कैसे एक संख्या पहचान को नए मायने देगी

आधार कार्ड
Image caption पूरे देश में आधार कार्ड का काम चल रहा है.

गुजरात के सूरत शहर में चिलचिलाती दोपहर में महिला और पुरूष स्थानीय नगर निगम की इमारत में भारत की सबसे महत्वाकांक्षी योजना में अपना नाम दर्ज करा रहे हैं जिसका मकसद करोड़ों देशवासियों को एक निश्चित पहचान देना है.

हर व्यक्ति से जुड़ी जानकारी एक व्यक्ति लैपटॉप में दर्ज करता है और फिर उस व्यक्ति का वेबकैम से फोटो लिया जाता है, उंगलियों के निशान लिए जाते हैं और आंखों को भी स्कैन किया जाता है. ये दुनिया की सबसे बड़ी बायोमैट्रिक परियोजना है.

भारत में विशिष्ट पहचान (यूआईडी) योजना की शुरुआत दो साल पहले हुई और अब तक 20 करोड़ लोग इसमें अपना ब्यौरा दर्ज करा चुके हैं.

2014 तक और 40 करोड़ लोगों के ब्यौरे इसमें दर्ज हो जाएंगे और उन सबको भी 12 अंकों वाली एक विशिष्ठ पहचान संख्या दी जाएगी.

इस तरह भारत के लगभग आधे लोगों को विशिष्ठ पहचान संख्या मुहैया कराने का इस परियोजना का लक्ष्य पूरा होगा.

इकॉनोमिस्ट पत्रिका ने इसे ऐसे देश में 'आश्चर्यजनक परिणाम' कहा है जो बुनियादी चुनौतियों से जूझ रहा है.

मिलेगी पुख्ता पहचान

किसी जमाने में मुगलों की सराय रही सूरत नगर निगम की इमारत के हॉल में अपनी बारी का इंतजार कर रहीं नेरुबेन निगम में ही सफाई कर्मचारी हैं.

वो कहती हैं, “मुझे कुछ नहीं पता कि इसका क्या फायदा होगा. मैंने सुना है कि इससे हमारा कुछ भला जरूर होगा.”

नेरुबेन एक महीने में 12,000 रुपये कमाती हैं. बैंक में उनका खाता है. उनके पास मतदाना पहचान पत्र और पैन कार्ड भी है.

लेकिन ज्यादातर भारतीय नेरुबेन की तरह भाग्यशाली नहीं हैं.

विशिष्ट पहचान परियोजना के प्रमुख नंदन नीलेकणी कहते हैं कि करोड़ों लोगों के पास पहचान का कोई प्रमाण नहीं है जिसके कारण वे अपने अधिकारों से वंचित रहते हैं और उनका अस्तित्व गुमनाम रहता है.

दुनिया में सबसे तेज रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत के गांवों में रह रहे 40 प्रतिशत लोगों के बैंक में खाते नहीं हैं, जिसकी एक बड़ी बजह पहचान का कोई प्रमाण पत्र न होना है.

क्या सुविधा होगी

Image caption आंखों का भी स्कैन होता है.

गांव में बनवाए गए पहचान के दस्तावेज शहर में अकसर काम नहीं आते. इसीलिए काम करने के वास्ते जब लोग गांवों से शहर आते हैं तो उन्हें नए सिरे से पहचान पत्र की जरूरत होती है.

नंदन नीलेकणी कहते हैं, “एक दस्तावेज के लिए दूसरे दस्तावेजों की जरूरत पड़ती है. ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए राशन की कार्ड की जरूरत होती है. राशन कार्ड के लिए जन्म प्रमाण पत्र चाहिए और यह सिलसिला ऐसे ही चलता है.”

विशिष्ठ पहचान संख्या का उद्देश्य लोगों को एक विश्वसनीय और सब जगह मान्य राष्ट्रीय पहचान मुहैया कराना है जो गरीबों को सरकारी कल्याणकारी योजना का लाभ लेने, बैंक खाता खुलवाने और उन्हें पुलिस के शोषण से बचाने में मदद करेगी.

इससे पेंशन और वेतन देने, रसोई गैस और मोबाइल फोन का कनेक्शन लेने में आसानी होगी.

कुछ लोग कहते है कि इस योजना से भारत की सूरत बदल सकती है.

विशिष्ठ पहचान से जुड़े सवाल

लेकिन बायोमैट्रिक पहचान दुनिया भर में एक विवादित मुद्दा रहा है और विशिष्ठ संख्या को लेकर कई सवाल उठे हैं.

क्या ये निजता पर हमला है? जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज इसे 'सामाजिक नीतिगत पहल के लबादे में राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजना' कहते हैं.

क्या विशिष्ठ पहचान डेटाबेस कल्याणकारी योजना के लाभार्थियों की मौजूदा सूचियों से ज्यादा भरोसेमंद होगा? डॉ. द्रेज कहते हैं, "कुछ कहना मुश्किल है."

आलोचकों का ये भी कहना है कि इससे नागरिक स्वतंत्रता पर पाबंदियों का खतरा बढ़ेगा. कुछ लोग कहते हैं कि इससे देश में अवैध रूप से रह रहे लोगों पर भी लगाम कसेगी.

वैसे अब भी आम लोगों को इस योजना के फायदों के बारे में ज्यादा नहीं पता है. बहुत से लोग इसलिए अपना ब्यौरा दर्ज करा रहे हैं क्योंकि उनके आसपास वाले लोग ऐसा कर रहे हैं.

काम की तलाश में महाराष्ट्र के एक गांव से मुंबई आए 21 वर्षीय सोनू यूसुफ शेख का जन्म प्रमाण पत्र खो गया है. वो पूछते हैं कि क्या विशिष्ठ नंबर से उन्हें नौकरी मिलेगी?

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