'आतंकी तोहमत' से त्रस्त बिहार का मुसलमान गाँव

  • 25 मई 2012
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Image caption बिहार के रहने वाले फसीह को सऊदी अरब से पकड़ा गया है

बिहार के मधुबनी और दरभंगा ज़िले का मुस्लिम समाज ये मानता है कि इन दिनों वह ' आतंकी तोहमत ' से काफ़ी हैरान और परेशान है.

इसी इलाक़े के चौदह लोगों को चरमपंथी गतिविधियों में शामिल या मददगार बताकर पिछले चार वर्षों में विभिन्न जगहों से गिरफ़्तार किया गया है.

सउदी अरब में 13 मई को एक युवा भारतीय इंजीनियर फ़सीह महमूद की जो गिरफ़्तारी हुई, वो इस सिलसिले की सबसे ताज़ा घटना है.

बिहार के दरभंगा ज़िले में ' बाढ़ समैला ' नाम का एक गाँव है. फ़सीह महमूद इसी मुस्लिम बहुल बस्ती के रहने वाले हैं और चौंकाने वाली बात है कि हाल के दिनों में इस गाँव के और तीन लड़के गिरफ़्तार हुए हैं.

इन सब पर एक ही तरह का इल्ज़ाम या शक़ है कि ' इंडियन मुजाहिदीन ' से इनके संबंध हैं. बिहार की पुलिस को बताए बग़ैर अन्य राज्यों की पुलिस ने ये गिरफ्तारियां की हैं.

फ़िलहाल ये सवाल सुर्ख़ियों में है कि 35 वर्षीय मकेनिकल इंजीनियर फ़सीह अब कहाँ और किसकी गिरफ़्त में हैं ? इसकी कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी जा रही है.

फसीह की पत्नी निखत परवीन ने बीबीसी से कहा, '' सउदी अरब के अल जुबैल में अपने पति के साथ मैं जहाँ थी, वहाँ सादे लिबास में चार-पांच लोग आए और ख़ुद को सउदी पुलिसकर्मी बताया. फिर कहा कि इंडिया की पुलिस को किसी मामले में फसीह की तलाश है, इसलिए उसे पहले रियाद स्थित इंडियन एम्बेसी ले जाकर वहाँ से इंडिया भेज दिया जायेगा. वहाँ कमरे की तलाशी भी ली गई. लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन जब्त करके वे लोग फ़सीह को साथ ले गए और मुझे किसी रिश्तेदार के साथ इंडिया चले जाने को कहा.''

'अनशन पर बैठेंगे'

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Image caption फसीह के माता-पिता फसीह को लेकर काफी परेशान हैं

शुक्रवार सुबह निखत परवीन ने दिल्ली से टेलीफ़ोन पर मुझसे कहा, '' 20 मई को एक बार मेरे पति ने मुझे कॉल किया था, ये कॉल किसी सऊदी पुलिस वाले के फोन से किया गया था. वे रोते हुए इतना कह पाए कि उन्होंने कुछ नहीं किया है. इसके बाद उस नंबर पर कोई संपर्क नहीं हुआ.''

उधर दरभंगा ज़िले के बाढ़ समैला गाँव जाकर मैंने फ़सीह के परिजन और गाँव वालों से बातचीत की. वहाँ ज़्यादातर लोग रंज और ग़म में डूबी हुई अपनी बेबसी का बयान करने लगे.

फ़सीह के पिता फ़िरोज़ अहमद पेशे से डॉक्टर हैं और गाँव के धनसंपन्न प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते हैं. उनका कहना था '' ना जाने किसने ये साजिश रची है कि एक नेकदिल और समाज में हर किसी का अज़ीज़ माने जाने वाले मेरे बेटे को इस तरह बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाकर फंसाया गया है. फिर भी कुछ नहीं कर पाने की लाचारी हमारे सामने है.''

फ़सीह की मां गाँव के ही स्कूल में शिक्षिका हैं. बेटे की गिरफ़्तारी से वह बहुत आहत दिख रही थीं. रुंधे गले से कहने लगीं, '' इस बात की गवाही पूरा गाँव देगा कि मेरा बेटा बेक़सूर है. सउदी अरब और इंडिया की पुलिस मुझे चौबीस घंटे के भीतर बताए कि उसे कहाँ और क्यों छिपाकर रखा गया है ? अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं अनशन पर बैठ जाउंगी. ''

डॉ फ़िरोज़ के घर के पास ही जनाब अब्दुल सलाम का घर है. उनके बेटे कफ़ील अख्तर को कर्नाटक पुलिस ने गत छह मई को तड़के एक सुनियोजित छापेमारी के तहत घर में घुसकर गिरफ़्तार कर लिया था.

अब्दुल सलाम बोले, '' आतंकवादियों से हमारे बच्चों के तार जुड़े होने या इंडियन मुजाहिदीन के लिए काम करने के आरोप मढ़ने के पीछे ज़रूर ऐसी शक्तियां काम कर रही होंगी, जो हिन्दू-मुस्लिम तफरका की बुनियाद पर सियासत करते होंगे. मेरा बेटा तो किसी का दिल दुखाने से डरता था, वो ख़ूनी खेल का हिस्सा कैसे बनता! ''

बाद में इस घटना पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की थी. बिहार पुलिस को सूचित किए बिना चुपचाप की गई इस कार्रवाई को उन्होंने क़ानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन माना था.

जबकि कर्नाटक सरकार ने जवाबी ख़त में सफ़ाई दी थी कि इस ज़रूरी गोपनीय कार्रवाई की सूचना कहीं लीक ना हो जाए, इसलिए एहतियात बरता गया.

हालांकि बिहार के पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने इस तर्क से असहमति ज़ाहिर करते हुए बीबीसी से कहा था कि राज्यों के बीच ऐसा अविश्वास ख़तरनाक साबित हो सकता है.

गाँव की छिनी रौनक

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बिहार के अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज ने इन गिरफ्तारियों के तरीक़े और कथित सांप्रदायिक विद्वेष वाले प्रचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है.

मधुबनी और दरभंगा ज़िले के ग्रामीण इलाक़ों में घूमते हुए मैंने इस बाबत उनकी चिंताओं से जुड़ी हुई कई प्रतिक्रियाएं सुनीं. उनमें से मुख्य तीन इस प्रकार हैं –

1. यहाँ जिस किसी गाँव का कोई मुसलमान इस तरह के आरोप में पकड़ा जाता है, तो उस पूरे गाँव के मुसलमानों को आतंकवादियों का मददगार मान लिया जाता है.

2. बदनामी इस क़दर फैली है कि बिरादरी के ही बहुत से लोग गिरफ़्तारी से सम्बंधित गावों में रिश्तेदारी जोड़ने से कतराते हैं.

3. दरभंगा और मधुबनी ज़िलों के जो युवक बाहर कहीं पढ़ते या नौकरी करते हैं, उन पर अपने परिवार के लोग भी या तो शक भरी निगाह रखते हैं,या ' कहीं बेवजह फंस ना जाए ' जैसी चिंता करने लगते हैं.

इस तरह के माहौल का अनुभव उस दिन मुझे भी हुआ, जब मैंने बाढ़ समैला गाँव तक पहुँचने के सही रास्ते के बारे में एक राहगीर से पूछा.

उस ने रास्ता बताते हुए सवाल किया,-'' क्या उसी बाढ़ समैला गाँव में जाना है, जहाँ से कुछ आतंकवादी कनेक्शन वाले लोग पकडे गयए हैं ?

ज़ाहिर है कि उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ वासियों जैसी ही पीड़ा इन दिनों बिहार के बाढ़ समैला गाँव में बसे लोगों को झेलनी पड़ती है.

इस गाँव में एक पोखर के इर्द गिर्द कई मुस्लिम परिवारों के घर हैं. इन्हीं में गौहर अज़ीज़ खोमैनी, क़तील अहमद सिद्दीक़ी, कफ़ील अख्तर और फ़सीह महमूद के परिवार शामिल हैं.

इन चारो युवकों की गिरफ़्तारी से बिगड़े हालात ने पूरे बाढ़ समैला गाँव की ना सिर्फ रौनक छीन ली है, बल्कि वहाँ आपसी भरोसे की बुनियाद भी हिला दी है.

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