राष्ट्रपति: जनता की उम्मीदों का ख्याल रखा जाना चाहिए

प्रतिभा देवी सिंह पाटिल( फाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट AP
Image caption राष्ट्रपति ने कहा कि

भारतीय संसद की पहली बैठक के 60 साल पूरे होने पर संसद के केंद्रीय हॉल में संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने कहा कि जनता की बढ़ती उम्मीदों का ख्याल रखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियां और उसके फैसले आम जनता की बढ़ती उम्मीदों के अनुरूप होने चाहिए.

उनके अनुसार कई बार ऐसा होता है कि बातचीत तक करना बहुत मुश्किल हो जाता है लेकिन संवैधानिक दायरों में रहकर संसद के अंदर बातचीत के जरिए ही उनका समाधान ढूंढा जा सकता है.

इस मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संसद की कहानी दर असल आजादी और सम्मान के लिए पूरे मानव जाति के जरिए की गई कोशिशों की कहानी है.

उन्होंने कहा कि भारतीय संसद केवल भारतवासियों की ईच्छाओं और चिंताओं का ही प्रतिनिधित्व नहीं किया बल्कि इसने शांति और आत्मसम्मान के रास्ते पर चलने वाले हर इंसान की उम्मीदों का प्रतिबिंब है.

'क्रियाशील लोकतंत्र'

लेकिन एक तरफ जहां उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की खूबियों का जिक्र किया वहीं दूसरी तरफ उसके सामने आने वाली चुनौतियों का भी जिक्र किया.

उनका कहना था, ''भारतीय लोकतंत्र भले ही निर्दोषपूर्ण ना हो लेकिन ये एक क्रियाशील लोकतंत्र है जिसमें आपसी मतभेद को सुलझाने के लिए संस्थागत उपाय मौजूद है. ये हमारे लोकतंत्र की ही खासियत है जो राष्ट्र को एकजुट रखता है और ये तरक्की के रास्ते पर चलता रहता है.''

मनमोहन सिंह ने अफसोस जताते हुए कहा कि संसद की कार्यवाही में व्यवधान की परंपरा लगातार बढ़ती जा रही है और संसद में बहस का स्तर दिन ब दिन घटता जा रहा है.

उनका कहना था, ''ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि पिछले कुछ सालों में संसद के अंदर गंभीर मुद्दों पर होने वाली बहस की संख्या कम होती जा रही है. हमें वो परंपरा दोबारा शुरू करनी होगी. जनता का सम्मान हासिल करने और जनभावना का नेतृत्व करने के लिए यही एक तरीका है.''

उन्होंने सारे सांसदों से मिलकर एक सुरक्षित और खुशहाल देश बनाने का आह्वान किया.

इससे पहले इस संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कहा कि विश्व को लोकतांत्रिक प्रणाली का तोहफा भारत ने ही दिया है.

मीरा कुमार ने कहा कि समय ने उन सभी आशंकाओं को खारिज कर दिया जो कि आजादी मिलने के बाद 50 के दशक में भारत के बारे में जताए जा रहे थे.

'संसद की गरिमा'

उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने इस मौके पर कहा कि ये आम धारणा बनती जा रही है कि ईमानदारी से संसदीय काम काज करने से राजनैतिक फायदा नहीं होता.

उनके अनुसार कई लोग मानने लगे हैं कि संसद में बाधा के कारण बहुत कम दिनों के लिए काम होता है, बहस भी कम होती है और कई बार अहम विधेयक जल्दबाजी में पास कर दिए जाते हैं.

उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शब्दों को याद करते हुए कहा कि 'मैजेस्टी ऑफ पार्लियामेंट' यानी संसद की गरिमा को दोबारा बहाल किया जाना चाहिए.

इस मौके पर 1952 में गठित पहली लोकसभा के सदस्य रहे चार सांसदों रिशांग किशिंग, रेशमलाल जांगड़े, कंडाला सुब्रमण्यम, के मोहन राव को सम्मानित किया गया.

संसद से जुड़ी कुछ किताबों का विमोचन किया गया और पांच तथा दस रूपए के विशेष सिक्के भी जारी किए गए.

सबसे आखिर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किया गया.

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