प्रजा कोर्ट में भी अगवा हिकाका पर फैसला नहीं

झीना हिकाका इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption झीना हिकाका सत्ताधारी बीजद के विधायक हैं

गुरुवार को माओवादियों की ओर से आयोजित 'प्रजा कोर्ट' में अपहृत विधायक झीना हिकाका की रिहाई के बारे में कोई फैसला नहीं हो पाया.

पता चला है क़ि इस पर निर्णय लेने के के लिए एक बार फिर 'प्रजा कोर्ट' बुलाया जाएगा. लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ये बैठक कब होगी.

बुधवार को माओवादियों ने अपने आखरी संदेश में कहा था कि उनकी मांगें पूरी करने के लिए सरकार को दी गई समयसीमा में अब कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी और विधायक की रिहाई के बारे में फैसला 'प्रजा कोर्ट' में होगा.

गुरुवार को कोरापुट जिले के नारायणपटना इलाके के घने जंगलों में माओवादियों के 'प्रजा कोर्ट' का आयोजन किया गया. सूत्रों के अनुसार विधायक झीना हिकका को 'प्रजा कोर्ट' के सामने पेश किया गया. कोर्ट में उनके बारे में फैसला क्यों नहीं हो पाया, यह अभी स्पष्ट नहीं है.

लेकिन माओवादियों और चासी मुलिया आदिवासी संघ के वकील निहार रंजन पटनायक ने कोरापुट से फोन पर बीबीसी को बताया कि माओवादी मुख्य रूप से दो बातों को लेकर अड़ गए हैं.

पहला चासी मुलिया आदिवासी संघ के 72 वर्षीय सलाहकार गणनाथ पात्र की रिहाई और दूसरा सरकार की घोषणा के अनुसार 13 कैदियों की रिहाई के लिए कानूनी प्रक्रिया की पहल.

गौरतलब ही कि बुधवार को माओवादियों की घोषणा के बाद सरकार ने उनकी एक प्रमुख मांग को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा था कि जिन 25 कैदियों की रिहाई क़ी घोषणा पहले ही की जा चुकी है, उनमें से 13 के खिलाफ मुकदमे वापस लिए जाएँगे.

लेकिन निहार रंजन पटनायक के अनुसार गुरुवार को सरकार की ओर से अदालत में मामले वापस लेने की अर्जी नहीं दी गई. पटनायक का कहना था, "मुझे लगता है कि यह मामला अब और खिंचेगा."

दूसरी ओर संघ के उप सलाहकार दंडपाणी मोहंती का कहना है कि प्रजा कोर्ट तीन या चार दिन तक भी चल सकता है.

फैसला

मोहंती ने बंधक बनाए गए दो इतालवी पर्यटकों के मामले में मध्यस्थता की थी. उन्होंने फ़ोन पर कहा, "प्रजा कोर्ट में विधायक के खिलाफ मुकदमा चलेगा. लोगों से राय ली जाएगी कि उन्होंने क्या अच्छा किया और क्या बुरा और इसके बाद ही कोई फैसला किया जाएगा."

माओवादियों की ओर से सरकार को दी गई समयसीमा बुधवार शाम समाप्त हो गई.

इसके चंद घंटों पहले माओवादियों की ओर से हिकाका की रिहाई के बारे में प्रजा कोर्ट में फैसला किए जाने की बात कही गई. लेकिन इसके बाद से माओवादियों ने चुप्पी साध रखी है. जिससे सरकार दुविधा में पड़ गई है.

वरिष्ठ अधिकारी मान रहे हैं कि माओवादियों की ओर से किसी सूचना की उम्मीद में सरकार लगातार मीडिया को मॉनिटर कर रही है और विधायक की रिहाई के बारे में सरकार पूरी तरह से अँधेरे में है.

विधायक का अपहरण करने वाले सीपीआई माओवादी की आंध्र ओडिशा बोर्डर कमेटी ने शुरू से ही यह स्पष्ट कर दिया था कि विधायक की रिहाई के बारे में सरकार से बातचीत के लिए कोई मध्यस्थ नियुक्त नहीं किया जाएगा.

माओवादियों ने कहा था कि उन्हें जो कुछ कहना है, वे मीडिया के जरिए कहेंगे और सरकार भी ऐसा ही करे.

संबंधित समाचार