क्यों असंसदीय हो गई संसद?

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Image caption पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का रिश्ता नफरत का रिश्ता बनकर रह गया है

उन खामियों के बावजूद जो कि बहुत हैं, और जिनमें से कुछ गंभीर हैं, भारत की एक अनूठी खासियत है कि इस तीसरी दुनिया में आजादी के बाद के छह दशकों से संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था काम कर रही है. विभाजन के समय हुए जनसंहार और शांतिकाल में इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन के बाद मिली आजादी के बाद पहला आम चुनाव पाँच साल बाद 1952 में हो सका. इससे समझा जा सकता है कि, आजादी के 65वें साल में, संसद क्यों अपनी 60वीं वर्षगांठ का उत्सव मना रही है. पर ये अवसर टू चीयर्स कहने का है, थ्री चीयर्स कहने का नहीं, और प्रशंसा, निश्चित तौर पर तहेदिल से नहीं हो सकती.

इसका कारण स्पष्ट भी है और दुखद भी. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, जो चुनाव आयोग सुनिश्चित करता है, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बुनियाद है. मगर निर्वाचित संसदें, उनसे जो अपेक्षा थी, उसपर खरी उतरने में नाकाम रहीं. पिछले चार दशक या उससे भी अधिक समय से, संसदों का बाधित होना अब एक नियमित घटना बन गई है, दुर्लभ नहीं. 21वीं सदी के पहले दशक में कम-से-कम एक ऐसा मौका आया है जब संसद का एक पूरे का पूरा सत्र नहीं चलने दिया गया. एक अरब से अधिक लोगों का बजट बिना एक मिनट की बहस हुए पास करवाना पड़ा!

अधिकतर मौकों पर लगभग रोजाना होनेवाले इन व्यवधानों के कारण सतही और अगंभीर होते हैं. बारी-बारी से गठबंधन सरकारें चलानेवाली पार्टियों, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के संबंध, जिसे केवल नफरत कहा जा सकता है, वो इतना ज्यादा है कि उनके बीच संसद को चलाने के लिए जरूरी न्यूनतम आपसी सहयोग भी बन पाना कठिन है.

इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए जब पिछले दो साल में 80 अतिआवश्यक विधेयकों में से एक भी पारित नहीं हो पाया है. अलग-अलग से लगनेवाली क्षेत्रीय पार्टियों और छिटके गुटों ने, जो केवल जातीय या क्षेत्रीय उद्देश्यों को लेकर व्यस्त रहते हैं, स्थिति को और बदतर बना दिया है. एक के बाद एक सदनों के अध्यक्ष ये मातम मनाते रहे कि सांसद ‘लोकतंत्र को बर्बाद’ कर रहे हैं, मगर उससे हुआ कुछ नहीं. ये कहना सही होगा कि इस जंजाल के लिए दोनों ही पक्ष समान रूप से जिम्मेदार हैं. जब वे सत्ता में होते हैं तो एक बात कहते और करते हैं, बाहर होते ही उसका उल्टा.

नेहरू का दौर

निश्चित तौर पर, ऐसा हमेशा नहीं होता था. दरअसल, आजादी की सुबह से अपने 17 साल के शासन में पूरे समय, जवाहरलाल नेहरू ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को गढ़ने और विकसित करने की कोशिश की और सफलता पाई, जिनमें सबसे ऊपर संसद थी जहाँ वो बिना नागा नियमित जाया करते थे. तब कांग्रेस का बहुमत विराट था मगर नेहरू ने विपक्ष के विरोधी विचारों को आदर दिया.

आगे की सीट पर दोनों ही तरफ दिग्गज नेता बैठा करते थे. सत्ता पक्ष की तरफ मौलाना आजाद, गोविंद बल्लभ पंत, सी डी देशमुख, टी टी कृष्णामाचारी और दूसरी तरफ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, ए के गोपालन, आचार्य कृपलानी, हिरेन मुखर्जी आदि.

तत्कालीन ब्रिटिश टीकाकारों ने लिखा कि भारतीय संसद दूसरे पूर्व-औपनिवेशिक देशों के लिए एक आदर्श सरीखा है क्योंकि ये विशाल राष्ट्रीय सभा एक विभिन्नताओं वाले एक विशाल देश की समस्याओं के बारे में चर्चा करती है और उन्हें दूर करती है.

नेहरू काल में संसद क्या हुआ करती थी इसकी बानगी के लिए केवल एक उदाहरण देता हूँ. दिसंबर 1975 में, नेहरू के दामाद फिरोज़ गांधी ने राष्ट्रीयकृत बीमा कंपनी एलआईसी के कई निवेशों के बारे में सवाल उठाए जो एक संदिग्ध उद्योगपति हरिदास मुंधड़ा की संदिग्ध कंपनियों में किए गए थे. नेहरू ने जवाब में संसदीय मर्यादा की सराहना करते हुए एक न्यायिक जाँच की घोषणा की जिससे आगे चलकर वित्तमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और कई बड़े अधिकारी निकाले गए.

चीन का मुद्दा सामने आने तक विपक्षी सीटों पर बैठनेवाले एक से एक योग्य नेता सामने आ चुके थे जो नेहरू पर हमले किया करते. उनमें कृपलानी थे, अटल बिहारी वाजपेयी, नाथ पई, हेम बरूआ, फ्रैंक एंथनी और कई अन्य. सदा सतर्क रहनेवाले एच वी कामथ के लिए तो संसद घर था.

नेहरू की प्रशस्त की हुई प्रथाएँ उनके जाने के फौरन बाद ही मिटने लगीं. उनके उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री केवल 18 महीने रहे. फिर इंदिरा गांधी आईं जो काम में नई थीं और तब उनपर पार्टी के भीतर ही मोरारजी देसाई के समर्थक हमला करने लगे. देसाई को मोरारजी ने पार्टी के भीतर हुए एक चुनाव में हराया था.

इंदिरा का दौर

तबतक संसद में कांग्रेस का बहुमत कमजोर होने लगा था और पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष बढ़ने लगा. इसके अतिरिक्त, पार्टी के नवनियुक्त विपक्षी नेताओं में बड़ी संख्या ऐसे नेताओं की थी जो इंदिरा और उनके पिता के कटु आलोचक थे.

सोशलिस्ट नेता राममनोहर लोहिया ने उन्हें ‘गूँगी गुड़िया’ कहा. उनके गुट का व्यवहार विनम्र नहीं था. वे तीखी बातें किया करते थे, कभी-कभी अस्वीकार्य बातें. परिणामस्वरूप, 1971 के चुनाव के बाद जब वे देश की नेता बनीं, तो उन्होंने भी संसद के साथ वैसा ही व्यवहार किया जैसा कि संसद ने उनके साथ किया था.

तब एक शानदार और पूर्व सांसद हिरेन मुखर्जी ने कहा था – वे संसद के साथ जो कर रही हैं, वो सही नहीं है, मगर तब, संसद भी एक दूसरी ही संसद हो चुकी है. तबसे आज तक संसद ने अपने आप को सुधारने की कोशिश नहीं कि बल्कि वो एक ढलान पर चलायमान है.

1971 में कांग्रेस की जोरदार जीत और उसके बाद बांग्लादेश युद्ध में भारत की विजय का एक विनाशकारी और लंबे समय तक रहनेवाला नतीजा ये हुआ कि सत्ताधारी पार्टी में भ्रष्टाचार और अहंकार चरम पर जा पहुँचे. उसने विपक्ष की भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की वाजिब माँग को नकारना शुरू कर दिया.

आज कोई भी तुलमोहन राम को याद नहीं करता. इंदिरा गांधी की तत्कालीन सरकार तब एक भारी घोटाले में केवल इस कारण फँस गई थी कि इस गरीब आदमी ने, अपने आकाओं के कहने पर ऐसे दस्तावेजों पर दस्तखत किए जिनसे कि लूट मची, जो आज जो हालत है, उसके हिसाब से कहीं से भी बड़ी लूट नहीं कही जा सकती.

तुलमोहन राम मामले के कारण संसद का एक पूरा सत्र नहीं चल सका था, और तबसे ये एक प्रथा सी हो गई है, जो आज भी जारी है. तब मोरारजी देसाई के संसद के भीतर अनिश्चितकालीन धरना देने की धमकी ने इंदिरा गांधी को गतिरोध दूर करने का एक उपाय निकालने पर मजबूर किया.

इंदिरा गांधी का इससे भी बड़ा योगदान इमर्जेंसी रहा (1975-77). इसके बाद कुछ समय के लिए आई जनता सरकार ने इंदिरा और उनके बेटे संजय को दोषी ठहराकर स्थिति को और खराब कर दिया. इसके बाद का इतिहास दोहराने की आवश्यकता नहीं.

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