माओवादियों के गढ़ से 'सुकमा लाइव'

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Image caption पत्रकारों का कहना है कि सुकमा की सड़कों पर रात दिन खड़े रहकर उन्हें 'पीपली लाइव' नामक फिल्म का वास्तविक अनुभव हुआ. (तस्वीर: सतीश माहेश्वरी)

शाम ढलते ही सुकमा की सड़कों पर सन्नाटा पसरने लगा है. छत्तीसगढ़ को आंध्र प्रदेश से जोड़ने वाले राष्ट्रीय उच्च मार्ग 33 पर गाड़ियों का आना जाना कम होता जा रहा है.

अंधेरे में जंगल से घिरे हुए इस कस्बे में एक अजीब से दहशत का माहौल है. लोग अपने घरों में सिमटते जा रहे हैं. सड़कें वीरान होती जा रहीं हैं और जंगल से आने वाली आवाजें रात की खामोशी को चीरती चली जा रही है.

वहीं सुकमा से लगे हुए जंगलों में कहीं सुदूर इलाके में यहाँ के अगवा कलेक्टर माओवादियों की गिरफ्त में हैं.

खबरें आ रहीं हैं कि दोरनापाल से ताड़मेटला के रास्ते में माओवादियों नें कड़ा पहरा बैठा रखा है और वह इस इलाके में किसी को आने नहीं दे रहे हैं. कई पत्रकारों नें मुझे बताया कि हथियार बंद माओवादी चिंतलनार से ताड़मेटला जाने वाले हर व्यक्ति को रोक कर बैरंग वापस लौटा रहे हैं.

न्यूज़ एक्स और आईबीएन -7 के पत्रकारों के अलावा कुछ स्थानीय पत्रकारों की रोक कर तलाशी ली गयी और उन्हें ताड़मेटला नहीं जाने की कड़ी हिदायत दी गयी.

यही वह इलाका है जहाँ माओवादियों नें अपने मध्यस्थ बीडी शर्मा और प्रोफेसर हरगोपाल को बुलाया है.

दोनों मध्यस्त शनिवार की सुबह चिंतलनार पहुंचे जहाँ से वो मीडियाकर्मियों की बाइक पर सवार होकर ताड़मेटला पहुंचे. 'बस यहीं तक', एके -47 टाँगे एक माओवादी नें पत्रकारों से कहा.

पुलिस नदारद

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Image caption छत्तीसगढ़ के कलेक्टर ऐलेक्स पॉल मेनन को 21 अप्रैल को अगुवा किया गया था.

दूसरा माओवादी पत्रकारों के लिए पानी का गैलन लेकर आया. चिंतलनार से ताड़मेटला महज आठ किलोमीटर की दूरी पर है. चिंतलनार में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का कैंप है.

कुछ ही दूरी पर माओवादी छापामारों की फौज वार्ताकारों का इंतजार कर रही थी. जैसे ही बाइक पर सवार वार्ताकारों को लेकर मीडिया के लोग ताड़मेटला पहुंचे, माओवादियों नें वार्ताकारों को अपने साथ ले लिया.

पहली बार इतनी बड़ी संख्या में हथियारबंद छापामारों की मौजूदगी का अहसास हुआ.

माओवादियों की शर्तों के बाद सुरक्षा बलों को उनके बैरकों में वापस बुला लिया गया है. जगदलपुर से सुकमा तक के सफर में कहीं किसी वर्दीधारी पुलिसवाले की एक झलक भी नहीं मिल पायी.

इस बीच खबर मिली कि माओवादियों ने दोरनापाल के पास पर्चे फेंक कर 29 और 30 अप्रैल को बंद का आहवान किया है. पर्चों की विश्वसनीयता स्थापित नहीं की जा सकी मगर तुरंत इसका असर सड़क पर लोगों के आवागमन पर देखा गया जो नदारद थे.

इस दहशत के माहौल में जहाँ अगवा कलेक्टर को रिहा कराने की कोशिशें हो रहीं हैं और माओवादी अपने साथियों की रिहाई के साथ साथ कुछ निर्दोष ग्रामीणों की रिहाई की मांग को लेकर अपने वार्ताकारों के साथ गंभीर चर्चा में लगे हुए हैं.

मीडिया की आपाधापी

Image caption 'पीपली लाइव' फिल्म में एक छोटे से गांव में मीडिया की अचानक बनी रुचि दर्शाई गई थी.

वहीं मीडिया के लिए सुकमा में जो कुछ हो रहा है वह सुर्खियाँ बटोरने वाला है.

ब्रेकिंग न्यूज के लिए चल रही टीआरपी की टक्कर की वजह से टेलिविजन चैनलों की ओबी वैनों की कतार लगी हुई है.

पत्रकार कलेक्टर एलक्स पॉल मेनन के घर के सामने रात दिन डेरा डाले हुए हैं ताकि कोई खबर उनके कैमरों से बच ना पाए. छोटी सी अफवाह पर पत्रकारों और कैमरामेन का हुजूम जंगल की तरफ दौड़ पड़ता है. कहीं ब्रेकिंग न्यूज़ छूट ना जाए.

'ई टीवी' के विनोद कुशवाहा और 'जी टीवी' के दीपक यादव नें बताया कि पिछले एक हफ्ते से सुकमा की सड़कों पर रात दिन खड़े रहकर उन्हें 'पीपली लाइव' नामक फिल्म का वास्तविक अनुभव हुआ.

गर्मी की चिलचिलाती धुप हो या शाम की उमस और फिर आंधी या तूफान, मीडियाकर्मियों के लिए यहाँ बने रहना मजबूरी है.

सुकमा छोटा सा कस्बा है. नया जिला बना है इसलिए यहाँ बुनियादी सुविधाओं का आभाव है.

नक्सली हिंसा का केंद्र होने की वजह से न यहाँ कोई ठहरने की जगह है ना ही सही खाने की. ऐसे में मीडिया के लोग बस किसी तरह काम चला रहे हैं.

सुकमा के अनुमंडल अधिकारी एसपी वैद का कहना था कि सौ से ज्यादा पत्रकारों के आ जाने के बाद उन्हें सरकारी स्कूल के छात्रावासों और सरकारी भवनों में मीडिया वालों के रहने का इंतजाम करना पड़ा.

सारे आभाव के बावजूद खबरों की रेस ने सभी को मैदान में डटे रहने को मजबूर कर दिया.

कोई अगर जंगल की तरफ जाता तो उसके पीछे सब दौड़ पड़ते. सुबह की ब्रेकिंग स्टोरी दोपहर तक सस्पेंस में बदल जाती और शाम तक मायूसी में. आखिर यह "सुकमा लाइव" जो है.

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