छा सकते हैं ओलंपिक में भारतीय बॉक्सर

  • 22 अप्रैल 2012
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विजेंदर सिंह जब 2008 में बीजिंग ओलंपिक से कांस्य पदक लेकर लौटे तो कई भारतीयों को लगा कि ये कोई तुक्का था जो चल गया होगा.

उन्होंने कहा, शायद उनका दिन अच्छा रहा होगा, वरना, सचमुच क्या बॉक्सिंग में ओलंपिक मेडल मिल सकता है?

कुश्ती में मिल सकता है, शूटिंग में भी, मगर बॉक्सिंग?

इसके कुछ ही समय बाद, विजेंदर ने वर्ल्ड चैंपियशिप में भी कांस्य जीता और वे मिडलवेट कैटेगरी में दुनिया के पहले नंबर के मुक्केबाज बन गए.

इस दफा, भारतीयों ने उनके श्रेय को समझा. लेकिन साथ ही, ये भी कहा कि ये एक इकलौती प्रतिभा हो सकती है जो भारतीय मुक्केबाजी का चेहरा पलटने की कोशिश कर रही है.

पर अब अचानक, ओलंपिक से पहले लगी होड़ में, जबकि सूरमा भीड़ में अपनी जगह बना आगे निकलते हैं, कमज़ोर दूर छिटक जाते हैं, हमने देखा, कि सात, जी हाँ सात, भारतीय मुक्केबाज़ों ने लंदन ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई कर लिया है.

भारतीय बॉक्सिंग का स्तर ऊपर गया

चार साल पहले ये बात अकल्पनीय थी.

फिर भी, पिछले छह या सात सालों में, मैं देख रहा हूँ कि भारतीय बॉक्सिंग का स्तर ऊपर गया है.

इसके लिए एक योजना पर काम चल रहा था. स्थापित रोल मॉडल थे. पैसा आ रहा था. स्थिति बस बेहतर ही होनी थी.

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Image caption लंदन जानेवाले सात भारतीय मुक्केबाज़ों के दल में मनोज कुमार भी शामिल हैं

पर कितनी? इतनी? ना, मुझे लंदन के लिए इतना बड़ा दल जाने की उम्मीद नहीं थी.

हाँ, विजेंदर तो बिल्कुल जाते. मैं अखिल कुमार पर भी दाँव लगा रहा था, जो 2008 ओलंपिक के क्वार्टर फ़ाइनल तक गए थे, जिन्होंने वर्ल्ड सिरीज़ बॉक्सिंग के लिए अपना वजन बढ़ाकर गलती की जिसे वो क्वालिफाईंग मुकाबलों में अपने 57 किलोग्राम कैटेगरी स्पर्धा के लिए नहीं घटा सके.

मुझे विकास कृष्णन (60 किलो), शिव थापा (56 किलो) और देवेंद्रो सिंह (49 किलो) से भी उम्मीदें थीं और इन सबने क्वालिफाई किया.

पर अब इस दल में जय भगवान (60 किलो),मनोज कुमार (64 किलो) और सुमित सांगवान (81 किलो) भी हैं.

तो सात मुक्केबाज़ वहाँ होंगे, पहले के किसी भी मुकाबले से दो ज्यादा.

अहम बात ये है, कि मेरे हिसाब से, उनमें से कम-से-कम तीन – विकास, शिव और विजेंदर – पदक पाने के गंभीर दावेदार हैं.

और सच्चाई ये है कि, अमरीका या चीन या ऑस्ट्रेलिया से अलग, हमारे यहाँ इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि ओलंपिक पदक का रंग क्या है.

चलिए अब हैरानी और वाहवाही को प्रकट करने के बाद, मैं आपको बताएँ कि मुक्केबाज़ी का चेहरा कैसे बदला.

इसका एक विस्तृत विश्लेषण भी है, और एक संक्षिप्त, एक शब्द में समेटा जानेवाला विश्लेषण भी, वो है – हरियाणा.

भारतीय खेल तंत्र का ध्यान हरियाणा पर गया 2010 में, जब दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेलों में भारत पदक तालिका में दूसरे नंबर पर आया.

भारत के जीते पदकों में से 40 प्रतिशत पदक हरियाणा के एथलीटों ने दिलवाए.

इस उपलब्धि के पीछे की कहानी को समझना बिल्कुल आसान है – ये एक ऐसी समझ से संभव हुआ जिसने मूल कारण का निदान निकाला – गरीबी. बल्कि, नौकरियाँ.

भारत एक खेलों का देश नहीं हैं.

क्रिकेट? ज़रूर. मगर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसका मूल्य क्या है? या ओलंपिक में?

क्रिकेट से इतर, हमारे यहाँ संपन्न तबकों के युवा गोल्फ़, टेनिस, शूटिंग या शतरंज में हाथ आजमाते मिल जाएँगे.

इन खेलों के अलावा, युवा केवल एक कारण से खेलों की ओर आते हैं, इसे आप पैसा कह लें, या नौकरी, या सुरक्षा.

हरियाणा सरकार की नीति

तो ये वो कारण है जिससे कि हमारे यहाँ गरीब घरों के बच्चे ओलंपिक वाले खेलों की ओर जाते हैं. सरकारी प्रावधान ऐसे हैं कि यदि कोई युवा किसी खेल में ठीक-ठाक सफलता हासिल कर लेता है तो उसे रेलवे, पुलिस, सेना या किसी दूसरी जगह सरकारी नौकरी मिल सकती है.

एक अच्छे जीवन की चाहत के लिए ये कोई बुरा रास्ता नहीं. आपको इसके लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतना ज़रूरी नहीं, राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अच्छा खेलकर भी नौकरी मिल सकती है.

और जैसे ही नौकरी मिली, जो कि अक्सर मिल ही जाती है, पदक की भूख मिट जाती है. निगाह गौरव पर नहीं, दो जून की रोटी पर चली जाती है.

हरियाणा सरकार ने कुछ साल पहले एक नीति को अपनाया जिसमें ऐसे खिलाड़ियों को ना केवल सम्मानजनक नौकरी दी गई बल्कि उन्हें कई और प्रलोभन दिए गए ताकि वे और अच्छा खेलें और उन्हें हासिल करें.

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Image caption हरियाणा में मुक्केबाजी को लेकर युवाओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है

सरकार ने पदक जीतकर लौटनेवाले खिलाड़ियों के लिए बड़ी-बड़ी इनामी राशि देने की योजना बनाई.

हरियाणा पुलिस के प्रमुख आर एस दलाल भारतीय बॉक्सिंग फेडरेशन के प्रमुख थे जब वर्ष 2000 में हरियाणा के राजनेता अभय चौटाला ने इस खेल का भार अपने हाथ में लिया.

आर एस दलाल ने हाल ही में मुझे बताया कि कैसे हरियाणा की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के एक प्रतिनिधि ने सबसे पहले उनके सामने ये बात रखी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करनेवाला एक एथलीट बेहतर पद पाने का हकदार होना चाहिए, जैसे कि यदि वो हरियाणा पुलिस में कॉन्स्टेबल हो तो.

दलाल साहब ने कहा, बेशक. तो सब-इंस्पेक्टर ठीक रहेगा? नहीं-नहीं. हमें डीएसपी के रैंक से शुरू करना चाहिए.

और इसके साथ-साथ यदि कोई ओलंपिक या वर्ल्ड चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में पहुँचे तो उसे 25 लाख रूपए भी दिए जाएँ.

किसी राज्य में डीएसपी का पद एक बड़ा पद होता है. और विजेंदर डीएसपी हैं, जो वो बने 2008 में जीते अपने ओलंपिक कांस्य के कारण.

इसके पहले वो जयपुर में रेलव में टिकट चेकर थे. आज, वो टोयोटा इटियोस गाड़ी चलाते हैं, नाइकी के विज्ञापन करते हैं, अपने नामालूम से गाँव कलुवास में उन्होंने अपने परिवार के लिए हवेली जैसी बना दी है और वे स्वयं दिल्ली के पास गुड़गाँ में एक शानदार अपार्टमेंट में अपनी पत्नी के साथ रहते हैं.

सोने की संभावना

दूसरे, छोटे स्टार खिलाड़ियों की स्थिति भी अच्छी है. लगभग सभी के पास एक अच्छी नौकरी है. उनके लिए संदेश सीधा है – जाओ, कड़ी मेहनत करो, लड़ो, अच्छा करो. अगर तुम अच्छा करते हो, तो फिर तुम्हें भविष्य की चिंता की जरूरत नहीं.

हालातों और संयोगों के एक जटिल घालमेल के कारण अब बॉक्सिंगका संचालन बेहतर तरीके से और पेशेवर तरीके से हो रहा है.

हाँ, खेलों की टाँग खींचनेवाले चिर-परिचित वाद भी हैं, जैसे भाई-भतीजावाद आदि.

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Image caption मैरी कॉम बॉक्सिंग में अपने वर्ग की शानदार खिलाड़ी हैं और उनको हराना आसान नहीं

मगर साथ-साथ कुछ अच्छा काम भी हो रहा है. और ऐसा खास तौर पर हरियाणा में हो रहा है.

लंदन ओलंपिक के लिए चुने जानेवाले सात मुक्केबाजों में से पाँच हरियाणा के हैं.

मणिपुर के देवेंद्रो सिंह और असम के शिव थापा अपवाद हैं.

वैसे इस क्षेत्र में दो निजी संस्थाओं के प्रयासों को भी नहीं भूलना चाहिए – मित्तल चैंपियंस ट्रस्ट और ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट.

ये दो संस्थाएँ पैसा ला रही हैं, एथलीटों को चुन रही हैं और उन्हें वित्तीय मदद दे रही हैं.

खेलों के मूलभूत ढांचे के लिए भी वे योगदान कर रही हैं, खेल प्रशासकों से जो नहीं हो पा रहा, उसकी भरपाई में वे मदद कर रही हैं.

इस साल, भारत सोना हासिल कर सकता है, कठिन काम है, मगर असंभव नहीं. ये सोचने में कोई हर्ज नहीं कि भारतीय बॉक्सर लंदन ओलंपिक में तीन पदक जीत सकते हैं.

और अभी तक हमने महिलाओं की तो बात ही नहीं की. एम सी मैरीक कॉम (51किलो). सरिता देवी (60किलो).

क्या उनके इस पहले ओलंपिक में कोई उन्हें पछाड़ सकता है? लगता नहीं.

सोचिए कि इन पदकों को हासिल करने की ललक का तब क्या मतलब होगा.

और याद रहे, ओलंपिक में अब तक भारत का अभी तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन बस तीन पदकों का रहा है – 2008 ओलंपिक में एक स्वर्ण और दो कांस्य.

अगस्त 2012 में मुक्केबाज – पुरूष और महिला मिलकर – अकेले इन आँकड़ों को बदल सकते हैं.

(शौम्य दासगुप्ता विसडेन इंडिया में सीनियर एडिटर हैं. हार्पर कॉलिन्स इंडिया से प्रकाशित होनेवाली उनकी किताब भिवानी जंक्शन – द इनसाइड स्टोरी ऑफ़ बॉक्सिंग इन इंडिया इस साल जून में बाजार में आएगी)

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