पश्चिम बंगाल में पुरोहित मांग रहे हैं भत्ता

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Image caption ममता बनर्जी ने इमामों को भत्ता देने की घोषणा की थी

पश्चिम बंगाल में अब हिंदू पुरोहित भी सरकार से अपने लिए भत्ता मांग रहे हैं. दरअसल, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों को ध्यान में रखते हुए अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए पिछले दिनों राज्य के लगभग 30 हजार इमामों को 2500 रुपए महीने भत्ता देने का ऐलान किया था.

उनकी इस घोषणा से विवाद पैदा हो गया है. पहले ही भारी कर्ज के बोझ से जूझ रही राज्य सरकार पर मुख्यमंत्री के इस ताजा फैसले से हर महीने करीब 90 करोड़ रुपए का बोझ बढ़ जाएगा.

जहां विभिन्न राजनीतिक दल और अल्पसंख्यक संगठन राज्य की आर्थिक बदहाली के बावजूद इन इमामों को भत्ता देने के फैसले की आलोचना कर रहे हैं, वहीं अब पुरोहितों के संगठन ने भी अपने सदस्यों के लिए भत्ते की मांग उठाई है.

अपनी मांग के समर्थन में इन पुरोहितों ने कोलकाता में एक विशाल रैली भी की है. अल्पसंख्यक संगठनों का कहना है कि सरकार की यह कवायद मस्जिदों को नियंत्रण में रखने की उसकी मंशा का संकेत है.

विश्व हिंदू परिषद ने तो सरकार के इस फैसले के खिलाफ और बाकी धर्मों के पुरोहितों और पुजारियों को भी भत्ता देने की मांग में अभियान चलाने का ऐलान किया है.

'पुरोहितों का क्या कसूर'

परिषद के महासचिव प्रवीण तोगड़िया कहते हैं, "ममता बनर्जी को अल्पसंख्यकों को खुश करने की राजनीति बंद कर देनी चाहिए. अगर इमामों को भत्ता मिल सकता है तो पुरोहितों ने क्या कसूर किया है? उनको भी भत्ता मिलना चाहिए."

राज्य में अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नेता और कभी ममता के करीबी रहे मौलाना सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने सरकार के फैसले की आलोचना की है.

वे कहते हैं, "अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों से पहले अल्पसंख्यकों को लुभाने के मकसद से ही सरकार ने यह फैसला किया है."

उनका आरोप है कि सरकार इमामों को भत्ता देने का ऐलान कर अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने के मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाना चाहती है.

सिद्दीकुल्लाह चौधरी का कहना है कि सरकार को इमामों को भत्ता देने की बजाय सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की व्यवस्था करनी चाहिए.

जमात-ए-इस्लामी हिंद के प्रदेश अध्यक्ष मोहम्मद नुरूद्दीन कहते हैं, "किसी धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसा भत्ता ठीक नहीं है. इसके बाद तमाम धर्मों के लोग यही मांग उठाएंगे."

मांग

Image caption पुरोहितों ने कोलकाता में एक बड़ी रैली निकाली

दूसरी ओर, पुरोहितों के संगठन निखिल बंग संस्कृत सेवी समिति ने अब अपने सदस्यों के लिए भी भत्ते की मांग उठाई है. समिति के नेता शिशधर गांगुली सवाल करते हैं कि अगर सरकार इमामों को भत्ता दे सकती है तो हमें क्यों नहीं? आखिर इस भेदभाव की वजह क्या है?

समिति का आरोप है कि सरकार का यह फैसला राजनीतिक है. अपने लिए भत्ता मांग रहे पुरोहितों ने पिछले दिनों कोलकाता के धर्मतल्ला इलाके में एक रैली की. संगठन ने अपनी मांग के समर्थन में हस्ताक्षर संग्रह अभियान भी शुरू किया है. इन पुरोहितों ने अपने लिए भत्ते की मांग में सरकार को एक ज्ञापन भी सौंपा है.

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा सवाल करते हैं, "बंगाल भारी कर्ज के बोझ में डूबा है. ऐसे में सरकार किसी खास तबके के लोगों के लिए भत्तों और तमाम दूसरी सुविधाओं का ऐलान कैसे कर सकती है? आखिर पुरोहितों और दूसरे धर्मों के गुरूओं को यह सुविधा क्यों नहीं दी जाएगी?"

राज्य सरकार को भी शायद इस फैसले पर विवाद का अंदेशा था. इसलिए उसने आश्चर्यजनक तरीके से फुर्ती दिखाते हुए ममता के इस फैसले को लागू कर दिया है. कई इमामों को इसके तहत भत्ता मिलने लगा है. लेकिन पुरोहित ‘हमें भी हर महीने भत्ता दो’ के नारे लगाते हुए घूम रहे हैं.

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