तीन साल पुरानी, आठ साल बूढ़ी यूपीए सरकार

  • 22 मई 2012
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मुझे लगता है कि ये सरकार तीन साल पुरानी है लेकिन आठ साल बूढ़ी है. बुजुर्गियत की नहीं बल्कि बुढ़ापे की छाया इस सरकार पर शुरु से ही रही है.

यूपीए गठबंधन के तौर पर पहली बार चुनाव जीतने से कांग्रेस खुद थोड़ा हैरान थी, वाम मोर्चे का दबाव था, इस वजह से पहले कार्यकाल में कुछ काम हुए भी.

लेकिन यूपीए की दूसरी पारी में न तो नये विचार दिखाई दिये न इसके लिए ऊर्जा नजर आई. संसद के भीतर और बाहर कोई रणनीति या कौशल दिखाई नहीं दिया.

इस सरकार में केवल आर्थिक सुधारों को लेकर पॉलिसी पैरालिसिस नहीं है. सरकार न बाजार को खुश कर सकी न निवेशकों को. सरकार आम आदमी के लिए भी कुछ नहीं कर पाई है.

तेलंगाना का मुद्दा हो या फिर कश्मीर की दिक्कत, सरकार कोई दिशा-बोध तय नहीं कर पाई है. ये सरकार की चहुंमुखी असफलता है.

'कौशल की कमी'

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Image caption प्रणब मुखर्जी ने यूपीए सरकार में कई मौकों पर संकट-मोचक की भूमिका निभाई है

गठबंधन सरकार की मजबूरी पॉलिसी बनाने में कमी की वजह नहीं है. गठबंधन सरकार पहली भी बनी है. ये सरकार गठबंधन पर उतनी निर्भर नहीं है.

समस्या गठबंधन नहीं, गठबंधन चलाने के कौशल की कमी है. सत्तारूढ़ दल की रणनीति और समझ में कमी है. गठबंधन के सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ना सही नहीं होगा.

सरकार की छवि पर असर पड़ा है. उसकी चमक कम हुई है. सरकार पर आम लोगों का भरोसा डगमगाया है. शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस को जो समर्थन मिला था, उसमें कमी आई है. ये हम सर्वेक्षण के आधार पर भी कह सकते हैं.

ताकत और कमजोरी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ताकत ही धीरे-धीरे उनकी कमजोरी बनती जा रही है. ताकत ये है कि ईमानदार छवि के व्यक्ति हैं, किसी बुरे काम में उनका नाम नहीं है.

लेकिन कमजोरी ये है कि खुद निर्णय नहीं ले सकते. यही उनके लिए एक नकारात्मक पक्ष बनता जा रहा है. लोगों में भावना आ रही है कि इस ईमानदारी का क्या करें. इस ईमानदारी से भी निकलकर कुछ तो आना चाहिए.

बाकी बचे दो सालों में यूपीए सरकार के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां हैं. क्या ये सरकार खुद अपनी चुनौतियों को समझ सकती है, यही उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

इस सरकार की कारगुजारियों को देखने के बाद नहीं लगता है कि इन चुनौतियों को समझने की क्षमता भी कांग्रेस पार्टी में है. कांग्रेस पार्टी में जान फूंकना एक चुनौती है. चुनौती वर्ष 2014 में होने वाले इम्तिहान की तैयारी करने की है.

संसदीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि समय से पहले चुनाव वो ही सरकार कराती हैं जो चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त होती हैं, जो सरकार बहुत मजबूत होती है. आमतौर पर कमजोर सरकारें वक्त से पहले चुनाव नहीं करवातीं.

तमाम कमजोरियों के बाद भी ये सरकार संसद में बहुत कमजोर नहीं है और इस सरकार पर फौरी तौर पर कोई संकट नहीं है. इसलिए सरकार गिरती नजर नहीं आती, न सरकार खुद समय से पहले चुनाव चाहेगी. मध्यावधि चुनाव की बात में कयास ज्यादा है हकीकत कम.

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