लोकतंत्र है या तानाशाहियों का जमघट?

  • 12 मई 2012
कार्टून विवाद पर जवाब देते कपिल सिब्बल इमेज कॉपीरइट BBC World Service

शुक्रवार, 11 मई को संसद में डॉ. अंबेडकर और पं. जवाहर लाल नेहरू के तथाकथित अपमानजनक कार्टून पर हंगामा हुआ. संयोगवश शुक्रवार को ही सआदत हसन मंटो की जन्मशती भी थी.

यहां मंटो की एक मशहूर कहानी ‘टिटवाल का कुत्ता’ याद आ रही है.

संक्षेप में कहानी यह है कि कश्मीर के एक निर्जन इलाके टिटवाल में नियंत्रण रेखा के दोनों ओर भारत और पाकिस्तान की एक-एक चौकी है. दोनों चौकियां काफी सुरक्षित, चट्टानों के पीछे हैं और फौजियों के पास मनबहलाव का कोई साधन नहीं है.

कभी-कभार औपचारिकतावश दोनों चौकियों के सिपाही एक-दूसरे की ओर गोलियां चला देते हैं, जो चट्टानों से टकरा जाती हैं. एक दिन एक आवारा कुत्ता भारतीय चौकी की ओर आ जाता है, वह फौजियों के लिए और समय काटने का एक जरिया बन जाता है.

कुत्ता भारत-पाकिस्तान तो जानता नहीं, अगले दिन पाकिस्तान की चौकी की तरफ चला जाता है, वहां भी फौजी उससे मनोरंजन करते हैं.

कहानी का अंत यह है कि दानों ओर के फौजियों की ऊब, खीज, दुश्मनी और अहंकार का शिकार वह कुत्ता होता है और उनकी गोलियों से दोनों चौकियों के बीच सीमा पर मारा जाता है.

हमारे देश में अभिव्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकार का हाल उसी टिटवाल के कुत्ते जैसा है.

ऐसा नहीं लगता कि उस कार्टून ने सचमुच किसी को आहत किया होगा. आखिरकार वह कार्टून 1949 में एक बड़े राष्ट्रीय अखबार में छपा था, तब पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर दोनों जीवित थे.

कार्टूनिस्ट केशव शंकर पिल्लै की नेहरू जी से अच्छी खासी मित्रता थी, नेहरू जी ने शंकर को अपनी प्रख्यात सलाह दी थी- ‘शंकर, मुझे भी मत बख्शना!’ (डोंट स्पेयर मी, शंकर).

एनसीईआरटी की किताब में भी वह कार्टून वर्ष 2006 से है. यूं भी कोई समझदार आदमी उस कार्टून को और उसके साथ किताब में छपी सामग्री को देखे तो वह पाएगा कि उसमें आपत्तिजनक कुछ नहीं है.

फिर हमारे सांसदों की सामूहिक समझदारी को 63 साल बाद अचानक क्या हो गया?

कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कुछ सांसद ऊब रहे हों और उन्हें कुछ शोर-शराबा, कुछ उत्तेजना चाहिए हो. हो सकता है कि भाजपाइयों को लग रहा हो कि गृहमंत्री पी. चिदंबरम और उनके बेटे पर किया जा रहा आक्रमण कहीं नहीं पहुंच रहा हो.

हो सकता है कि कांग्रेसी बचने का कोई रास्ता खोज रहे हों. हो सकता है प्रणब मुखर्जी सोच रहे हों कि राष्ट्रपति चुनाव में कोई समस्या न हो जाए. हो सकता है कि किसी सांसद के नाश्ते में ठंडा पराठा परोस दिया गया हो. हो सकता है कि किसी सांसद को मनपसंद पान न मिला हो.

वह बेचारा 63 साल पुराना कार्टून टिटवाल का कुत्ता बन गया.

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Image caption कार्टूनिस्ट: राजेंद्र धोड़पकर

असली वजह

हम पाते हैं कि भावनाएं आहत होने के जितने उदाहरण होते हैं उनके पीछे कोई दूसरा कारण होता है.

कभी कोई कहीं जमीन हथियाना चाहता है, कहीं कोई राजनीति में महत्व न मिलने से नाराज होता है, कहीं कोई अपना कोई घपला या भ्रष्टाचार छुपाना चाहता है, कहीं कोई ठेका पाना चाहता है, कहीं कोई राजनैतिक रूप से रसूखदार होना चाहता है, कहीं कोई रंगदारी वसूलना चाहता है, कहीं कोई वोटों का ध्रुवीकरण चाता है.

इन सारे मुद्दों पर धार्मिक, इलाकाई, जातिवादी, विचारधारात्मक, निजी, सार्वजनिक भावनाएं आहत हो जाती हैं. नतीजा वही कि अभिव्यक्ति की आजादी हलाक हो जाती है.

ममता बनर्जी क्यों आहत हुईं. जिन सज्जन ने उनका वह तथाकथित कार्टून ई-मेल पर भेजा था शायद वे माकपा समर्थक थे. कोई स्थानीय तृणमूल कार्यकर्ता वहां के बिल्डिंग मटेरियल सप्लाई सिंडीकेट का नेता था. वह अपना कमीशन न मिलने से नाराज था.

हो सकता है कि उसकी बीवी ने उस दिन मछली बनाते वक्त मिर्च ज्यादा डाल दी हो. नतीजन बेचारे ई-मेल भेजने वाले पर महिलाओं के इज्जत के साथ छेड़छाड़ से लेकर तो हत्या का संदेश देने तक के आरोप लग गए.

ममता बनर्जी भी शायद आहत उतनी नहीं हुई होंगी, जितनी तृणमूल कार्यकर्ता की कार्रवाई से उनके अहंकार में और हवा भर गई होगी.

लोकतंत्र या....

सुना जाता है कि लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की आजादी होती है, अलग-अलग मत व्यक्त करने की छूट होती है.

हमारे देश में हालत तानाशाही से खराब है. तानाशाही में आपको यह मालूम होता है कि आप सत्ताधारी समूह या परिवार के खिलाफ नहीं लिख बोल सकते, बाकी लोगों के खिलाफ लिखने-बोलने की तो आजादी होती है.

साम्यवादी तानाशाही में पूंजीवाद समर्थक, पूंजीवाद के दलाल, प्रतिक्रियावादी, संशोधनवादी वगैरा के खिलाफ बोलने की आजादी होती है.

धार्मिक तानाशाही में आप धर्मविरोधी, उदारवादी, महिलाओं के हकों के समर्थकों के खिलाफ लिख सकते हैं.

पूंजीवादी तानाशाहियों में नेता उनके परिवार ओर उनके व्यापारिक हितों के खिलाफ लिख सकते हैं.

लेकिन हमारे देश में तो कौन कब आहत हो जाए पता नहीं, तो आप ऐसा ही कुछ सुरक्षित ढंग से लिख सकते हैं, जिसका कोई अर्थ न हो.

हम लोकतंत्र हैं या छोटी-छोटी तानाशाहियों का एक जमघट बने जा रहे हैं?

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