारतीय ने खरीदी गांधी के खून वाली मिट्टी

  • 17 अप्रैल 2012
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Image caption लकड़ी की एक छोटी प्लेट पर गांधीजी के खून वाली घास और मिट्टी के टुकड़े(साभारः मुलॉक्स)

ब्रिटेन में एक नीलामी में महात्मा गांधी के खून वाली घास और मिट्टी, उनका चश्मा और उनका चरखा एक भारतीय ने खरीद ली है और समझा जा रहा है कि इसे भारत सरकार को लौटा दिया जाएगा.

इस नीलामी में महात्मा गांधी से जुड़ी कुल 29 चीज़ों को नीलाम किया गया और ये सारी चीज़ें कुल मिलाकर एक लाख पाउंड यानी लगभग 81 लाख रूपए में नीलाम हुईं.

घास और मिट्टी, चश्मा और चरखा एक ही खरीदार ने फोन पर बोली लगाकर खरीदा जो भारतीय हैं मगर उनकी पहचान अभी प्रकट नहीं की गई है.

लेकिन इन चीज़ों को नीलाम करवानेवाली संस्था मुलॉक्स के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि उन्हें पूरा विश्वास है कि ये चीज़ें भारत लौट जाएँगी.

30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या के समय वहाँ से उठाई गई घास और मिट्टी 10 हज़ार पाउंड यानी लगभग आठ लाख रूपए में बिकी.

गांधी जी का चश्मा 34 हज़ार पाउंड यानी लगभग 27 लाख रूपए में बिका.

गांधी जी का चरखा 27 हज़ार पाउंड यानी लगभग 22 लाख रूपए में बिका.

इसके अतिरिक्त नीलामी में गांधीजी के हाथ की लिखी चिट्ठियाँ, उनके हस्ताक्षर वाली टंकित चिट्ठियाँ, उनकी निजी प्रार्थना पुस्तिका, उनके संदेश वाला एक एलपी रिकॉर्ड और कुछ फ़ोटोग्राफ बिक्री हुए.

गांधीजी की निशानियाँ-तस्वीरें

ख़ून वाली घास

महात्मा गांधी की निशानियों की नीलामी ब्रिटेन के श्रॉपशायर में एक रेसकोर्स में हुई.

इस नीलामी में सबसे चर्चित निशानी वो घास और मिट्टी का कुछ अंश था जिसपर गांधीजी के ख़ून की बूँदें गिरी थीं.

तब एक सैनिक पीपी नाम्बियार ने दावा किया था कि गांधीजी की हत्या के बाद उन्हें वहाँ एक जगह गांधीजी के खून में सनी घास और मिट्टी मिली थी.

मुलॉक्स का कहना है कि उसे ये सामग्री पीपी नाम्बियार के पत्र के साथ मिली थी, जिसमें उन्होंने बताया है कि कैसे उन्होंने 30 जनवरी 1948 को घास और मिट्टी उठाई थी.

इस पत्र में नाम्बियार ने लिखा है- "मुझे घटनास्थल से घास पर खून की एक बूंद मिली, जो सूख चुकी थी. मैं घास को काटा और वहाँ की मिट्टी भी उठा ली. वही पड़े एक हिंदी अखबार के पन्ने में मैंने इसे लपेट लिया."

भारत में गांधी जी से जुड़ी चीज़ों और विशेष रूप से उनकी खून में सनी मिट्टी की नीलामी को लेकर असंतोष जताया गया था.

महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी ने समाचार एजेंसियों से बातचीत में कहा कि वे किसी को नीलामी से तो रोक नहीं सकते, लेकिन महात्मा गांधी के खून की कुछ बूंदों वाली मिट्टी और घास की बात निंदनीय लगती है.

महात्मा गांधी फाउंडेशन नाम की एक संस्था चलाने वाले तुषार गांधी ने कहा, "वो पीढ़ी, जो ऐसी निशानियों को सम्मानपूर्वक रखती थी, अब नहीं रही. जिस पीढ़ी को ये चीजें उत्तराधिकार में मिली हैं, वो इसे एक व्यावसायिक नजरिए से देखती है."

उन्होंने कहा कि सरकार हमेशा ऐसी नीलामियों से अनजान रहती है और नीलामी के बाद उसकी नींद खुलती है.

मुलॉक्स ऑक्शन हाउस में ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के एक विशेषज्ञ रिचर्ड वेस्टवुड ब्रूक्स ने कहा कि गांधी जी की मृत्यु से जुड़ी निशानियों की नीलामी को अप्रिय कहना सही नहीं होगा.

उन्होंने कहा,"ये ऐसी चीज़ है जिसे इसको सहेजकर रखनेवाले लोगों ने पूरे आदर के साथ रखा हुआ था और ये कहीं से भी उन ईसाई संतों से जुड़ी स्मृतियों से ज़्यादा अप्रिय नहीं हैं जिनकी पूरी दुनिया के चर्चों और अन्य स्थलों पर पूजा की जाती है".

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