हमने अपने सूत्र को जोखिम में नहीं डालाः एन राम

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Image caption एन राम का कहना है कि उन्होंने इस मामले से जुड़े दस्तावेजों को पूरी जांच पड़ताल के बाद ही प्रकाशित किया

बोफोर्स मामले में स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रोम के रहस्योद्घाटन से एक फिर भारत में राजनीति गरमा गई है. लिंडस्ट्रोम ने बोफोर्स कांड में राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन को तो क्लीन चिट दी है लेकिन 'हिंदू' अखबार पर सवाल उठाए.

लिंडस्ट्रोम का आरोप है कि 'हिंदू' ने इस मामले से जुड़ी जानकारी को अपनी सुविधा के हिसाब से प्रकाशित किया और अपने सूत्र की सुरक्षा और निजता का ख्याल नहीं रखा गया.

लेकिन एन राम का कहना है कि यह सही नहीं है कि उन्होंने अपने सूत्र की गरिमा को बनाए नहीं रखा और उसे किसी तरह जोखिम में डाला.

पेश है 'हिंदू' के संपादक रहे एन राम के साथ इस मुद्दे पर बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी की बातचीतः

लिंडस्ट्रोम के रहस्योद्धाटन और आपके अखबार पर लगाए गए आरोप पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

सबसे पहली बात तो यह है कि मैं पुराने चलन के मुताबिक अपने सूत्र को जाहिर नहीं करूंगा. इसलिए मैं न तो पुष्टि करूंगा और न ही इससे इनकार करूंगा कि हमारा सूत्र कौन था.

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Image caption बोफोर्स का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकल आया है

यह पहला मौका नहीं है जब लिंस्ड्रोम ने यह बात कही है. मैं कहूंगा कि इस मामले में सूत्र भले ही कोई हो, लेकिन पैसे का कोई लेन देन नहीं हुआ है. उसने नैतिक रोष के चलते यह जानकारी दी. जहां तक यह बात है हमने इसे मर्जी के मुताबिक छाप दिया और इस मामले में जोखिम का ख्याल नहीं रखा गया तो यह सही नहीं है. मैं साफ कर देना चाहता हूं कि हमारे पास इस मुद्दे पर बहुत से आंतरिक सबूत थे. डेढ़ साल तक हमने छानबीन की.

हम लगभग तीन सौ से ज्यादा दस्तावेजों के बारे में बात कर रहे हैं. इनमें से सभी नहीं लेकिन ज्यादातर हिंदू में प्रकाशित हुए. इसके लिए हमने अपने सूत्र से बात की ताकि उसकी सुरक्षा की जा सके. इन दस्तावेजों की पुष्टि के लिए कुछ जानकारी की जरूरत थी, खास कर हाथ से लिखी डायरी के लिए, क्योंकि हमें पता चला कि उसकी मूल प्रति पुलिस ने उस वक्त बोफोर्स के प्रमुख मार्टिन आर्डबो को लौटा दी थी. पुलिस के पास जो था वह उसकी फोटोकॉपी थी. इसलिए हमें बहुत ही सावधानी से काम लेना पड़ा. उनमें कई जगह कोड शब्दों का इस्तेमाल किया हुआ था. लोगों के लिए शायद राजीव गांधी के लिए नाम के शुरुआती अक्षर लिखे हुए थे. सबसे पहले तो हमें लिखावट की पुष्टि करनी पड़ी कि वह असली तो है ना. हमारे पास आर्डबो के हस्ताक्षर के नमूने भी थे. तो कुल मिलाकर यह बहुत मुश्किल काम था.

तो हम पागल नहीं हैं कि ऐसे विस्फोटक दस्तावेजों के ढेर पर बैठकर उस व्यक्ति को खतरे में डालते जिसके आधार पर हम स्टोरी चला रहे हैं. सूत्र यह जानकारी किसी को भी दे सकता था. इसीलिए हमने तो पत्रकारिता के उच्च मानदंड़ों का पालन किया. मुझे लगता है कि सूत्र ने खुद कुछ जोखिम उठाया.

बेशक आप अपने सूत्र की पहचान को जाहिर नहीं करना चाहते, लेकिन लिंडस्ट्रोम ने साफ साफ कहा है कि उन्हें और उनके परिवार को जो कुछ भुगतना पड़ा, हिंदू ने इससे कोई मतलब नहीं रखा. तो वह आपके अखबार का सीधे सीधे नाम ले रहे हैं.

मैं यह सब जानता हूं. लिंडस्ट्रोम पर जानकारी लीक करने के आरोप लगे लेकिन उन्हें इनसे बरी कर दिया गया.

जब मैं राजीव गांधी, केसी पंत और उस वक्त के सीबीआई के निदेशक मोहन कात्रे से मिला, तो किसी ने नहीं पूछा कि हमारा सूत्र कौन है. लेकिन ये बात मेरे दिमाग में थी कि उन्हें इस बारे में संदेह है. सिर्फ संस्थान के लोग ही जानना चाहते थे कि सूत्र कौन है. बेशक चित्रा सुब्रहमण्यम यह जानती थीं.

लेकिन यह रिटायर्ड अधिकारी कह रहा है कि जब अखबार सोचते हैं कि वे खबर से ज्यादा अहम है तो पत्रकारिता को उसका खमियाजा भुगतना पड़ता है. आप जाने माने संपादक हैं. अगर कोई इस तरह के आरोप लगाता है तो इस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है.

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Image caption पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लिंडस्ट्रोम ने क्लीन चिट दी है

देखिए लिंडस्ट्रोम या किसी और से मेरा कोई झगड़ा नहीं है. लेकिन यह सही नहीं है कि हमने अपने सूत्र की गरिमा को बनाए नहीं रखा और उसे किसी तरह जोखिम में डाला. ऐसा भी नहीं है कि हमने जानकारी को दबाए रखा हो. कुछ कानूनी पेंच हो तो और बात है. मसलन सबूतों की पड़ताल करना, उनकी पुष्टि करना. राजीव गांधी जैसे लोगों के खिलाफ आरोप लगाना बहुत ही जटिल होता है. इस मामले में अमिताभ बच्चन का भी नाम आया लेकिन उनके खिलाफ हमारे पास कुछ नहीं है.

सबूतों की छानबीन में हमें डेढ़ साल का वक्त लगा. पता नहीं लिंडस्ट्रोम कैसे ऐसा कह रहे हैं कि जैसा हमें अच्छा लगा हमने वैसे प्रकाशित किया.

लेकिन जिस रिपोर्टर यानी चित्रा सुब्रमण्यम की खबर आपने छापी थी, उन्हीं को अब लिंडस्ट्रोम ने इंटरव्यू दिया है.

लेकिन वो अब हमारे लिए काम नहीं करती हैं.

लेकिन जब लिंडस्ट्रोम यह कहना चाह रहे थे कि हिंदू ने उनकी सुरक्षा और निजता का ख्याल नहीं रखा तो उस वक्त चित्रा सुब्रहमण्यम ने इस बात से इनकार नहीं किया.

जब यह मामला उजागर हुआ तो उस वक्त चित्रा हमारे लिए काम करती थी और स्ट्रिंगर थीं. बाद में वह हमारे स्टाफ में भी रहीं लेकिन अब वह हमारे साथ काम नहीं करती हैं. इसीलिए मैं उनकी तरफ से नहीं बोल सकता हूं.

लेकिन बात यह है कि ऐसा हमने कुछ नहीं किया जिससे सूत्र जोखिम में पड़े. जोखिम जानकारी को लीक करना था. किसी ने वह सामग्री देने के लिए सूत्र पर दबाव नहीं डाला था. कोई पैसे का लेन-देन नहीं हुआ. उसने सिर्फ नैतिक रोष के चलते यह जानकारी बांटी. ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि हमारी वजह से सूत्र जोखिम में पड़ा.

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