काश्तकारी अधिनियम में फँसी झारखण्ड की राजनीति

  • 15 मई 2012
आदिवासियों का प्रदर्शन

झारखण्ड या पूर्वी और मध्य भारत में आदिवासियों के शोषण की बात आम रही है. यही वजह है कि इन इलाकों से बड़े पैमाने पर आदिवासियों का पलायन होता रहा है.

ब्रितानी हुकूमत के दौरान झारखण्ड में दो सशक्त काश्तकारी के कानून बनाए गए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आदिवासियों की संख्या बाहर से आकर बसने वालों की तुलना में घट ना जाए.

ये कानून हैं छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम. इन कानूनों के तहत आदिवासियों की ज़मीन ग़ैर आदिवासियों को नहीं बेचीं जा सकती.

हाल ही में झारखण्ड उच्च न्यायलय नें अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि काश्तकारी के इन कानूनों का कडाई के साथ पालन हो. न्यायलय का कहना था कि आदिवासियों के साथ साथ अनुसूचित जाति के लोगों की ज़मीन भी दूसरों को बेचीं नहीं जा सकती.

छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के अनुसार आदिवासी की ज़मीन सिर्फ आदिवासी ही खरीद और बेच सकता है वो भी अगर वह एक ही थाना क्षेत्र के रहने वाले हों.

काश्तकारी कानून पर बहस

न्यायालय के फैसले से जहाँ झारखण्ड में ज़मीन की रजिस्ट्री बंद हो गयी है वहीं राजनितिक और सामाजिक हलकों में इसको लेकर ज़ोरदार बहस छिड़ी हुई है.

एक तरफ ग़ैर आदिवासी वर्ग के लोग इस कानून में संशोधन की मांग कर रहे तो दूसरी तरफ आदिवासी संगठन इसमें किसी भी संशोधन के पक्ष में नहीं हैं.

राज्य की विधान सभा से लेकर सड़क तक इस मुद्दे को लेकर पक्ष और विपक्ष में रैलियां निकाली जा रहीं हैं. मौजूदा घटनाक्रम ने सरकार को भी असमंजस में डाल दिया है क्योंकि इस मुद्दे को लेकर लगभग सभी राष्ट्रीय दलों में आपसी मतभेद उबर कर सामने आ रहे हैं.

प्रमुख विपक्षी दल झारखण्ड विकास मोर्चा के अध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी काश्तकारी अधिनियम में बदलाव के पक्षधर हैं. वह कहते हैं कि राज्य में मौजूद दोनों काश्तकारी अधिनियमों को मिलकर एक नया कानून बनाया जाए जिसमे इस बात का प्रावधान किया जाए कि राज्य के किसी भी कोने में रहने वाला आदिवासी किसी भी जगह ज़मीन ले सकता है.

बाबूलाल मरांडी कहते हैं, "आज अगर हम इस बारे में सकारात्मक ढंग से नहीं सोचेंगे तो फिर आदिवासियों का विकास नहीं हो पायेगा. इस लिए ज़रूरी है कि एक कानून बनाया जाए जहाँ पूरे राज्य का आदिवासी कहीं भी किसी आदिवासी के ज़मीन ले सकता हो."

सामाजिक तनाव

Image caption आदिवासी नेता इस कानून के सख़्ती से पालन पर जोर दे रहे हैं

उधर सत्तारुद भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रघुबर दास का कहना है कि इस मामले की समीक्षा के लिए एक आयोग का गठन किया जाना चाहिए.

रघुबर दास ने बीबीसी को बताया कि जब ये कानून बने थे तब ब्रितानी हुकूमत थी जबकि आज परिस्थितियां बदल गयीं हैं. वह कहते हैं, "नयी परिस्थितियों के अलोक में इन कानूनों की समीक्षा की जानी चाहिए."

कई आदिवासी संगठन ऐसे हैं जिन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सरकार इन दोनों कानूनों में किसी भी तरह का छेड़छाड़ करेगी तो वह उसका विरोध करेंगे.

आदिवासी संगठनों के रुख और ग़ैर आदिवासी समूहों द्वारा कानून में बदलाव लाने की वकालत से सूबे में सामाजिक तनाव की स्थिति पैदा होती जा रही है.

हालांकि झारखण्ड दिसोम पार्टी के सालखन मुर्मू कहते हैं कि न्यायलय के फैसले से राज्य के लोग खुश हैं.

'ज़मीन ही सबकुछ'

Image caption झारखंड दिसोम पार्टी के सालखन मुर्मू कहते हैं कि लोग अदालत के फ़ैसले बहुत खुश हैं

वह कहते हैं कि इस बहाने आदिवासियों की ज़मीन को लूट से बचाया जा सकता है.

बीबीसी से बात करते हुए मुर्मू का कहना था कि सामाजिक तनाव पैदा करने वालों में मुख्य रूप से बाहरी लोग हैं जो झारखण्ड में आदिवासियों की ज़मीन हथियाना चाहते हैं या फिर बड़े उद्योगपति.

सालखन कहते हैं, "आदिवासी के लिए उसकी ज़मीन ही सबकुछ है. अगर ज़मीन चली गयी तो उसका अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा."

काश्तकारी कानूनों में फेरबदल के सवाल से सभी दल बचना चाह रहे हैं. खासतौर पर तब जब 2014 में राज्य में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं. राजनितिक दलों के लिए बड़े असमंजस की स्थिति है. वह ना तो आदिवासियों को नाराज़ कर सकते हैं और ना ग़ैर आदिवासियों को.

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