गए थे अकेले, लौटे सपरिवार...पुनर्स्थापन की दिक्कतें

आरिफ
Image caption आरिफ 14 साल की उम्र में सीमा पार चले गये थे. वे पाकिस्तान में क्रिकेट और कैरम बोर्ड खेलते रहे.

पच्चीस वर्षीय आरिफ भारत प्रशासित कश्मीर के उन हजारों युवाओं में शामिल हैं, जिन्होंने पाकिस्तान जाकर 'गुरिल्ला युद्ध' की ट्रेनिंग ली थी. बाद में उन्हें कश्मीर लौटकर भारतीय सेना से जंग लड़नी थी. लेकिन वे अब भारत लौट रहे हैं - पाकिस्तानी पत्नी और बच्चों के साथ...

उनके और अनेक अन्य कश्मीरी युवाओं के लौटने से महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठने लगा है कि वे और उनके बच्चे यहां बसेगें कैसे?

उनके लौटने का रास्ता भारत सरकार की ‘पुनर्स्थापन नीति’ के तहत तैयार हुआ जिसकी शुरुआत जम्मु-कश्मीर के मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्लाह ने की थी.

ग्यारह सौ आवेदन आए

पुनर्स्थापन नीति के तहत सरकार ने उन परिवारों को आवेदन करने के लिए कहा था जिनके बच्चे पाकिस्तान के कैंपों में ‘अटक’ गए थे.

कश्मीर के कॉउंटर इंटिलेजेंस विभाग के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, "हमें 1100 आवेदन मिले हैं. सौ से ज्यादा लड़के तो पहले ही वापस आ गए हैं और अन्य और भी आ रहे हैं."

विभागीय पदाधिकारियों को इस बात से आश्चर्य हो रहा है कि जो लोग यहां लौटे हैं, उनके तो अब पूरे परिवार हैं और वे सपरिवार लौट रहे हैं.

अपने दो भाइयों के साथ-साथ उनके बीबी और बच्चों का स्वागत करने वाले मंसूर का कहना है, “पुलिस सोचती है कि जो लड़के पाकिस्तान गए थे वे अकेले लौटेंगे. लेकिन उस बीच उनकी शादी हो गई, उन्होंने अपना कारोबार शुरु कर लिया और अब उनके बच्चे भी हैं. इसलिए सबके साथ उनका लौटना लाजिमी है.”

उनकी भतीजी जोनिया कराची मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थीं.

'बच्चों की पढ़ाई के बारे में सोचें'

जोनिया का कहना है, “हमें इस बात की खुशी है कि हम अपने पिता के घर वापस लौटे हैं, लेकिन यहां के अधिकारियों को बच्चों की पढ़ाई के बारे में भी सोचना चाहिए. आखिर हमारे पास पाकिस्तान में जो कुछ भी था, सब कुछ हमने वहीं छोड़ दिया. हमने सरकार के वापस लौटने की अपील का मान रखा है.”

हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अभी भी अविवाहित हैं, क्योंकि जब उन्होंने सीमा पार की थी तो उस समय उनकी उम्र काफी कम थी.

अमरीका में 11 सितंबर 2001 के हमले से थोड़े दिन पहले तक भारत शासित कश्मीर में सशस्त्र संगठन चरमपंथियों को नियुक्त कर रहे थे.

फिल्में देखते थे

दक्षिण श्रीनगर से 50 मील दूर वेरिनाग के 14 वर्षीय आरिफ हुसैन दर्जेनों लोगों के साथ उस समय हरकत-उल-जेहाद इस्लामी (हुजी) में शामिल हो गए थे. वो कई हफ्ते पैदल चलकर भारतीय सेना की गोलियों से बचते-बचाते पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर पहुंचे.

पच्चीस वर्षीय आरिफ ने वहां जाकर विभिन्न प्रकार के हथियारों का प्रशिक्षण जरूर लिया था, लेकिन वे कभी जंग में शामिल नहीं हुए.

वे रावलपिंडी में क्रिकेट मैच और अपनी पसंदीदा पाकिस्तानी हीरोईन सैबा की फिल्में देखते रहे. उनका कहना था कि मैं पाकिस्तान को पहाड़ों से इतर भी देखना चाहता था.

Image caption भारत प्रशासित कश्मीर में पहुंचने से पहले जोनिया करांची के मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी

आरिफ का कहना था, “प्रशिक्षण के बाद मैंने अपने सहपाठियों के साथ कश्मीर जाने से मना कर दिया. मैं उस कैंप को छोड़कर दूसरे कैंप में चला गया जहां मैं कंप्यूटर पर हिन्दी फिल्में देखता था और कैरमबोर्ड खेलता था.”

नौकरी भी की

पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में एक दशक बिताने वाला आरिफ ने सिर्फ फिल्में ही नहीं देखीं, बल्कि उन्होंने टोयटा मोटर कंपनी में नौकरी भी की.

उनका कहना था, “मैं जानता था कि लोग वापस जा रहे हैं लेकिन मेरे पास तो पैसे ही नहीं थे. जिस एजेंट ने कराची से नेपाल और फिर भारत जाने का बंदोबस्त करने की बात की, उसने पहले 60 हजार रुपए की मांग की, लेकिन बात 58 हजार में बन गई. मैंने वहां से भाग निकलने के लिए काफी पैसे जमा कर रखा था.”

आरिफ अब पुलिस की हिरासत में हैं और हो सकता है कि उन्हें थोड़े दिनों में जमानत भी मिल जाय. लेकिन उन्हें इस बात का दुख है कि कश्मीर में घुसपैठ करते समय उनके 35 साथी मारे गए थे.

सीमा पार कर हथियारों की ट्रेनिंग लेने वाले कश्मीरी युवकों के लिए सरकार ने पुनर्स्थापन की नीति बनाई है लेकिन शर्त है कि उन्होंने कभी हथियार नहीं उठाया हो.

कश्मीरी युवाओं के लिए बनी इस पुनर्स्थापन नीति को पाकिस्तान सरकार से मान्यता नहीं मिली है.

वहां से लौटने वाले एक युवक का कहना था, “हमें अवैध रूप से नेपाल होते हुए भारत की सीमा में दाखिल होना होता है, उसके बाद पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ता है.”

उमर से उम्मीद

कश्मीर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एसएम सहाय का मानना है कि अगर पूराने चरमपंथियों को ठीक से पुनर्स्थापित नहीं किया गया तो वे राज्य की सुरक्षा के लिए फिर से खतरा बन सकते हैं.

पुलिस का कहना है कि 30 हजार से ज्यादा 'चरमपंथी' हैं जिन्होंने या तो आत्मसमर्पण किया है या फिर सजा काट ली है.

स्थानीय बैंकर जमाल अहमद का कहना है, “पुनर्स्थापन की नीति से मुख्यमंत्री को एक-दो अंक भले ही मिल जाएं लेकिन उन्हें उस नीति को और कारगर बनाने की जरूरत है.

जो लोग वापस लौटे हैं, उन्हें ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ यानि आपत्ति न होने का प्रमाणपत्र लेने के लिए सरकारी दफ्तरों का बार-बार चक्कर लगाना पड़ रहा है ताकि उनके बच्चों का स्कूलों में दाखिला हो सके. ”

पुलिस का कहना है कि कम से कम चार हजार कश्मीरी पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में बंद हैं. पुलिस के अनुसार उन लोगों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है और अब वापस लौटना चाहते हैं.

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