जब कश्मीरी दुकानदार के पुत्र ने अफसर बनने की ठानी..

  • 7 मई 2012
कश्मीर आईएएस बशीर
Image caption बशीर अहमद बट्ट पिता की निःस्वार्थ सेवा को अपना प्रेरणा स्रोत बताते हैं.

पिता को किराने की छोटी सी दुकान में दिन-रात मेहनत करते देखकर बशीर अहमद बट्ट सोचते थे कि वो 'कुछ ऐसा करेंगे जो सबसे बेहतर होगा, वो उस करियर को चुनेंगे जो मौजूदा वक्त का सबसे उमदा होगा, उन्हें वो करना है जो सबसे अच्छा है.'

बशीर अहमद बट्ट इस साल भारतीय प्रशासनिक सेवा के इम्तिहान में भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर से सफल होने वाले नौ सौ से अधिक परीक्षार्थियों में से एक हैं.

दो साल पहले भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के शाह फैसल के इसी इम्तिहान में पूरे भारत में अव्वल आने के बाद वहाँ के अनेक युवा इस इम्तिहान में बैठ रहे हैं और सफलता भी हासिल कर रहे हैं.

पिछले साल, खबरों के मुताबिक, वहाँ के नौ लोगों ने प्रशासनिक सेवा में कामयाबी हासिल की थी, जो 2010 की तुलना में काफी अधिक थी जबकि सिर्फ चार युवाओं ने इस मुश्किल परीक्षा में कामयाबी पाई थी.

परिवार में सरकारी नौकरी करने वाले पहले व्यक्ति

भारत प्रशासित कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर निवासी बशीर अपने परिवार में सरकारी नौकरी में जाने वाले पहले व्यक्ति हैं.

हालाँकि इस बात से उनके निश्चय में कोई कमजोरी नहीं आई बल्कि पिछले साल वो राज्य प्रशासनिक सेवा के लिए भी चुने गए.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "दरअसल राज्य और भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा देने का सिलसिला साथ-साथ चल रहा था. जिस वक्त मैं राज्य सेवा के लिए चुना गया उस समय भारतीय प्रशासनिक सेवा के इम्तिहान के एक हिस्से का रिजल्ट आ चुका था."

फोन पर आईएएस के लिए चुने जाने के लिए मुबारकबाद देने पर बशीर अहमद बट्ट हमें रोकते हुए कहते हैं, "मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि मेरा जो रैंक है उसमें शायद मुझे आईएएस की बजाए कोई दूसरी सेवा में शामिल होना होगा."

पेशे से जानवरों के डाक्टर बशीर अहमद बट्ट कहते हैं कि वो अगले साल फिर से परीक्षा में शामिल हो सकते हैं ताकि उनका रैंक बेहतर हो सके.

Image caption कश्मीर में युवाओं ने दो साल पहले खासा असंतोष था और भारत विरोधी गतिविधियों के अनेक मामले दर्ज किए गए थे

बशीर के छोटे भाई जो दिल्ली स्थित जवाहर लाल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में एमएम की पढ़ाई कर रहे हैं जबकि उनकी छोटी बहन श्रीनगर में कानून में स्नातक कर रही हैं.

शाह फैसल बने प्रेरणा, मुख्यधारा की चर्चा

इस बार की परीक्षा में चुने गए 28-साल के काजी सलमान ने शाह फैसल को अपनी प्रेरणा बताया है.

काजी सलमान हांडवारा के मगम क्षेत्र के हैं और फिलहाल जम्मू-कश्मीर बैंक में कार्यरत थे.

भारत में इस खबर को कश्मीरियों के मुख्यधारा का हिस्सा बनने के तौर पर भी देखा जा रहा है. राजधानी दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अंग्रेजी और हिंदी समाचारपत्रों ने इसे प्रमुखता से जगह दी है.

दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 'द टाईम्स ऑफ इंडिया' ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में उत्तीर्ण होनेवाली घाटी की एक महिला शेहरीश असगर की तस्वीर के शीर्षक में लिखा है - ब्यूटीफुल माइंड.

द हिंदू का कहना है कि सूबे के युवा अब पत्थरबाजी, सुरक्षाबलों से मारपीट की बजाए सकारात्मक कारणो से सुर्खियों में हैं.

हालांकि अंग्रेजी अखबार 'द ट्रिब्यून' में छपे लेख में आईएएस टॉपर शाह फैसल इन सभी नजरियों को गलत बताते हैं.

शाह फैसल कहते हैं, "पिछले 20 सालों के दौरान सूबे के युवा अपना ध्यान मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे करियर पर केंद्रित कर रहे थे इसलिए राज्य से संबंध रखनेवाले आईएएस की तादाद कम थी. पूरानी मान्यताओं में बदलाव के चलते वो छात्र जिन्होंने मेडिकल और इंजीनिरिंग की डिग्री ले रखी है अब प्रशासनिक सेवा की ओर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं."

शाह फैसल इस बात को भी सही नहीं बताते की राज्य में मौजूद शांति इसकी वजह है और कहते हैं कि विरोध और प्रदर्शनों के दौर में भी घाटी के छात्रो का प्रदर्शन नौंवी-दसवीं, मेडिकल और इंजीनियरिंग के इम्तिहानों में काफी अच्छा रहा है.

बशीर अहमद बट्ट भी कहते हैं कि घाटी के हिस्से में शांति को आप कुछ हद तक ही इसके लिए जिम्मेदार बता सकते हैं, 'क्योंकि कश्मीर में लोगों के अंदर जानकारी की कमी थी इसलिए वो इस करियर की तरफ ध्यान नहीं दे रहे थे. मगर हालात में पिछले कुछ सालों में बदलाव आया है.'

संबंधित समाचार