जम्मू-कश्मीर: विशेष दर्जे को हुई 'क्षति' का जायजा हो

कश्मीर (फाइल) इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption भारत में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा विवादास्पद मु्द्दा रहा है और कई राजनीतिक दल इसका विरोध करते हैं.

जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भारत सरकार की बनाई वार्ताकार समिति ने कहा है कि 1952 के बाद से वहाँ लागू केंद्रीय कानूनों और भारतीय संविधान के अनुच्छेदों की समीक्षा होनी चाहिए. इसका मकसद ये बताया है - कि ये पता चल सके कि क्या इससे राज्य के विशेष दर्जे को क्षति पहुँची और यदि हाँ, तो किस हद तक क्षति पहुंची है.

वार्ताकारों ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में समीक्षा किए जाने के लिए एक संवैधानिक समिति के गठन की सिफारिश की है.

तीन सदस्यों की वार्ताकार समिति ने लगभग 180 पन्नों की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि संवैधानिक पुनरीक्षण समिति इस बात की भी जांच करे कि केंद्रीय कानूनों और भारतीय संविधान के अनुच्छेदों के लागू होने से राज्य सरकार के अधिकारों में किस तरह की कटौती हुई.

वार्ताकारों ने सिफारिश की है कि संवैधानिक जांच समिति की रिपोर्ट छह माह के भीतर सौंपी जाए और ये सभी पक्षों को मान्य हो.

शिक्षाविद राधा कुमार, एमएम अंसारी और पत्रकार दिलीप पडगाओंकर की इस समिति का गठन अक्तुबर 2010 में किया गया था. इसने प्रदेश के जम्मू, कश्मीर और लद्दाख - तीनों क्षेत्रों में 700 प्रतिनिधियों से मुलाकात की और तीन गोलमेज सम्मेलन किए.

केवल बाहरी-आंतरिक सुरक्षा के कानून ही

वार्ताकारों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर का कोई भी हल भारतीय संविधान के दायरे में हो. उनका ये भी मानना है कि जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के भीतर दिया गया विशेष दर्जा कायम रखा जाना चाहिए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य के तीनों इलाकों के लिए क्षेत्रीय काउंसिलों का गठन किया जाना चाहिए और इन तीनों क्षेत्रों को कानूनी, कार्यकारिणी और वित्तीय मामले में भी कुछ अधिकार हासिल होने चाहिंए.

अपनी सिफारिशों में वार्ताकारों ने कहा है कि संसद राज्य के लिए किसी भी तरह का कानून न बनाए जब तक कि वो देश के आंतरिक और बाहरी सुरक्षा और उसके आर्थिक सरोकारों के लिए जरूरी न हो.

समिति ने नियंत्रण रेखा के दोनों ओर पारस्परिक सहयोग की भी सिफारिश की है.

किन मुद्दों पर सर्वसम्मति

वार्ताकारों ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में कहा है कि जम्मू-कश्मीर मुद्दे का राजनीतिक हल सभी पक्षों (जो मुख्यधारा में शामिल नहीं हैं उन्हें भी शामिल करते हुए) के बीच बातचीत से हो.

रिपोर्ट में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ में संयुक्त प्रांत के तौर पर ही रहे और राज्य को अनुच्छेद 370 के तहत दिया गया विशेष दर्जा हर हाल में कायम रहे.

इसमें कहा गया है कि पूर्व में जो भी हुआ, उसके बोझ के बिना लोग लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल कर पाएँ, साथ ही जो युद्ध या हिंसा के कारण विस्थापित हुए हैं, उनका मुद्दा सुलझाया जाए.

ये भी कहा गया है कि राज्य की आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जाए, नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा के आरपार लोगों और सामान की आवाजाही जल्द सुनिश्चित की जाए. साथ ही जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान प्रशासित हिस्सों में लोकतांत्रिक व्यवस्था को कायम किया जाए.

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