सरकार की सालगिरह: साख पर सवाल

  • 22 मई 2012
मनमोहन सिंह (फाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट PTI
Image caption मनमोहन सिंह के चेहरे पर ये खुशी अब कम ही देखने को मिलती है.

केंद्र की यूपीए-2 सरकार ने अपने तीन साल पूरे कर लिए.

इस मौके पर यूपीए-2 सरकार के पिछले तीन साल और खासकर पिछले एक साल का मूल्यांकन किया जाए तो लगता है कि सरकार को तो कोई खतरा नहीं है, वो जैसी चल रही है चलती रहेगी, लेकिन असल खतरा सरकार की साख और छवि को है.

हालाकि कांग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वी कहते हैं कि इस सरकार ने देश को आगे ले जाने के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए हैं.

राशिद अल्वी कहते हैं, ''एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इन तीन सालों में दोगुना से ज्यादा बढ़ा है, पूरे देश के अंदर हिंसा में कमी आई है जिसका नतीजा है कि पर्यटन के कारण होने वाली आमदनी दो अरब डॉलर से ज्यादा बढ़ी है, दो हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली पैदा की है. इन तीन सालों में हम देश को आगे ले गए हैं लेकिन ये अलग बात है कि भारतीय जनता पार्टी हम पर बेबुनियाद इल्जाम लगाती रही है.''

'नेतृत्वविहीन सरकार'

राशिद अल्वी या फिर कांग्रेस के दूसरे नेता चाहे जो भी कहें, विपक्षी पार्टियों के अलावा उद्योग जगत के लोग और आम आदमी भी अब तो कहने लगा है कि ये सरकार अहम मामलों में फैसला करने में विफल रही है.

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी यूपीए-2 सरकार की पिछले तीन साल की तीन उपलब्धियां रही हैं.

उन्होंने ये भी कहा कि सरकार नेतृत्वविहीन, दिशाहीन और नीतिहीन हो गई है.

लेकिन अगर पक्ष और विपक्ष के दावों को थोडी़ देर के लिए छोड़ भी दें तो भी इस सरकार के पास अपनी उपलब्धियों के नाम पर दिखाने के लिए कुछ खास नही है.

शिक्षा के अधिकार का कानून या इस तरह के दो-एक और कानून को लागू करने का श्रेय बेशक इस सरकार को जाता है लेकिन खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण, महिला आरक्षण और लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण विधेयक संसद में लटके हुए हैं.

यूपीए-2 ने जब 2009 में पारी की शुरूआत की थी, तो कहा जा रहा था कि वामपंथियों के समर्थन के बिना बनी सरकार आर्थिक सुधार के क्षेत्र में कड़े फैसले करेगी लेकिन कारण चाहे गठबंधन की मजबूरी हो या फिर खुद कड़े फैसले लेने की हिम्मत में कमी सच्चाई तो ये है कि ये सरकार थमी और थकी हुई लगने लगी है.

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Image caption ममता बनर्जी के कारण सरकार की कई बार किरकिरी हो चुकी है.

सरकार के पास दोनों सदनों में इतनी संख्या है नहीं कि वो अपने बल पर कोई बिल पास करा सके और विपक्ष तो दूर वो अपने सहयोगियों को भी कई मामलों में साथ नहीं ले पाई है.

खुदरा व्यापार में एफडीआई और एनसीटीसी के मुद्दे पर उसे भाजपा से ज्यादा अपने सहयोगियों का विरोध झेलना पड़ा है.

'छवि पर सवाल'

लेकिन इन सबसे ज्यादा बड़ी समस्या इस सरकार के लिए ये है कि इसके सबसे बड़े हथियार सोनिया गांधी का नेतृत्व, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि और राहुल गांधी के रूप में भविष्य का नेता अब इन सब पर सवाल उठने लगे हैं.

सोनिया गांधी अपने स्वास्थ्य के कारण पार्टी को शायद उतना समय नहीं दे पा रही हैं या फिर राहुल गांधी को आगे लाने के लिए उन्होंने खुद को कई जिम्मेदारियों से अलग कर लिया है.

प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि पर भले ही अभी तक सीधे तौर पर कोई हमला नहीं हो रहा है लेकिन सड़क पर चलने वाला आम आदमी अब कहने लगा है कि प्रधानमंत्री ईमानदार तो हैं लेकिन करते कुछ नहीं हैं.

यूपीए-1 में अमरीका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर अपनी कुर्सी और सरकार को दावं पर लगाने वाले मनमोहन सिंह यूपीए-2 में एक कामचलाऊ प्रधानमंत्री की तरह काम करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं.

हिंदुस्तान अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर प्रधानमंत्री की मजबूरी का जिक्र करते हुए कहते है, ''ईमानदार प्रधानमंत्री और बेईमान मंत्री ये बात तो अब कांग्रेसी लोग भी कह रहें है. इससे प्रधानमंत्री की छवि पर नकारात्मक असर पड़ता है. लेकिन राजनीति का एक सिद्धांत है कि अगर आप सत्ता में होंगे तभी अपने सपनों को पूरा कर सकेंगे. मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री भी इसी सिद्धांत पर अमल कर रहे हैं. लेकिन ये बात सच है कि उनकी लोकप्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हैं.''

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Image caption उत्तरप्रदेश विधान सभा चुनाव के बाद राहुल गांधी की क्षमता पर भी सवाल उठने लगे हैं.

लेकिन प्रधानमंत्री का बचाव करते हुए राशिद अल्वी कहते हैं, ''यूपीए-2 की जो भी उपलब्धियां हैं उनमें प्रधानमंत्री का पूरा योगदान है और उन्हीं की वजह से ही हम आगे बढ़े हैं और आज भी प्रधानमंत्री पूरी ताकत के साथ देश को आगे ले जा रहें हैं.''

पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में पार्टी के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाने लगा था और कई लोगों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि राहुल गांधी को बीच में ही प्रधानमंत्री बना दिया जाना चाहिए.

यहां तक की भाजपा को भी राहुल गांधी का कोई काट नहीं मिल पा रहा था लेकिन पांच राज्यों में खासकर उत्तरप्रदेश में हुए विधान सभा चुनावों में विफलता के कारण राहुल गांधी के करिश्मा और क्षमता पर गंभीर सवाल उठने लगे है.

चुनाव

तो क्या चुनाव पहले भी हो सकते है ?

इस सरकार की स्थिति चाहे जो भी हो लेकिन संसद के अंदर और संसद के बाहर सरकार को कोई खतरा नहीं है इसलिए चुनाव तो शायद 2014 से पहले नहीं होंगे.

सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती है मंहगाई को कम करना और आर्थिक मुद्दों से जुड़े विधेयकों पर आम सहमति बनाना. आने वाला राष्ट्रपति चुनाव भी एक चुनौती है लेकिन उसमें शायद सरकार को ज्यादा कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा.

लेकिन एक दूसरा सवाल ये भी है कि 2014 में क्या होगा ?

जाहिर है राजनीति में एक हफ्ते का समय भी बहुत होता है तो दो साल के आगे के बारे में कुछ भी क्यास करना सही नहीं होगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि चुनाव में आप की हार-जीत आपके अपने प्रदर्शन के साथ-साथ इस बात पर निर्भर करता है कि आपके प्रतिद्वंदी का प्रदर्शन कैसा रहता है.

इस समय कांग्रेस के लिए अगर कोई एक चीज़ सबसे ज्यादा खुशी देने वाली है तो वो ये कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा खुद इतनी परेशानियों से गुजर रही है कि वो कांग्रेस को एक मजबूत चुनौती देने की स्थिति में नहीं दिखती.

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