किसका पलड़ा भारी?

  • 2 मई 2012
Image caption राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर अबतक सहमति नबीं बनी है.

भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का पांच साल का कार्यकाल जुलाई में खत्म हो रहा है, लेकिन इस पद के अगले उम्मीदवार पर राजनीतिक पार्टियों में सहमति नहीं बन पा रही.

यूपीए की तरफ से उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के नाम पर चर्चा है तो एनडीए पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को दोबारा राष्ट्रपति बनाना चाहता है.

लेकिन एनडीए के घटक दल जेडीयू का कहना है कि बीजेपी के उम्मीदवार पर वो आंख मूंद कर अपनी मुहर नहीं लगाएगा.

समाजवादी पार्टी अलग मुस्लिम उम्मीदवार का राग अलाप रही है. जबकि वामपंथी पार्टियां हामिद अंसारी के पक्ष में हैं लेकिन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के नाम पर भी पार्टी में चर्चा चल रही है.

स्पष्ट बहुमत किसी के पास नहीं है और ई श्रीधरन, अमर्त्य सेन जैसे कुछ गैर राजनीतिक उम्मीदवारों के नाम पर भी चर्चा का बाजार गर्म है.

इस राजनीतिक खींचतान के बारे में 'द टेलिग्राफ' के पत्रकार संकर्षण ठाकुर कहते हैं कि ''चुनाव में अभी कुछ वक्त है और ये खींचतान और सौदेबाजी अभी चलेगी क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी ही नहीं बल्कि यूपीए और एनडीए के घटक दल भी हो सकता है कि अपने गंठबंधन के बड़े दलों के खिलाफ चले जाएं. ये खींचतान बड़ी दिलचस्प है और अभी चलेगी.''

क्यों खींचतान?

पहले के राष्ट्रपति चुनावों में किसी एक उम्मीदवार पर आम सहमति बन जाती थी लेकिन पिछले चुनाव से सत्ताधारी गठबंधन और विपक्षी दलों के बीच टकराव देखने को मिली है.

2007 में कांग्रेस ने प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को अपना उम्मीदवार बनाया था जिसका बहुजन समाज पार्टी और डीएमके ने भी समर्थन किया था.

दूसरे उम्मीदवार थे भैरों सिंह शेखावत जिन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन किया था.

एनडीए ने अनाधिकारिक रूप से उनका समर्थन किया था.

गठबंधन राजनीति

इस बार भी हालात 2007 के चुनाव जैसे ही हैं. अभी तक कांग्रेस ने औपचारिक तौर पर अपने उम्मीदवार का एलान नहीं किया है और एनडीए में भी एक मत उभरकर नहीं आ रहा. ऐसे में क्षेत्रीय दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो जाता है.

संकर्षण ठाकुर कहते हैं, ''आजकल की जो राजनीति है जिसमें किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं है, न तो संसद के दोनों सदनों में और न दोनों राज्यों में, जैसी कि कांग्रेस की पहले स्थिति हुआ करती थी. ऐसे हालात में जहां राजनीति बंटी हुई हो, ऐसा होना लाजमी है.''

वस्तुस्थिति यह है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही अपना राष्ट्रपति बनाने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं.

संकर्षण ठाकुर इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि,''कहीं न कहीं अगले लोकसभा चुनाव में अगर त्रिशंकु लोकसभा बनती है तो राष्ट्रपति की भूमिका अहम हो सकती है. इसलिए दोनों दल चाहेंगे कि राष्ट्रपति ऐसा हो जो या तो उनकी बात माने या फिर निष्पक्ष रहे. ऐसा उम्मीदवार दोनों ही घटकों में कौन है और उसपर सहमति बनेगी या नहीं इस पर मुझे संदेह है. लेकिन ये बात तय है कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होगा और मुकाबला जोरदार रहेगा.''

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