भारतीय अर्थव्यवस्था की पांच समस्याएं

निम्न विकास, ज्यादा मुद्रास्फीति

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Image caption विनिर्माण क्षेत्र में महज 3.9 फीसदी की दर से बढ़ोतरी होने का अनुमान है.

कई सरकारी अनुमानों के बाद कि भारतीय अर्थव्यवस्था 7-8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ेगी, वित्त मंत्री ने 2012 के बजट भाषण में आखिरकार ये स्वीकार कर लिया है कि विकास दर 6.9 फीसदी रहेगी. हालांकि वास्तविक आंकड़ा 6.5 फीसदी ही रहने का अनुमान है.

इसकी वजह है चीनी के उत्पादन आंकड़ों में हुई सांख्यिकीय गलती जिसने जनवरी महीने की औद्योगिक विकास दर को 6.8 फीसदी से घटाकर 1.1 फीसदी पर ला दिया.

रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर ने वर्ष 2012-2013 के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर का आकलन 5 फीसदी या उससे कुछ ऊपर रखा है जबकि भारतीय अर्थशास्त्रियों का कहना है कि विकास दर का आंकड़ा यदि 4 फीसदी भी रहता है तो उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा.

एक कारोबारी संगठन के वरिष्ठ अर्थशास्त्री का कहना है, ''अगर नीतिगत फैसले, निवेश और मौजूदा संकेतक इसी तरह बने रहे तो मेरा मानना है कि आर्थिक विकास दर 3 फीसदी भी हो सकती है.''

इसके साथ ही थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति भी चिंता का कारण हो सकती है जो कि अभी सात फीसदी से नीचे है लेकिन हालात नहीं सुधरे तो अगले कुछ महीनों में ये 9-10 फीसदी तक हो सकती है.

खाद्य मुद्रास्फीति अभी भी दहाई आंकड़ों में बनी हुई है और निकट भविष्य में पेट्रोल, डीजल के दाम में बढ़ोतरी से इसके और बढ़ने की संभावना है. निम्न विकास दर के साथ ज्यादा मुद्रास्फीति का बने रहना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गहन चिंता का विषय बन सकता है.

राजकोषीय और व्यापार घाटे में बढ़ोतरी

2011-12 के वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 4.6 फीसदी से बढ़कर 5.9 फीसदी हो गया.

हालांकि 2012 के बजट में ये अनुमान लगाया गया है कि 2012-13 में ये घाटा कम होकर 5.1 फीसदी तक हो जाएगा, लेकिन कई अर्थशास्त्री इससे इत्तेफाक नहीं रखते. धीमी विकास दर, सरकारी राजस्व में अनुमान से कम बढ़ोतरी और खर्च में अनुमान से ज्यादा बढ़ोतरी चिंता का विषय है.

खासतौर से ग्रामीण रोज़गार के लिए चलाई जानेवाली कल्याण योजनाओं पर किया जानेवाला खर्च और भोजन के अधिकार की बाध्यता की वजह से राजकोषीय घाटा 2012-13 में और बढ़ेगा जैसाकि पिछले वित्त वर्ष में देखने को मिला है.

2011-12 में निर्यात में 20 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई लेकिन आयात में और ज्यादा वृद्धि देखने को मिली.

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Image caption काम के लिए रोज़गार कार्यक्रम भारत की बड़ी कल्याण योजनाओं में से एक है.

नतीजा ये हुआ कि व्यापार घाटा बढ़कर 185 अरब डॉलर तक जा पहुंचा जो कि देश के आज तक के इतिहास में अधिकतम है.

अगस्त 2011 के बाद से व्यापार घाटे में बढ़ोतरी और विदेशी मुद्राओं के देश से बाहर जाने की वजह से विदेशी मुद्रा भंडार 322 अरब डॉलर से घटकर 293 अरब डॉलर पर जा पहुंचा.

नीतिगत पंगुता और विलंबित सुधार

गठबंधन की मजबूरियों, एकजुट विपक्षी राजनीतिक गतिविधियों और भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से यूपीए सरकार को कई अहम आर्थिक सुधारों से हाथ पीछे खींचने पड़े हैं जिसमें मल्टी ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मुद्दा भी शामिल है. .

वित्त मंत्रालय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कौशिक बासु ने हाल ही में अमरीका में एक बयान दिया कि 2014 के आम चुनावों से पहले सरकार आर्थिक सुधारों की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती.

हालांकि बाद में उन्होंने इसका ये कहते हुए खंडन कर दिया कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है.

बहरहाल, भारत के औद्योगिक संगठन, राजनीतिक दल और अर्थशास्त्री इस बात को लेकर एकमत नजर आते हैं कि यूपीए सरकार केवल वैसे ही आर्थिक सुधार लागू करेगी जो उसके राजनीतिक सहयोगियों को स्वीकार्य होगा.

रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर के आकलन में ये कहा गया है कि सरकार यदि पेट्रोलियम पदार्थों के खुदरा मूल्य में बढ़ोतरी कर दे, वादे के मुताबिक ऊर्जा सब्सिडी घटा दे और वस्तु एवं सेवा कर लागू कर दे तो आर्थिक हालात बेहतर हो सकते हैं.

निवेश का नकारात्मक माहौल

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Image caption केंद्रीय बैंक का कहना है कि आर्थिक हालात में जल्द सुधार की संभावना नज़र नहीं आती.

वित्त वर्ष 2011-12 में घरेलू निजी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर किए जाने वाले संभावित निवेश को लेकर चिंता थी.

कई कंपनियों ने नई फैक्ट्रियों को स्थापित करने या पुराने के विस्तार में निवेश करने के कार्यक्रम में या तो देरी कर दी थी या उसे आगे बढ़ा दिया था.

अप्रैल 2012 में रिजर्ब बैंक ने अपने आकलन में कहा कि उद्योगों और बैंकों से की गई बातचीत से ये लगता है कि नई परियोजनाओं में निवेश की रफ्तार धीमी ही रहेगी.

केंद्रीय बैंक ने आर्थिक विकास के बारे में ये निष्कर्ष दिया कि इसमें बढ़ोतरी होने की संभावना नज़र नहीं आती क्योंकि निवेश का माहौल निराशाजनक है, नए निवेश नहीं हो रहे जिससे अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने रफ्तार भी धीमी ही रहेगी.

2011-12 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उत्साहवर्धक था, लेकिन ये चिंता भी बनी हुई थी कि 2012 के बजट में कर संबंधी लचीले नियमों वाले मौरिशस जैसे देशों के ज़रिए निवेश करने वाले व्यक्तियों और कंपनियों पर अतीतलक्षी कराधान नीति से विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है.

हाल ही में ब्रिटेन के वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबर्न ने ये मुद्दा भारतीय वित्र मंत्री के साथ बातचीत में उठाया था.

इससे पहले ब्रिटिश उद्योग परिसंघ और अंतरराष्ट्रीय कारोबार के अमरीकी परिषद जैसे वैश्विक कारोबारी संगठनों ने संयुक्त रूप से एक चिट्ठी भारतीय प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को लिखी थी जिसमें कहा गया था कि अगर कानून में बदलाव किया जाता है तो उसे अतीतलक्षी तरीके से लागू नहीं किया जाना चाहिए.

पिछले दो सालों में ऊंचे ब्याज दरों की वजह से कॉरपोरेट जगत ने बैंकों से कर्ज लेने के प्रति उत्साह नहीं दिखाया और शहरी उपभोक्ताओं ने भी कार, घर और दूसरी खरीद को टालना पड़ा.

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